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मंगलवार, 28 अगस्त 2012

ताजमहल की असलियत ... एक शोध -- 8

०७ फरमानों की समीक्षा

फरवरी माह के आलेख में आपने शाहजहाँ द्वारा आमेर के राजा जयसिंह के नाम भेजे गये तीन राज्यादेश (फरमान) पढ़े। यह तीनों लगभग एक ही विषय पर केन्द्रित हैं कि राजा जयसिंह अपने राज्य में स्थित मकराना की खानों से संगमरमर पत्थर भिजवाने की व्यवस्था करें। इन फरमानों का अब तक यही अर्थ लगाया जाता रहा है कि सफेद संगमरमर से बने ताजमहल को शाहजहाँ ने ही बनवाया था जिसका पुष्ट प्रमाण है कि सम्राज्ञी मुमताज उज ज़मानी की मृत्यु के पश्चात्‌ शाहजहाँ ने संगमरमर अकबराबाद मंगवाने के लिये फरमान जारी किये, परन्तु वास्तवकिता इसके विपरीत है। इन फरमानों का गहन अध्ययन ही यह सिद्ध करेगा किशाहजहाँ ने ताजमहल नहीं बनवाया था।

तर्क में कुछ लोग कहेंगे कि फरमानों में संगमरमर लाने की बात कही गई है, परन्तु उसी संगमरमर से ताजमहल बनाया गया, ऐसा स्पष्ट तो क्या संकेत मात्र भी कहीं नहीं है। अतः यह सिद्ध नहीं होता कि मकराना से लाये गये पत्थर से ताजमहल ही बनाया गया था। सम्भव है उस पत्थर का किसी अन्य भवन के बनाने में प्रयोग किया गया हो ? मैं इस तर्क को कुतर्क ही मानूंगा। अनेक प्रमाणों के आधार पर यह स्वयं सिद्ध है कि उपरोक्त फरमानों के आधार पर मकराना की खानों से लाये गये सफेद संगमरमर का प्रयोग ताजमहल में ही किया गया था। आप कहेंगे कि यह दोहीर बात कैसी ? एक ओर आप कह रहे हैं कि लाये गये पत्थर का प्रयोग शाहजहाँ ने ताजमहल में किया था तथा साथ ही साथ यह भी कह रहे हैं कि ताजमहल शाहजहाँ ने नहीं बनवाया था। हाँ ! यह दोनों बातें ही सत्य हैं, परन्तु कृपया कुछ प्रतीक्षा कीजिये।

सम्राज्ञी मुमताज उज ज़मानी का देहान्त आधुनिक मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र की सीमा पर बसे बुरहानपुर नामक स्थान पर दिनांक १७ जिल्काद १०४० हिजरी तदनुसार १७ जून सन्‌ १६३१ ई. को हुआ था तथा उसे वहीं ताप्ती नदी के तट पर जैऩाबाद नामक स्थान पर दफना दिया गया था। शव को दफनाने का प्रमाण है कि ८ दिन पश्चात्‌ शाहजहाँ ताप्ती नदी पार कर कब्र पर गया था। तत्पश्चात्‌ ४ जुलाई सन्‌ १६३१ (४ जिल्हज १०४० हिजरी) को प्रथम गुलाब जल छिड़कने की रस्म भी वहीं पर पूरी की गई। आगे बादशाहनामा कहता है कि १७ जमादिल अव्वल १०४१ हिजरी (११ दिसम्बर सन्‌ १६३१) को सम्राज्ञी के शव को आगरा ले जाया गया जो वहाँ १५ जमादिल आखिर १०४१ हिजरी (८ जनवरी सन्‌ १६३२) को पहुँचा और उसे दफनायां न जाकर ताजमहल परिसर में रख दिया गया। क्यों ? आइए गवेषणा करें।

राजा मानसिंह के महल (ताजमहल) पर शाहजहाँ एवं मुमताज महल की निगाह जहाँगीर के शासनकाल से थी। उसके स्वयं के शासन के प्रथम तीन वर्ष अति व्यस्तता (शासन सुधारने, विद्रोहों का दमन करने तथा दक्षिण के कुछ राज्यों पर आक्रमण करने) में बीते। इसी समय सम्राज्ञी का देहान्त हो गया। शाहजहाँ को यह एक अच्छा अवसर अनायास मिल गया तथा बादशाहनामा के अनुसार, 'महानगर के दक्षिण में स्थित विशाल मनोरम रसयुक्त वाटिका से घिरा हुआ और उसके बीच का वह भवन जो मानसिंह के महल के नाम से प्रसिद्ध था को रानी को दफनाने के लिये चुना गया।'

इस विषय पर तर्क-वितर्क न करते हुए कि राजा का महल ही क्यों चुना गया, हम सीधे विषय पर आते हैं। महल का चुनाव कर लेने के पश्चात्‌ उसके स्वामी राजा जयसिंह को महल सम्राट्‌ को दे देने के लिये कहा गया। स्पष्ट है कि इस अन्याय से जयसिंह असमंजस में पड़ गया। उसने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। उसे समझाने का बहुत प्रयास किया गया, परन्तु काम न बना और लगभग पाँच मास का समय बीच गया। तब एक भीषण षड्‌यन्त्र के तहत सच्चा या झूठा (इसलिये कि रानी की असली कब्र तो आज भी बुरहानपुर में बिना खुदी सही दशा में उपलब्ध है) एक शव लाकर महल परिसर में राजा जयसिंह पर दबाव बनाने के लिए रख दिया गया। राजा जयसिंह को, 'धार्मिक पवित्रता तथा दुख के अवसर 'की महत्ता बताई गई, परन्तु राजा टस से मस न हुआ। इसीलिये शव लगभग ६ः मास उसी परिसर में पड़ा रहा। अन्ततः राजा को झुकना पड़ा तथा वह महल छोड़कर आमेर चला गया। रानी के शव को कब दफनाया गया, वह दिनांक कहीं उपलब्ध नहीं है। बादशाहनामा में मात्र इतना इंगित है उसे अगले वर्ष दफनाया गया। मुसलमानी वर्ष १ मुहर्रम से प्रारम्भ होता है और गणना के अनुसार उस वर्ष यह दिनांक १९ जुलाई सन्‌ १६३२ को पड़ा था। यह आवश्यक नहीं कि शव इसी दिन दफनाया गया हो, क्योंकि बादशाहनामा के अनुसार, 'अगले वर्ष उस भव्य शव को..... आकाश चुम्बी बड़ी समाधि के अन्दर............जिस पर गुम्बज है..............पवित्र भूमि को सौंप दिया।' हम कल्पना कर सकते हैं कि शव को १९ जुलाई के पश्चात्‌, परन्तु २० सितम्बर से पूर्व किसी दिन दफनाया गया। इस कार्य से निपटने के पश्चात्‌ षड्‌यन्त्रकारियों ने निश्चय किया कि सम्भव है राजा जयसिंह पुनः अपने महल को वापस लेने के प्रयास करें अस्तु इसमें रानी की कब्र बनवा दी जाये तथा कुरान लिखा दी जाय। इस कार्य के लिये संगमरमर पत्थर की आवश्यकता थी, क्योंकि पूरा महल सफेद संगमरमर का बना हुआ था। शाहजहाँ का दुर्भाग्य कि पत्थर भी राजा जयसिंह की ही जागीर में उपलब्ध था। राजा कहीं भड़क न जाय ताजमहल का नाम न लिख कर पहले फरमान में मात्र पत्थर काटने वाले तथा किराये की गाड़ियों की बात कही गई है।

इस बात को दूसरे ढंग से अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। प्रश्न यह उठता है कि रानी को दफन करने के तुरन्त बाद शाहजहाँ को संगमरमर की आवश्यकता क्यों पड़ गई ? यहाँ पर मैं यह स्पष्ट करना अपना कर्त्तव्य मानता हूं कि नींव से लेकर ऊपर का बड़ा प्रांगण तथा उसके ऊपर संगमरमर का बना चबूतरा तथा उसके ऊपर का विशालकाय संगमरमर का भवन गुम्बज सहित, सम्पूर्ण लाल पत्थर तथा ईंटों का बना हुआ है। जो भाग संगमरमर का बना दिखाई पड़ता है वहां पर ईंट की १३ फीट मोटी दीवाल पर मात्र ६ इंच मोटा संगमरमर दोनों ओर चिपका है। अतः स्पष्ट है कि यदि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया होता तो उसे धौलपुर की खानों से लाल पत्थर तथा स्थानीय भट्‌ठों से ईंट की व्यवस्था करनी पड़ती तथा जब १२-१४ वर्ष में पूरा महल बन चुका होता उस समय ऊपर चिपकाने के लिये संगमरमर पत्थर की आवश्यकता होती, न कि पहले ही वर्ष। कहाँ है वे फरमान जिनमें लाल पत्थर तथा ईंटों की मांग की गई थी।

