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मंगलवार, 8 मार्च 2011

उठो राष्ट्र प्रहरियो !



दिशाएँ सब विक्षिप्त हैं. 
मृत्यु दीर्घजीवी पर, जीवन आयु संक्षिप्त है. 


स्वप्न ध्वस्त हो गये, सौभाग्य अस्त हो गये. 
षडयंत्रों के जंगलों में, हवा तक संलिप्त है.  


देवत्व वनवासी हुए, दुरित अधिवासी हुए. 
'सुसंकल्प' गरल पीकर, चिरनिद्रा में तृप्त हैं.


उठो राष्ट्र प्रहरियो ! ... ग्रामीणो व शहरियो !!
गली-गली आवाज़ दो, यहाँ डगर-डगर सुप्त है. 


आर्यत्व घोष गुंजार दो, गांडीव को टंकार दो. 
चहुँमुखी शत्रु नाश का, यही समय उपयुक्त है. 

आँसुओं को उल्लास दो, अंधेरों को उजास दो. 
आँख दो - अरे आँख दो, एक राष्ट्रभाव लुप्त है. 

— आचार्य भगवानदेव 'चैतन्य' की रचना

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