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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

सभ्य आहार और स्वादलोलुपों की बहानेबाज़ी !!


भ्रम # 1- आदिमानव माँसाहारी था।



भ्रम # 2- विश्व में अधिकतर आबादी माँसाहारी है इसलिए माँसाहार सही है



भ्रम # 3- वनस्पति अभाव वाले बर्फ़ीले प्रदेश व रेगिस्तान के लोग क्या खाएंगे?



भ्रम # 4- सभी शाकाहारी हो जाय तो इतना अनाज कहां से आएगा ? पूरा विश्व  शाकाहारी हो जाय तो पूरे विश्व की जनता को खिलाने लायक अनाज का उत्पादन करने के लिए हमें ऐसी चार और पृथ्वियों की आवश्यकता होगी।



भ्रम # 5- प्रोटीन की प्रतिपूर्ति माँसाहार से ही सम्भव है:



भ्रम # 6- संतुलित आहार के लिए, शाकाहार में मांसाहार का समन्वय जरूरी है:



भ्रम # 7- हिंसा तो वनस्पति आहार में भी है:



* विषय सम्बन्धित कुछ अन्य कड़ियाँ * 
* शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल !!!(पूर्वार्ध)
* शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल!!! (उतरार्ध)

भ्रम-खण्ड़न का यह विशेष अध्याय पढ़ें निरामिष पर

शनिवार, 13 नवंबर 2010

क्षुद्रता के विविध रूप


 क्षुद्रताओं को छिपाकर [दबाकर] रखना शिष्टता है, 
उन्हें उजागर न होने देना सभ्यता है और उन्हें भीतर ही भीतर समाप्त करते रहना संस्कृत होते जाना है. 

क्षुद्रताओं का छिपे रूप से पोषण करना वंचकता है, 
उन्हें वहीं सड़ते रहने देना व किसी अन्य की दृष्टि का भाजन बनना धूर्तता है और स्वयं स्पष्टीकरण करते हुए उनमें लिप्त रहना — उच्छृंखलता कहा जाएगा. 

क्षुद्रताओं की स्वयं द्वारा सहज स्वीकृति सज्जनता है, 
किन्तु परिमार्जन का भाव उसकी अनिवार्यता है अन्यथा वह यशलोलुपतापूर्ण स्पष्टवादिता कहलायेगी. 
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