जिन्होंने भी ताजमहल देखा है वह भली भाँति जानते हैं कि मुखय सफेद भाग को छोड़कर भी उसकी कुर्सी के चारों ओर का विशाल प्रांगण भूमि से ६०-८० फीट की ऊँचाई तक है और यह सभी ईंट, गारा, चूना तथा लाल पत्थर का बना हुआ है। यह भी एक तथ्य है कि इसकी नींव में कम से कम ४२ कुएँ हैं जो निश्चित रूप से संगमरमर द्वारा नहीं बनाए गये हैं। फरमानों की तिथि पर यदि ध्यान दें तो ज्ञात होता है कि पहला फरमान २०/०९/१६३२ तथा तीसरा और अन्तिम फरमान दिनांक ०१/०७/१६३७ई. का है। यह ही भवन बनने का प्रारम्भ समय होना चाहिए था। स्पष्ट है कि इस अवधि में शाहजहाँ को संगमरमर की आवश्यकता किसी रूप में भी भवन बनाने के लिये नहीं थी। हाँ, दोनों कब्रें (शाहजहाँ की नहीं) बनाने के लिये तथा कुरान लिखवाने के लिए संगमरमर की आवश्यकता अवश्य थी। दो कब्रों से मेरा तात्पर्य ऊपर तथा नीचे की कब्रों से हैं। नीचे की कब्र इसलिये बनाई गई थी कि यदि कभी राजा जयसिंह वापस भवन को बलात्‌ प्राप्त कर कब्र को नष्ट भी कर दें तो नीचे की तथाकथित कब्र (जो उस समय छिपी थी) सुरक्षित बनी रहे और भवन को पुनः प्राप्त करने की दशा में कहा जा सके कि मकबरा तथा कब्र सुरक्षित है।

अमानत खाँ शीराजी नामक व्यक्ति ने कुरान लिखने का कार्य किया था। उसने कई स्थानों पर अपना नाम तथा तारीख लिखी है। अन्तिम तारीख १६३९ ई. की है, यही कारण है कि सन्‌ १६३७ ई. के बाद संगमरमर की मांग नहीं की गई थी।

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि तीन फरमानों के द्वारा शाहजहाँ ने आमेर नरेश राजा जयसिंह को संगमरमर भेजने की व्यवस्था करने का आदेश दिया था। यहाँ पर पहला प्रश्न यह उपस्थित होता है कि शाहजहाँ को सन्‌ १६३२-३३ में संगमरमर कीही आवश्यकता क्यों पड़ी ? यही नहीं दूसरा प्रश्न यह भी है कि मात्र ४ मास पश्चात्‌ ही दूसरा फरमान भेजने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?

पहले सम्राज्ञी के शव को दफनाने के २ मास बाद ही शाहजहाँ द्वारा संगमरमर प्राप्त करने के लिये आदेश देना, उसे प्राप्त करने के लिये उच्च-अधिकारियों की नियुक्ति करना, तत्पश्चात्‌ लगातार दो अन्य फरमान भेजना सिद्ध करता है कि शाहजहाँ को कुछ ऐसा निर्माण कराना था जिसमें संगमरमर पत्थर की ही अतिशीघ्र आवश्यकता थी। ताजमहल का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि सम्राज्ञी की कब्र संगमरमर की बनी है तथा कुरान भी संगमरमर पर ही लिखी हैं। अधिक ध्यान से देखने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कुरान के आसपास के फूल-बूटे आदि कुरान से अधिक स्पष्ट तथा पुराने हैं। यह ऐसे पुष्ट प्रमाण हैं कि जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि शाहजहाँ ने राजा जयसिंह से संगमरमर प्राप्त किया था तथा कब्रों का निर्माण कराया था एवं कुरान लिखवाई थी। यदि ऐसा न होता तो शाहजहाँ को संगमरमर की आवश्यकता सम्राज्ञी के मरने के कई वर्ष बाद ही होती न कि अविलम्ब। संगमरमर की आवश्यकता तो भवन के गुम्बज तक निर्माण पूरा होने के पश्चात्‌ ही ऊपर सेचिपकाने के लिये होती। माना कि संगमरमर पर फूल-बूटे आदि खुदवाने के लिये कुछ समय पूर्व ही उसकी आवश्यकता रही होगी, परन्तु इस तर्क में भी दम नहीं है। जब तक मुखय भवन बन कर तैयार न हो जाय तथा उसके प्रत्येक भाग का सूक्ष्मतम माप न ले लिया जाय तब तक किसी पत्थर को खुदाई के लिये छुआ नहीं जा सकता। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ताजमहल में सादे पत्थर का प्रयोग खुदाई किये गये पत्थर से लगभग दस गुना अधिक है।

फरमानो में शाहजहाँ ने संगमरमर के लिये गाड़ियों की व्यवस्था करने तथा भुगतान सम्बन्धी आदेश दिये हैं। यह अति आश्चर्यजनक ही लगता है कि उस युग में जब सम्राट्‌ की भ्रकुटि हिलाने मात्र से कार्य त्वरित गति से हो जाता था, शाहजहाँ को मात्र ४-५ मास में एक नहीं दो आदेश-पत्र (फरमान) क्यों भेजने पड़े थे ? दूसरा फरमान पढ़ने से ज्ञात होता है कि राजा जयसिंह ने न तो पत्थर काटने वालों की ही व्यवस्था की, न ही गाड़ियाँ ही उपलब्ध कराईं। साथ ही साथ उसने मुल्क शाह की भी कोई सहायता नहीं की। जिस प्रकार एक सेनापति के असफल होने पर दूसरा अधिक वीर सेनापति भेजा जाता था, उसी प्रकार मुल्कशाह के असफल होने पर दूसरे फरमानके साथ इलाहादाद को भेजा गया। इस फरमान में 'इस समय अधिक महत्व देने के लिए' लिखा गया अर्थात्‌ ४ मास में संगमरमर प्राप्त न करना शाहजहाँ के लिये कितना 'महत्वपूर्ण' बन गया था। साथ ही साथ शाहजहाँ ने मुल्कशाह के साथ भेजे गये धन का हिसाब भी मांगा था। स्पष्ट है कि राजा जयसिंह का व्यवहार एक स्वामिभक्त मनसबदार का न होकर एक धृष्ट राजा के समान था जो असहयोग करने पर उतारू था।

अन्तिम फरमान से राजा जयसिंह का असहयोग अति स्पष्ट हो जाता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा द्वारा कोई सहायता उपलब्ध न कराये जाने पर इलाहादाद ने अपने स्वयं के मुतसद्दियों द्वारा स्वतन्त्र रूप से (बिना राजा जयसिंह की सहायता के) थोड़ा बहुत संगमरमर प्राप्त करना प्रारम्भ कर दिया था, परन्तु राजा को यह भी रुचिकर नहीं था। अतः उसने इस कार्य में भी बाधा डालनी प्रारम्भ कर दी। यह सुस्पष्ट आरोप फरमान में है कि राजा के सैनिक आमेर तथा राजनगर में पत्थर काटने वालों को रोक रहे हैं। बिना राजा जयसिंह की सहमति के सैनिकों अथवा आदमियों को इतना साहस कैसे हो सकता था कि वे सम्राट्‌ के कार्य में बाधा डालें।

मेरा निश्चित मत है कि खानों से संगमरमर कोई भी व्यक्तिसाधारणतया प्राप्त कर सकता था तथा मूल्य देकर शाहजहाँ स्वयं भी पत्थर सुविधापूर्वक प्राप्त कर सकता था। इसके लिये किसी प्रकार के फरमान भेजने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी पहले कुछ मास में पत्थर प्राप्त करने में असफल होने पर शाहजहाँ ने फरमान भेजा। पहले फरमान के बाद ही पर्याप्त संगमरमर मिल जाना चाहिए। यदि राजा असहयोग कर रहा था तो उसे दण्ड दिया जाना चाहिए थ। फरमानों के अन्त में यद्यपि स्पष्ट लिखा जाता था, 'भूल न करें', आदि। इस अति आवश्यक कार्य को अपना दायित्व न समझने की गुरुतर भूल करने, तीन-तीन आदेश पत्रों को रद्‌दी की टोकरी में फेंक कर भी राजा जयसिंह (मात्र एक मनसबदार) मूछों पर ताव देता रहा और सम्राट्‌ होते हुए भी शाहजहाँ कुछ न कर सका ? है न आश्चर्यजनक ! वह युग पूर्ण दया अथवा पूर्ण दण्ड का था। शासन प्रसन्न हो जाय तो सहज ही लाखों के मूल्य के पुरस्कार दे दें और यदि रुष्ट हो जाय तो कम से कम दण्ड सूली पर चढ़वा देना, हाथी के पैर से कुचलवा देना, कुत्तों से नुचवाना अथवा सार्वजनिक रूप से वध कराना आदि होता था तथा राजा एवं मनसबदार इसके अपवाद नहीं थे। इनको भी दण्ड मिलने के उदाहरण हैं यथा अब्दुल रहीमखानखाना, अमर सिंह राठौर, शिवाजी, राजा जसवन्त सिं आदि। इस विषय पर आगे विचार करेंगे, पहले संगमरमर पर।

तीसरे फरमान के पश्चात्‌ का कोई अन्य फरमान भेजा गया, ऐसा प्रतीत नहीं होता हैं इसका यह तात्पर्य नहीं कि राजा जयसिंह के व्यवहार में परिवर्तन आ गया था अपितु मात्र इतना है कि सन्‌ १६३७-३८ में जो संगमरमर पहुँचा उस पर कुरान लिखी गई एवं संगमरमर का काम कुरान लेखन के साथ ही सन्‌ १६३९ ई. में समाप्त हो गया था।

अब पुनः मुखय प्रश्न पर आएं कि राजा जयसिंह का व्यवहार आश्चर्यजनक रूप से उद्‌दण्ड तथा नकारात्मक क्यों था ? साथ ही साथ शाहजहाँ का व्यवहार भी नम्र एवं शिष्ट क्यों था ? इसके लिये दूर नहीं जाना होगा। आइये, पहले बादशाहनामा को देखते हैं। पृष्ठ ४०३ पर पंक्ति २९ के अनुसार राजा मानसिंह का महल जो उस समय राजा जयसिंह के स्वामित्व में था, रानी के शव को दफनाने के लिये चुना गया था। इसी पृष्ठ की पंक्ति ३१ के अनुसार राजा जयसिंह के लिये अपनी यह पैत्रिक सम्पत्ति अत्यन्त मूल्यवान्‌ थी। ऐसी मूल्यवान्‌ सम्पत्ति राजा जयसिंह से दुखद विछोह एवं धार्मिक पवित्रता के नाम पर बलात्‌ छीन ली गई थी। यद्यपि यह कहा गया था कि बदले में भूमि का एकटुकड़ा दिया गया था। वह कितना बड़ा टुकड़ा था तथा कहाँ पर था इसका कोई विवरण नहीं दिया गया। वस्तुतः यह भूमि देना भी संदिग्ध है। पाठक समझ सकते हैं कि ताजमहल जैसी मूल्यवान्‌ सम्पत्ति के बदले में यदि भिूमि का एक टुकड़ा (चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो) यदि सचमुच दे दिया जाए तो भी पाने वाला कितना असंतुष्ट होगा ? स्पष्ट है कि शाहजहाँ के इस कृत्य से राजा जयसिंह न केवल असंतुष्ट ही थे अपितु रुष्ट भी थे। मकराना (उन्हीं के राज्य) की खानों से संगमरमर मंगा कर शाहजहाँ द्वारा राजा जयसिंह के भव्य भवन पर कुरान लिखना भला उन्हें कैसे सहन हो सकता था। यह तो जले पर नमक छिड़कने जैसा था। ताजमहल छिन जाने में तो जयसिंह का वश नहीं चला, परन्तु मकराना की खानें तो उसके राज्य-क्षेत्र में अवस्थित थीं, अतः सीमा में रहते हुए जितना अवरोध (विरोध) सम्भव था उसने उत्पन्न किया उसने अप्रत्यक्ष रूप से कारीगर भी रोक दिये थे। यही कारण था कि शाहजहाँ लगातार शिष्ट बना रहा, क्योंकि उसे भय था कि यदि राजा जयसिंह को व्यर्थ में दण्डित किया गया तो वह विद्रोह भी कर सकता था ओर उस दशा में अन्य राजपूत भी उसका साथ दे सकते थे। ताजमहल परकुरान लिखाने से भी यही तात्पर्य था कि शाहजहाँ उस भवन पर मात्र अपने नाम का ठप्पा भर लगाना चाहता था।

इसके अतिरिक्त भी एक कारण था। अपने पिता जहाँगीर के समय में शाहजहाँ, जो उस समय शाहजादा खुर्रम के नाम से प्रसिद्ध था, ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था। उस समय समाज्ञी नूरजहाँ ने आमेर के राजा जयसिंह को खुर्रम का विद्रोह दबाने के लिऐ आगरा बुलाया था। जब वह आगरा आये तो उनकी अनुपथिति का लाभ उठा कर खुर्रम ने उनकी राजधानी को लूट लिया था। अन्ततः राजा जयसिंह ने खुर्रम का पीछ करते हुए उसे परास्त कर जहाँगीर के चरणों में ला कर डाल दिया था। स्पष्ट है कि सन्‌ १६२८ में गद्‌दी पर बैठते समय शाहजहाँ के मन में गाँठ थी और वह बदला लेने के लिये अवसर की खोज में था और वह अवसर उसे रानी की मृत्यु के रूप में ३ वर्ष में ही मिल भी गया। स्पष्ट है कि राजा मानसिंह का वह भव्य भवन (ताजमहल) अकबर के समय से ही मुगलों की आँखें में खटक रहा होगा। अकबर के राजा बिहारीमल (भारमल) एवं उनके पुत्र भगवन्त दास तथा पौत्र मानसिंह से निकट के सम्बन्ध थे। जहाँगीर मानसिंह का सगा बहनोई था। अतः इन दोनों ने ऐसा कुछ नहीं किया। दूसरा कारण यह भी था कि राजा मानसिंह मुगल सम्राज्य के महान्‌ स्तम्भ थे, जिनके ऊपर पूरा मुगल शासन तन्त्र टिका था। यद्यपि यही दशा राजा जयसिंह की भी थी, परन्तु उनकी अल्प आयु का लाभ उठाते हुए जब शाहजहाँ को मौका मिला तो उसने धार्मिक अवसर तथा दुखद समय आदि के बहाने उक्त भव्य भवन को राजा जयसिंह से छीन लिया। अन्यथा कोई कारण न था कि खुली भूमि न लेकर एक भव्य भवन को 'दफनाने' के लिये चुना गया।

एक अन्य बात फरमानों से स्पष्ट होती है कि मुल्कशाह एवं इलाहादाद को राजा के पास आमेर भेजा गया था जब कि प्रचलित नियम के अनुसार राजा को आमेर में न होकर आगरा में शाहजहाँ के पास ही होना चाहिए थां उस समय के राजा मात्र कुछ दिनों के लिये ही (सम्राट्‌ से छुट्‌टी लेकर ही) अपनी राजधानी जा सकते थे। अतः राजा का असन्तुष्ट होकर आमेर चलेजाना तथा वहाँ पर कई वर्ष तक रहना कारण रहित नहीं हो सकता हैं इतिहास साक्षी है कि जयसिंह शाहजहाँ के विरुद्ध दक्षिण में औरंगजेब को गुप्त सूचनाएँ भेजता था तथा उसने उत्तराधिकार के युद्ध में न केवल स्वयं औरंगजेब का साथ दिया था अपितु इसके लिये राजा जसवन्त सिंह को भी मना लिया था।
ज़ारी ...



लेखक  : पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

ताजमहल की असलियत ... एक शोध -- 7

०६ शाहजहाँ के फरमान

अब तक आपको भली-भाँति ज्ञात हो चुका है कि बादशाहनामा के अनुसार हिज़री १०४१ में सम्राज्ञी का शव बुरहानपुर से आगरा लाया गया था। उसी पुस्तक के अनुसार उसे अगले वर्ष हिजरी १०४२ तदनुसार सन्‌ १६३२ में मिर्जा राजा जयसिंह से प्राप्त हुए 'भवन' में दफन कर दिया गया था। इस भवन (ताजमहल) को पीटर मुण्डी ने २५/०/१६३३ को आगरा से प्रस्थान करने से पूर्व देखा था तथा आगरा के उस समय के दर्शनीय स्थलों यथा अकबर का मकबरा, किला आदि की श्रेणी में भी रखा था। मनरिक ने भी ताजमहल सन्‌ १६४० में देखा था तथा मजदूरों को सड़क बनाते, बाग में काम करते एवं स्वच्छ जल की व्यवस्था करते पाया था। परन्तु अधिक विश्वसनीय कहे जाने वाले टैवर्नियर ने सन्‌ १६४० में ताजमहल को पाया ही नहीं तथा सौभाग्य से उसके सामने ही इस भवन (ताजमहल) का बनना प्रारम्भ हुआ था।

टैवर्नियर अपनी छः यात्राओं में अन्तिम पाँच में भारत आया था। यह यात्राएँ उसने निम्न रूप में की थीं –
१. सन्‌ १६३१-३३ इस्पहान-बगदाद-सिकन्दरिया-माल्टा-इटली
२. सन्‌ १६३८-४३ अलेप्पो-परशिया-भारत (आगरा-गोलकुण्डा) (नवम्बर १६४० में आगरा आया)
३. सन्‌ १६४३-४९ भारत-जावा-केप आदि (आगरा नहीं आया)
४. सन्‌ १६५७-६२ भारत (आगरा नहीं आया)
५. सन्‌ १६६४-६८ भारत (नवम्बर १६६५ में आगरा आया)

उपरिलिखित आधार पर स्पष्ट है कि टैवर्नियर आगरा में सन्‌ १६४० में पहली बार तथा सन्‌ १६६५ में दूसरी बार आया था। यदि टैवर्नियर पर विश्वास करने वाले सत्य हैं तो ताजमहल के बनने का काल सन्‌ १६४० से सन्‌ १६६५ हुआ अर्थात्‌ २५ वर्ष। यदि यह काल सत्य हो तभी यह स्वीकार किया जा सकता है कि टैवर्नियर ने ताजमहल का बनना, प्रारम्भ होना तथा परिपूर्ण होना स्वयं देखा था। इसके लिये एक ही वाक्य कहना पर्याप्त होगा कि सन्‌ १६५८ में ही शाहजहाँ को उसके क्रूर पुत्र औरंगजे़ब ने बन्दी बना लिया था तथा वह सन्‌ १६६५ तक तो क्या अपनी मृत्यु-पर्यन्त कारागार में ही रहा था। अतः शाहजहाँ द्वारा सन्‌ १६६५ तक ताजमहल बनाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

शाहजहाँ द्वारा ताजमहल बनाये जाने के पक्ष में एक अन्य अत्यन्त पुष्ट प्रमाण दिया जाता है, उसके द्वारा जारी किये गये 'फरमान'। यह फरमान सम्राट्‌ शाहजहाँ ने मिर्जा राजा जयसिंह के नाम जारी किये थे तथा इन फरमानों की फोटोप्रति ताजमहल स्थित संग्रहालय (नक्कारखाना) में रखी हुई हैं। पुरातत्व विभाग के प्रकाश में इनका विस्तृत विवरण लिखा हुआ है।

शाहजहाँ द्वारा जारी किये गये मात्र चार फरमान आज उपलब्ध हैं (जिनमें से तीन का विवरण यहाँ पर दो अध्यायों में दिया जाएगा)। इन फरमानों को पढ़ने से ज्ञात होता है कि यह फरमान अपने में परिपूर्ण हैं तथा इनके अतिरिक्त सम्भवतः कोई अन्य फरमान जारी नहीं किया गया था। वास्तवकिता यह है कि यदि शाहजहाँ ने स्वयं ताजमहल बनवाया होता जैसा कि कहा जाता है, उस दशा में शाहजहाँ द्वारा सैकड़ों फरमान जारी किये गये होते, यथा ताजमहल के लिये अभिकल्प मांगने के लिये, किसी एक अभिकल्प की स्वीकृति का, ताजमहल बनाने के लिये अधिकारी की नियुक्ति, अनेक देशों से बहुमूल्य रत्नों के आयात सम्बन्धी आदि-आदि। प्रतिदिन की क्रय की गई सामग्री का विवरण आदि अनेक पर्चियाँ जारी हुई होतीं तथा उनका विवरण तत्कालीन साहित्य में
मुल्ला अब्दुल हमीद लाहोरी,
मुहम्मद अमीना काजबिनी (पादशाह नामा),
मुहम्मद सलीह कम्बू (अमल-ए-सलीह)
इनायत खान (शाहजहाँनामा)
मुहम्मद वारिस (बादशाह नामा)
मुहम्मद सादिक (शाहजहाँनामा)
मुहम्मद शरीफ हनफी (मजलिस-उस-सुल्तान)
द्वारा अपने ग्रन्थों में अवश्य लिखा जाता। परन्तु सम्पूर्ण रूप से प्राप्त, विषय में परिपूर्ण इन फरमानों के अतिरिक्त कोई अन्य अभिलेख अथवा पुर्जा भी जारी न होना आश्चर्यजनक ही नहीं शाहजहाँ द्वारा ताजमहल का निर्माण न किये जाने के पक्ष में प्रबल प्रमाण है।

उपयुक्त तीन फरमान शाहजहाँ ने राजा जयसिंह, जो आमेर (आधुनिक जयपुर) के शासक थे तथा जिनके राज्य के अन्तर्गत मकराना नामक स्थान पर सफेद पत्थर (संगमरमर) की खाने हैं, के नाम जारी किये गये थे। इन तीनों का मूल विषय मकराना से ताजमहल के लिये संगमरमर भेजने की व्यवस्था करना है।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि इस पूरे घटनाक्रम की तिथियों पर विद्वान एक मत नहीं है। यद्यपि तिथियों के व्यतिक्रम के कारण हमारे लेखन का विषय-वस्तु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना है, परन्तु इन फरमानों की तिथ्यिों की गड़बड़ी के कारण एक बहुत बड़ा भ्रम उत्पन्न हो गया। मुगल दरबार की परम्परा के अनुसार फरमानों पर तारीख मुसलमानी महीने तथा हिजरी दिये गये हैं। इन तारीखों का ईसवी महीना तथा सन्‌ इतिहासकारों ने गणना करके निकाला है। इस गणना में कहीं पर भारी भूल हुई जिसके कारण पहला फरमान दूसरा हो गया तथा दूसरा फरमान पहला स्वीकार कर लिया गया। यद्यपि दोनों दोनों फरमानों की भाषा लगभग एक ही है। इस कारण इस भूल से कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ना चाहिए था, परन्तु दूसरे फरमान में शाहजहाँ ने लिखा था, 'और इससे पूर्व भी एक प्रतिष्ठित एवं  कल्याणकारी राजकीय आदेश (शाही फरमान) जो समानों में श्रेष्ठ (राजा जयसिंह) के नाम इस सम्बन्ध में भेजा गया था।' इस प्रकार दूसरे फरमान को पहला मान लेने के कारण उपरोक्त भाषा इस तथाकथित पहले फरमान में होने के कारण यह मान लिया गया कि इन तीनों फरमानों से पहले भी शाहजहाँ द्वारा एक अन्य फरमान भी इस विषय पर राजा जयसिंह को भेजा गया था। पर्याप्त खोज के पश्चात्‌ भी जब चौथा (पहला) फरमान नहीं मिला तो उसे लुप्त हो गया मान लिया गया। जब मैंने इस विषय पर खोज की तो फारीस तारीखों के अनुसार यह सिद्ध हो गया कि वास्तव में दूसरा मान लिया  गया फरमान ही पहला है तथा पहला फरमान वास्तव में दूसरा है। इस प्रकार दूसरे फरमान में यह सत्य ही लिखा है कि इससे पूर्व भी आपको इस विषय पर लिखा जा चुका है। इस सत्य खोज के पश्चात्‌ हिन्दी में पहली बार इन फरमानों का अक्षरशः अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ।

प्रथम फरमान
'..........ज्ञात हो कि हमने मुल्कशाह को नई खानों से सफेद संगमरमर लाने के लिये आम्बेर (आमेर) भेजा है। और हम एतद्‌ द्वारा आदेश देते हैं कि आवश्यक संख्या में पत्थर काटने वाले और किराये की गाड़ियाँ पत्थर लाने के लिये जिनकी उपरोक्त मुल्कशाह को आवश्यकता पड़े, को राजा उपलब्ध करायेगा। और पत्थर काटने वालों का वेतन तथा गाड़ियों के किराये की व्यवस्था वह राजकीय कोषागार की राशि से करेगा। यह आवश्यक है कि राजा मुल्कशाह को इस मामले में हर प्रकार से सहायता करे और वह इसे अति आवश्यक समझे तथा इस आदेश के परिपालन में भूल न करें।'
लिखा गया तारीख २८ शनिवार, इलाही वर्ष ५
४ रवि अल अव्वल १०४२ हिजरी. दि २० सितम्बर सन्‌ १६३२।

दूसरा फरमान
'.... ज्ञात हो कि अकबराबाद तक इमारतों के लिये सफेद संगमरमर लाने के लिए बड़ी संखया में गाड़ियों की आवश्यकता है, और इससे पूर्व भी एक प्रतिष्ठित एवं कल्याणकारी राजकीय आदेश ........................ .......... आपके नाम भेजा गया था; इस सम्बन्ध में, इस समय अधिक महत्व देने के लिये हमने सय्यद इलाहादाद को आमेर तथा अन्य स्थानों को जाने के लिये जिनका विवरण इसके पृष्ठ पर टिप्पणी में दिया है तथा आवश्यक संख्या में किराये पर गाड़ियाँ सूची में दिये प्रत्येक भवन के लिये नियोजित करने के लिये नियुक्त किया है, और राजा ने पहले जितनी गाड़ियों का उन स्थानों से सफेद संगमरमर मकराना की खानों से लाने के लिये प्रबन्ध किया हो, उनका पूर्ण योग में नियोजन कर शेष (गाड़ियों) को उपरोक्त (सय्यद इलाहादाद) को उपलब्ध करा दे जिनको वह मकराना खानों तक सुरक्षित ले जाएगा।

और यह अति आवश्यक है कि यदि किसी विषय पर उपरोक्त (सय्यद इलाहादाद) राजा के पास जाये तो राजा हर प्रकार की सहायता और सहयोग देते हुए, कठोर परिपालन दर्शाते हुए ओर इस विषय में सभी सम्भव सावधानी बरते और न तो इस आदेश की अवज्ञा करें और न भूल।'
लिखा गया १५ बहमन, इलाही वर्ष ५
२३ रजब १०४२ हिजरी दिनांक ३ फरवरी सन्‌ १६३३।

[इस दूसरे फरमान के पृष्ठ पर नौ प्रशासनिक जिलों यथा आमेर, मुइज्जाबाद, फगुई, झाग, नरैना, रोशनपुर जाबनेर, महरोत तथा परबतसर से २३० गाड़ियों की व्यवस्था का विवरण है। साथ ही दिये गये जिले राजा जयसिंह की जागीर के अतिरिक्त राजा भोजराज, राजा गिरधर दास, राजा बेंत मल, राजा चेत सिंह, राजा बेथलदास तथा राजा राजसिंह सुपुत्र बिहारी दास की जागीरों के हैं।]


तीसरा फरमान
'.......ज्ञात हो कि हमारे ध्यान में लाया गया है कि आपके कर्मचारी आमेर तथा राजनगर में पत्थर काटने वालों को एकत्र कर रहे हैं। फलस्वरूप मकराना में पत्थर काटने वाले नहीं पहुँच रहे हैं। फलतः वहाँ पर कम काम हो रहा है। अस्तु।

हम आदेश देते हैं कि आप अपने आदमियों पर कठोर प्रभाव डालें कि वे किसी प्रकार भी आमेर एवं राजनगर में पत्थर काटने वालों को एकत्र न करें और जो भी पत्थर काटने वाले उपलब्ध हों उन्हें राजकीय प्रतिनिधियों के पास मकराना भेज दें। ओर इस विषय में निश्चित कार्यवाही करें और इस आदेश की न अवज्ञा करें और न ही भूलें और इसे अपना दायित्व समझें।'
लिखा गया आज के दिन तीर के नवें महीने में, इलाही वर्ष १०
७वां दिन सफर मास का, इसकी समाप्ति सुन्दर ढंग से तथा विजय से हो-हिजरी १०४७ वर्ष। १ जुलाई सन्‌१६३७।

उपरोक्त फरमानों को पढ़कर मेरे वह पाठक मित्र अवश्य ही रोमांचित हो उठे होंगे जिनका अभी भी यह विश्वास है कि ताजमहल का निर्माता शाहजहाँ ही था। क्यों न हो ? इन फरमानों में मकराना की खानों से संगमरमर पत्थर लाने के लिये दो अधिकारियों की नामित नियुक्ति की बात कही गई है। ताजमहल संगमरमर से बना है, तथा इन फरमानों में संगमरमर को राजधानी अकबराबाद (आगरा) लाने की बात ही कही गई है।

आइये इन फरमानों की सूक्ष्म समीक्षा करें।
फरमानों की समीक्षा के लिए अगले अंक का इंतज़ार करिए....
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रविवार, 25 दिसंबर 2011

ताजमहल की असलियत ... एक शोध -- 6


भाग -१, भाग - २, भाग - ३, भाग -४, भाग - ५  से आगे ---

०५) अन्य विदेशियों ने क्या देखा ?
आपने पढ़ा कि कुरान के लेखक अमानत खाँ शीराजी ने कुरान लेखन सन्‌ १६३९ में पूरा कर लिया था। अर्थात्‌ ताजमहल सन्‌ १६३१ तक कम से कम कुरान लेखन की ऊँचाई तक तो बन ही चुका था। उसके पश्चात्‌ ताजमहल  के चारों ओर बनाया गया ईंटों का मचान हटा दिया गया होगा, क्योंकि इसके ऊपर जाने के लिये भवन के अन्दर ही जीना बना हुआहै। इसके लगभग एक वर्ष बाद टैवर्नियर इस देश में आया था। उस समय तक ताजमहल पूरा हो चुका था अथवा कम से कम कुरान लिखे भाग तक तो पूरा हो ही चुका था। मचान हटाया ही जा चुका था। उसने सुना कि मचान बनाने पर जितना व्यय हुआ उतना सम्पूर्ण कार्य (कुरान लेखन) पर भी नहीं हुआ, अस्तु उसके द्वारा 'कहा जाता है' लिखना स्वाभाविक ही था। (इट इज सेड दैट दि स्काफोल्डिंग एलोन कॉस्ट मोर दैन दि एनटायरवर्क) यदि टैवर्नियर ने सन्‌ १६४० में मचान बना हुआ स्वयं देखा होता तो उसकी लेखन शैली कुछ इस प्रकार होती 'मैंने देखा कि' (उसे) इतना बड़ा मचान बनाना पड़ा कि उस पर आया व्यय मुख्य भवन से भी अधिक था'। मुख्य भवन इसलिये कि टैवनिर्यर के भक्तों के अनुसार टैवर्नियर का तात्पर्य पूरे ताजमहल के बनने से था, और सही भी है। २२ वर्ष में पूरा ताजमहल ही तो बनेगा। कुरान लेखन तो ८ वर्ष में ही हो गयाथा। पर यह सत्य नहीं है कि टैवर्नियर ने पूरा ताजमहल बनते देखा था। सत्य यह है कि ताजमहल को टैवर्नियर ने बना बनाया कुरान युक्त देखा था। ऊपर के आख्यान से सिद्ध है कि कुरान लेखन टैवर्नियर के आगमन से एक वर्ष से भी पूर्व समाप्त हो चुकाथा। कुरान लेखन की ऊँचाई के ऊपर मुख्य गुम्बज है, परन्तु इस गुम्बज का बनना कुरान लेखन के बाद प्रारम्भ नहीं हुआ था अपितु उससे पहले, बहुत पहले बन चुका था। कैसे ?

बादशाहनामा <http://tajmahal.gaupal.in/parishishtha/badasahanama> पर ध्यान दीजिए। पृष्ठ ४०३ की पंक्ति क्र. ३६, ३७ तथा ३८ के अनुसार 'उस आकाश चुम्बी बड़ी समाधि के अन्दर' ......... 'उस महान्‌ भवन में गुम्बज है'.........'जो आकार में बहुत ऊँचा  है'..........'वा इमारत ए आलीशान वा गुम्बजे'.... आदि आदि। अर्थात्‌ जिस समय सम्राज्ञाी के शव को दफन किया गया उस समय 'आकाश चुम्बी उस महान भवन पर गुम्बज था जो आकार में बहुत ऊँचा था।' तथा रानी के शव को दफन कब किया गया था ?अगले वर्ष। देखिये उसी पृष्ठ की पंक्ति ३५ अर्थात्‌ सन्‌ १०४२ हि. तदनुसार सन्‌१६३२ की जुलाई या उसके बाद।टैवर्नियर ने मात्र २० सहस्र कार्मिक कार्यरत बताये हैं, परन्तु कितने कर्मचारी क्या-क्या काम कर रहे थे, यह नहीं बताया है। इसके विपरीत सेबेस्टियन मनरिक का कथन अधिक स्पष्ट, सटीक एवं अधिकार पूर्ण प्रतीत होता है। कार्मिकों में उसे, अधिकारी, ओवरसियर एवं कारीगर मिले वे बगीचे, मार्ग, जल आदि के कार्य में लगे थे। इस प्रकार सन्‌ १६४० में मनरिक ने ताजमहल देखा तो उस समय ताजमहल के बाहर (मुख्य भवन से दूर) कार्य चल रहा था। कारीगरों में कोई भी फूल पत्ती बनाने वाला, पत्थर की कटाई या बेल बूटा बनाने वाला या कुरान लिखने वाला या राजमिस्त्री मनरिक को नहीं मिला था। इसके साथ ही मनरिक ने मुख्य भवन तो क्या किसी भी भवन को बनते हुए नहीं देखा। 

पाठकों की जिज्ञासा को शान्त करने के लिये यह स्पष्ट कर दूंकि से बेस्टियन मनरिक एक पुर्तगाली मिशनरी था तथा वह आगरा २४ दिसम्बर १६४० कोआया था तथा यहाँ पर २० जनवरी १६४१ तक रहा था। एक अन्य जर्मन यात्री अक्टूबर सन्‌ १६३८ में आया था, परन्तु उसे ताजमहल के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है। उसका नाम जे. ए. डी मैनडेल्सलो था। इसने किले का विस्तृत वर्णन किया है। आगरा नगर तथा यहां की गतिविधियों का भी उसने विस्तार से वर्णन किया है। 

एक अन्य अंग्रेज जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी का कर्मचारी था, पीटर मुण्डी, वह सन्‌ १६३१-१६३३ में आगरा आया था। वह १ जनवरी १६३१ से १७ दिसम्बर १६३१; १६ जनवरी १६३२ से ६ अगस्त १६३२ तथा २२ दिसम्बर १६३२ से २५ फरवरी १६३३ तक आगरा में रहा। १७ जून सन्‌ १६३१ को महारानी का देहान्त बरहानपुर में हुआ था। इस वर्ष वह आगरा में ही था, परन्तु रानी के देहान्त का समाचार आगरा आने के बारे में अथवा किसी राजकीय शोक के बारे में कुछ ने कुछ नहीं लिखा है। ८ जरवरी १६३२ को रानी का पार्थिव शरीर आगरा लाया गया था। १६ जनवरी १६३२ को मुण्डी पुनः आगरा आ गया था,परन्तु इस बारे में भी वह मौन है। पीटर मुण्डी के अनुसार शाहजहाँ आगरा में १ जिल्हाज सन्‌ १०४१ हिजरी तदनुसार १ जून सन्‌ १६३२ को आया था। यह १०४१ हि. काअन्तिम मास था और बादशाहनामा में लिखे अगले वर्ष के अनुसार रानी के शव को जुलाईमें अथवा उसके बाद दफनाया गया होगा। पीटर मुण्डी के बारे में विशेष बात यह है कि वह लिखता है कि आगरा में देखने योग्य वस्तुएं हैं, अकबर का मकबरा, किला, ताजमहल तथा बाजार। है न आश्चर्यजनक। पीटर मुण्डी २५ फरवरी १६३३ को आगरा से चला गया था, परन्तु साथ में ताजमहल की मधुर स्मृति भी ले गया था। अध बने नहीं, पूरे बने ताजमहल की स्पष्ट सिद्ध है कि ताजमहल २५ फरवरी १६३३ तक बन चुका था। बनने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि १ जनवरी १६३१ से २५ फरवरी १६३३ तक लगभग कुछ मासों को छोड़ कर वह आगरा में ही था। इस बीच ताजमहल के बनने की कोई कार्यवाही यदि हुई होती तो वह अवश्य लिखता। 


२०जून १६३१ को सम्राज्ञी के देहान्त के पश्चात्‌ २५ फरवरी १६३३ तक के १ वर्ष ८मास के समय में ताजमहल बन कर खड़ा हो गया, ऐसा तो केवल अलादीन के चिराग से ही सम्भव है, अन्यथा आज के मशीनी युग में भी २० हजार तो क्या २० लाख व्यक्ति लगानेपर भी इतने कम समय में ताजमहल का निर्माण सम्भव नहीं हैं बादशाहनामा के अनुसार जुलाई १६३२में (१ जून १६३२ को शाहजहाँ के आगरा आगमन के बाद) रानी के शव को 'बने हुए भवन में' दफन किया गया था जिसे पीटर मुण्डी ने भी बनी हुई दशा में देखा था। बाद में सन्‌ १६४० में टैवर्नियर ने भी देखकर लिखा 'कहा जाता है'... आदि।

इस प्रकार स्पष्ट है कि ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया नहीं था अपितु राजामानसिंह के भवन में दफनाया था जो उसने उनके पोते राजा जयसिंह से लिया था।अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि सन्‌ १६३१-३२ के बाद तो अनेक विदेशियों नेताजमहल देखा जिसमें से कइयों ने तो उसे बनते हुए भी देखा, चाहे उसे मैं कुरान लिखना मात्र मान रहा हूँ यदि ताजमहल रानी के देहान्त के पूर्व भी था तथा इसी दशा में था तो किसी अन्य विदेशी यात्री ने भी देखा होता अन्यथा यही सिद्ध होगा कि ताजमहल को सम्राज्ञी का शव दफन करने के बाद ही बनाया गया था।

आइये डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का लेखा देखें। फ्रँासिस्को पालसेर्ट उनका मुख्य अधिकारी आगरा में सन्‌ १६२० से १६२७ तक था। वह स्थानीय भाषा में पारंगत था। उसने सन्‌ १६२६ में एक रिपोर्ट बनाई थी। इस रिपोर्ट में वह आगरा का वर्णन निम्न प्रकार से करता है- इस नगर की चौड़ाई-लम्बाई का अनुपात बहुत कम है। इसका कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति नदी के किनारे ही बसना चाहता है। फलतः नदी के सामने अनेक भवन उच्चाधिकारियों के बने हैं, जिसके कारण यह भाग अत्यन्त सुन्दर एवं मनोरम हो गया। इसका विस्तार ६ कोस व ३ १/२ हालेन्ड के मी अथवा १० १/२ ब्रिटिश मील है। 

मैं इनमें से मुख्य भवनों का वर्णन क्रमानुसार कर रहा हूँ। उत्तर दिशा की ओर से प्रारम्भ करते हुए जो महल हैं, वे हैं बहादुर खान, राजाभोजराज १, इब्राहिम खान, रुस्तम कन्धारी, राजा किशनदास, इतिगाद खान २, शहजादाखानम ३, गौलजेऱ बेगम, खवाजा मुहम्मद थक्कर, खवाजा बन्सी, बजीर खान, योग फोरा (एक विशाल बाड़ा जिसमें स्वर्गीय सम्राट अकबर की विधवायें निवास करती हैं)  एहतिबारखाँ, बागड़ खान, मिर्जा अबू सगील, आसफ खान, इतिमादउद्‌दौला, खवाजा अब्दुल हसन,रुचिया सुल्तान बेगम के।इसके पश्चात्‌ किला है। किला पार करने के पश्चात्‌ नक्खास है, जो बड़ा बाजार है इसके आगे के भवन ऊँचे ओहदेदारों के हैं जैसे, मिर्जा अब्दुला, आगरा नूर, जहान खान, मिर्जा खुर्रम, राजा बेतसिंह४, स्वर्गीय राजामान सिंह, राजा माधौसिंह५। नदी के दूसरे छोर पर स्थित है नगर सिकन्दरा। सुन्दर बना हुआ जिसमें अधिकांश बनिया व्यापारी रहते हैं। क्या अब किसी को शंका रह जाती है कि सन्‌ १६२६ में किले से आगे राजा मानसिंह का महल था, जो शाहजहाँ के राज्याभिषेक से २ वर्ष पूर्व तथा सम्राज्ञी के देहान्त के ५ वर्ष पूर्व की रिपोर्ट में उल्लिखित है। १ से ४ : यह नाम शाहजहाँ के फरमानों में आये हैं। देखे परिशिष्ट  <http://tajmahal.gaupal.in/parishishtha/pharamana>

जारी ....
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बुधवार, 23 नवंबर 2011

ताजमहल की असलियत ... एक शोध -- 5


भाग - 1भाग - 2भाग -3, भाग -4 से आगे ....

 

 

०४) टैवर्नियर की समीक्षा

यद्यपि टैवर्नियर ने अपनी पुस्तक ''ट्रैवल्स इन इण्डिया'' में लिखा है कि ताजमहल का प्रारम्भ होना तथा पूरा होना उसने स्वयं देखा था, परन्तु उसकी यात्राओं से यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि वह इस देश की यात्रा करते समय न तो सन्‌ १६३१-३२ में ही इस देश में था और न ही वह सन्‌ १६५३ में उत्तर भारत में आया था।

टैवर्नियर ने आगे लिखा है 'इस पर उन्होंने २२ वर्षों का समय लिया जिसमें २० सहस्र व्यक्ति लगातार कार्यरत रहे।' बीस सहस्र कामगारों की संख्या एवं उनके सतत कार्यरत रहने की बात महत्वपूर्ण है। सतत कार्यरत रहने से तात्पर्य है कि इस अवधि में जो भी व्यक्ति वहां पर आया होगा उसे इतनी संख्या में कामगार मिले होंगे। सम्भव है कि किसी दिन कम हो गये होंगे तो १८-१६१५ नहीं तो दस हजार कार्मिक तो मिले ही होंगे, परन्तु नहीं। फ्रे. सेबेस्टियन मनरिक जो एक पुर्तगाली यात्री था और लगभग उसी समय आया था जिस समय टैवर्नियर प्रथम बार आया था अर्था्‌ सन्‌ १६४०-४३ की शरद ऋतु में, उसने मात्र १,००० (एक हजार) कार्मिकों को कार्यरत पाया जिसमें ओवरसियर, अधिकारी एवं कार्मिक सम्मिलित और उनमें से अधिकांश बाग में कार्यरत थे, छायादार कुंज लग रहे थे, सुशोभित मार्ग बना रहे थे, सड़कें बना रहे थे एवं स्वच्छ जल की व्यवस्था कर रहे थे क्या एक सहसत्र एवं बीस सहस्र की संख्या में भयानक असामंजस्य नहीं है ? क्या मनरिक, विदेशी, प्रबुद्ध एवं निष्पक्ष लेखक नहीं है ?

सम्भव है जिन दिनों में मनरिक ताजमहल देखने गया हो उन दिनों एक सहस्र व्यक्ति ही कार्यरत रहे हों, अथवा उसका आकलन गलत रहा हो। आइए टैवर्नियर की कसौटी पर ही उसे कसते हैं। टैवर्नियर ने अपनी पुस्तक के प्रथम खण्ड के पृष्ठ ४६ पर लिखा है 'एक मजदूर को कुल मिलाकर रु. ४ प्रति मास देना होता है और यदि मात्रा लम्बी हो तो रु. पांच।'

शाहजहाँ शासक था, अतः अपने मजदूरों को बहुत कम वेतन देता होगा। बेगार की प्रथा भी उन दिनों में थी तथा दास प्रथा भी। फिर भी मजदूरों को कम से कम पेट-भर भोजन और कुछ वस्त्र तो देता ही होगा और यदिइस पर मात्र एक रुपया मासिक व्यय मान लें, साथ ही हर छोटे-बड़े कार्मिक पर भी एक रुपया मासिक ही रखें तो २० सहस्त्र व्यक्तियों का २२ वर्ष का केवल वेतन (भोजन वस्त्र) ही हुआ रु. बावन लाख अस्सी हजार मात्र। ईंट, गारा, चूना, पत्थर, संगमरमर एवं अन्य बहुमूल्य पत्थरों का मूल्य अलग से। काम में आने वाले उपकरणों-औजारों का मूल्य अलग से एवं पत्थर आदि सामान की ढुलाई अलग से। आदि-आदि।

हमारे पास फारसी लेखकों एवं यूरोपीय लेखकों के अनुसार २५ व्यक्तियों के नामों की सूची है जिनको २०० रु. से लेकर एक हजार रु. तक प्रतिमाहस वेतन दिया जाता था और जिन्होंने ताजमहल बनाने का कार्य किया थां इन २५ कार्मिकों का मासिक वेतन ११,३१५ रु. आता है इसमें २६४ मास का गुणा करने पर रु. २९,८७,१६० मात्र २२ वर्ष का वेतन आता है। इसके अतिरिक्त यदि अर्धकुशल एवं कुशल कारीगरों का वेतन ५-१० रुपये प्रतिमाहस, पर्यवेक्षकों एवं अधिकारियों का वेतन रु. २० से २०० रुपये तक प्रतिमास मान कर चलें तो मात्र वेतन पत्रक कई करोड़ रुपये हो जायेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार मजदूरी एवं निर्माण-सामग्री के मध्य १० : ८ का मूल्यानुपात रहता है, परन्तु यदि सामग्री बहुमूल्य हो तो यह अनुपात बढ़भी सकता हैं टैवर्नियर के २२ वर्ष एवं बीस सहस्र की संखया के अनुसार ताजमहल के बनाने पर शाहजहाँ ने ३०-४० करोड़ रुपये व्यय किये होंगे, जबकि २०वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक किसी भी विशेषज्ञा ने इसका (ताजमहल का) मूल्य २-३ करोड़ रुपये से अधिक नहीं कूता था। इन सबके विपरीत बादशाहनामा में व्यय मात्र चालीस लाख रुपये लिखा है देखें पृष्ठ ४०३ अन्तिम पंक्ति, 'आफरीन चिहाल लाख रुपियाह अखरजते एैन इमारत बर आवुर्द नमूदन्द' अर्थात्‌ इस भवन पर चालीस लाख रुपया व्यय किया गया।

तर्क तो बहुत सुन लिये अब एक कुतर्क करके भी देख लें। शाहजहाँ कहता है कि उसने मात्र ४० लाख रुपये इस भवन पर व्यय किये थे। मनव प्रकृति के अनुसार यदि २-३० लाख रुपये व्यय किये होंगे तभी ४० लाख लिखे होंगे। आज के समयानुसार नम्बर दो का पैसा शाहजहाँ ने व्यय नहीं किया था जो (आयकर से) छिपाने के लिये कई करोड़ व्यय कर मात्र ४० लाख लिखाता। इन ४० लाख का बंटवारा सब (छोटे-बड़े) २० सहस्र मजदूरों में कर दीजिये तो प्रत्येक को २०० रुपये की विशाल राशि हाथ लगेगी। इस राशि में उनका सपरिवार जीवनयापन २२ वर्ष के छोटे समय में कितनी सरलता से बिना महंगाई के उस स्वर्णिम-काल में होगया होगा, यह कल्पना की बात नहीं, वास्तविकता है। टैवर्नियर महादेय के लिये क्योंकि प्रति परिवार को प्रतिमास के लिये बारह आने (पचहत्तर नये पैसे) अर्थात्‌ ढाई नया पैसा प्रतिदिन जो मिल रहा था। धन्य है हमारे विद्वान्‌ इतिहासज्ञाता जो कम पढ़े-लिखे टैवर्नियर को विदेशी एवं निष्पक्ष मानते हुए इतना अधिक मान देते हैं। साथ ही पता नहीं क्यों पीटर मुण्डी, सेबेस्टियन मनरिक आदि की ओर ध्यान नहीं देते हैं। और तो और अपने देशवासी बादशाहनामा के रचियता मुल्ला अब्दुल हमीद लाहोरी को भी नकार देते हैं। ताजमहल का बनना प्रारम्भ होते तथा समाप्त होते देखना क्या लाहोरी के लिये सम्भव नहीं रहा होगा ? अरे ! उसने तो लगभग प्रतिवर्ष का कार्य देखा होगा चाहे वह एक वर्ष का रहा हो, १० वर्ष का अथवा २२ वर्ष का, परन्तु क्या कहें हम अपनी बुद्धि को। सन्‌ १६३१ में पेरिस में बैठा हुआ टैवर्नियर सच्चा है और अपने हाथों से सम्राज्ञी को मिट्‌टी देने वाला अब्दुल हमीद लाहोरी झूठा है। कम पढ़ा लिखा टैवर्नियर विश्वसनीय है, परन्तु महान्‌ विद्वान्‌ लाहोरी (जिसकी विद्वता के कारण शाहजहाँ ने अवकाश प्राप्त कर लेने के बादभी बादशाहनामा की रचना करने के लिये विशेष रूप सेबुलाकर उसे नियुक्त किया था) गप्पी है।

डॉ. बाल के अनुसार टैवर्नियर इस देश की किसी भाषा को नहीं जानता था तथा दुभाषिये की सहायता लेता था, जबकि इसी मिट्‌टी में पला-बढ़ा अब्दुल हमीद अनेक भाषाओं का ज्ञाता था। दुभाषिये की सहायता लेने के कारण अनेक स्थानों पर एवं ताजमहल के बारे में भी टैवर्नियर ने लिखा है 'सुना जाता है' अथ्वा 'सुना गया है'। इसके विपरीत लाहोरी के वर्णन में वास्तविकता तथा अधिकार-बोध स्पष्ट है।

अब एक अन्य विचित्र परिस्थिति पर भी ध्यान दीजिये। किसी भवन को बनाते समय जब उसकी ऊँचाई पर्याप्त हो जाती है, उस समय कारीगरों को ऊँचाई पर काम करने के लिए एवं सामग्री, ईंट गारा आदि पहुँचाने के लिए बांस-बल्ली, जाली आदि के द्वारा एक मचान तैयार किया जाता हैं इस मचान पर कई चढ़ाईदार मार्ग भी बना लिया जाता है। इसके ऊपर ही खड़े होकर कारीगर निर्माण-कार्य करते हैं तथा इसके द्वारा ही मजदूर ऊपर सामान पहुँचाते हैं। पुराने ऊँचे भवनों की मरम्मत अथवा परिवर्तन-परिवर्द्धन के समय भी इसी प्रकार की व्यवस्था की जाती है। समय-समय पर आगरा में आज भी मरम्मत करने के लिये ताजमहल तथा जामा मस्जिद के किसी एक खण्ड पर इस प्रकार की बाड़ या मचान देखा जा सकता है यद्यपि यह लोहे का है।

इस सन्दर्भ में टैवर्नियर ने लिखा है कि मचान बनाने पर पूरे कार्य से अधिक व्यय हुआ क्योंकि लकड़ी (बांस-बल्ली आदि) उपलब्ध न होने के कारण उन्हें ईंटों का प्रयोग करना पड़ा-साथ ही साथ मेहराब को सम्भालने के लिये। है न आश्चर्यजनक कथ्य ? मचान बनाने पर आने वाला व्यय साधारणतः मजदूरी में ही जोड़ा जाता है, अर्थात्‌ यह उपरिलिखित १० : ८ भाग की मजदूरी का भी एक अति छोटा अंश होता है। यदि इसे मजदूरी में न भी जोड़ें तो भी यह पूरे भवन पर हुए व्यय का अति छोटा अंश होता है।

अब हमारा कार्य सरल हो गया है। ताजमहल को ईंटों की दीवार से घिरवा दीजिये। उस पर जितना व्यय आयेगा उससे कम में भवन पर कुरान शरीफ की खुदाई का कार्य हो जायेगा। टैवर्नियर ने अपने लेख में 'महान कार्य' (ग्रेट वर्क) 'पूरा कार्य) (एनटायर वर्क) आदि शब्दों का ही प्रयोग किया है, न कि भवन निर्माण का। मुसलमान लोग कुरान को सदैव आदर सहित कुरान शरीफ कह कर पुकारते हैं। अतः एक विदेशी की दृष्टि में यह 'महान कार्य' ही हुआ अर्थात्‌ कुरान शरीफ का लिखना और यदि बादशाहनामा पर ध्यान दें, यह कार्य चालीस लाख रुपये में या उससे भी कम में परिपूर्ण हो जायेगा।

किसी भी महान्‌ कार्य अथवा आविष्कार से अपने को जोड़ कर अमर हो जाने की यूरोपियनों में प्रवृत्ति रही है। टैवर्नियर की इसी लालसा ने उससे यह लिखवाया कि वह इस कार्य का प्रारम्भ से अन्त तक का प्रत्यक्षदर्शी था। दूसरे संस्करण की प्रस्तावना में डॉ. बॉल ने सत्य ही कहा है, 'इतिहासकार के रूप में टैवर्नियर पर विश्वास नहीं किया जा सकता।'

कुरान शरीफ लिखने के बाद इसके लेख अमानत खाँ शीराज़जी ने अपना नाम तथा तारीख १०४८ हिजरी-सम्राट के शासन काल का १२वाँ वर्ष (सन्‌ १६३९) अर्थात् टैवर्नियर के भारत आगमन से एक वर्ष से अधिक पूर्व कुरान लेखन पूरा हो गया था तथा मचान हटा दिया गया था। अतः टैवर्नियर ने मचान देखा ही नहीं था। इसी कारण वह कहता है, ''कहा जाता है कि मचान बनाने पर ''पूरे कार्य'' से अधिक व्यय हुआ।''

कैसे विरोधाभास पर हम भारतीय आंख मूंद कर विश्वास कर लेते हैं ? एक ओर तो हम उसे ताजमहल बनने का प्रारम्भ से अन्त तक का प्रत्यक्षदर्शी मानते हैं, दूसरी ओर वही विदेशी, यूरोपीय, निष्पक्ष टैवर्नियर स्वीकार करता है कि जितने दिन मचान लगा रहा उतने दिन 'मैं' स्वयं उपस्थित नहीं था।मचान बनाने पर पूरे कार्य से अधिक व्यय हुआ ऐसा मैंने ''सुना था''

सोचिये :
यदि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया होता तो मचान ताजमहल, के ऊपर गुम्बज पर कलश लग जाने के बाद ही उतारा जाता। उसके बाद ही टैवर्नियर आगरा जाता ऐसी दशा में वह ताजमहल के प्रारम्भ तथा समापन का तथा बाईस वर्षों के कार्य प्रत्यक्षदर्शी कैसे मान लिया गया? है न आश्चर्य?
है किसी के पास समुचित उत्तर ?


जारी .... 
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रविवार, 9 अक्टूबर 2011

ताजमहल की असलियत ... एक शोध -- 4




भाग - 1, भाग - 2, भाग -3 से आगे ----

 

०३) टेवर्नियर : एक खोज

पाठकों को आश्चर्य हो रहा होगा कि जब स्वयं शाहजहाँ का कथन है कि मुमताज उज-ज़मानी को बने हुए भवन में दफनाया गया था तब संसार में यह क्यों तथा कैसे प्रसिद्ध हुआ कि शाहजहाँ ने अर्जुमन्द बानों बेगम के शव को दफनाने के लिये महान्‌ आश्चर्यजनकभवन का निर्माण कराया था जो बाद में 'ताजमहल' के नाम से प्रसिद्ध हुआ यही नहीं इसके साथ ही यह भी प्रसिद्ध हुआ कि इस विशाल भवन को बनाने में २२ वर्ष तक २०,००० श्रमिक कार्य करते रहे थे। यह अपने आप में एक अनोखी कहानी है और इस सारे श्रम के मूल को प्राप्त करने के लिये हमको तथ्यों की गहरी छानबीन करनी पड़ेगी।

दुर्भाग्य से इस देश ने विदेशियों को आवश्यकता से अधिक ही मान-सम्मान प्रदान किया है, विशेष कर गोरी चमड़ी वालों को। उनके ज्ञान का हम लोहा मानते रहे हैं। इसका नवीनतम प्रमाण है 'योग'। आज से भी कुछ दशक पहले योग को कुछ विद्वान्‌ एवं मनीषी ही जानते थे। वही 'भारतीय योग' जब विदेश भ्रमण कर भारत वापस आया तो 'योगा' के नाम से इसे 'घर-घर में सम्मानीय स्थान मिल गया। इसी प्रकार ताजमहल का इतिहास जानने के लिये भी हमने पश्चिम की ओर देखा और जिसने भी जो कुछ लिख दिया उसे ही आँख मूँद कर सत्य की पराकाष्ठा के रूप में स्वीकार कर लिया, बिना यह विचारे के लेखक का मन्तव्य क्या है, वह किन परिस्थितियों में लिख रहा है, किन बातों ने उसे प्रभावित किया है अथवा वह इस देश तथा रीति-रिवाज से कितना परिचित हो सका है, आदि।

जीन बैपटिस्ट टैवर्नियर (१६०५ - १६८१) पेरिस निवासी फ्राँसीसी रत्न व्यापारी था। इसने अपनी यात्रा के वर्णन 'ट्रेवल्स इन इण्डिया) नामक पुस्तक में लिखे हैं। इस पुस्तक का सबसे पहला प्रकाशन फ्रेंच भाषा में सन्‌ १६७६ में हुआ था। डा. वी. बाल ने इस पुस्तक को अंग्रेजी में अनूदित कर दो खण्डों में मैकमिलन एण्ड कम्पनी, लन्दन द्वारा सन्‌ १८८९ में प्रकाशित कराया था। इस पुस्तक के प्रथम खण्ड में पृष्ठ १०९-१११ पर टेवर्नियर ने ताजमहल का वर्णन किया है। उसने अन्य बातों में साथ ही लिखा है— मैंने इस महान कार्य को प्रारम्भ होते तथा परिपूर्ण होते देखा है। इस पर उन्होंने २२ वर्षों का समय लिया जिसमें २०,००० (बीस सहस्र) व्यक्ति लगातार कार्यरत रहे।......... कहा जाता है कि मचान बनाने पर 'पूरे कार्य' से अधिक व्यय हुआ, क्योंकि लकड़ी (बांस बल्ली आदि) उपलब्ध न होने के कारण उन्हें ईंटों का प्रयोग करना पड़ा (साथ ही साथ) महराब को संभालने के लिये।

उपरोक्त कथन स्पष्ट एवं सपाट है। बिना लाग लपेट के लेखक ने अपनी बात कही है, इसीलिये इस कथन को इतना अधिक महत्व दिया गया कि इसे ही शाहजहाँ द्वारा ताजमहल निर्माण के प्रमाणस्वरूप उद्धृत किया जाने लगा एवं इसी कथन को आधार मानकर ताजमहल का निर्माण-काल सन्‌ १६३१ से सन्‌ १६५३ ई. माना गया।

उपरोक्त कथन की विवेचना एवं समीक्षा करने से पूर्व मैं कोई तर्क, वितर्क अथवा कुतर्क न करते हुए कुछ प्रश्न चिह्न लगाना चाहूँगा। 


  • क्या किसी बात को केवल इसीलिये महत्व दिया जाए कि वह किसी विदेशी विशेषकर यूरोपियन ने कही है? 
  • क्या प्रत्येक यूरोपियन को ज्ञान सम्पन्न-पंडित स्वीकार कर लिया जाए चाहे वह टैविर्नियर के समान ही बहुत कम पढ़ा लिखा हो ? 
  • क्या साधारण यात्रा-वृत्त को सम्पूर्ण इतिहास मान आँख मूँद कर स्वीकार कर लिया जाय? 
उत्तर सम्भवतः, नहीं में आयेगा।

टैविर्नियर ने जिस आत्म-विश्वास से लिखा है, उससे सम्भव है पाठकों ने यह अनुमान लगाया हो कि टैवर्नियर लगातार २२ वर्षों तक ताजमहल का बनना देखता रहा होगा। अथवा इसी मुहिम का एक कार्यकर्ता रहा होगा। कुछ पाठकों ने यह भी सोचा होगा कि सम्भवतः वह २२ वर्षों तक आगरा आता-जाता रहा होगा, कम से कम सन्‌ १६३१ में कार्य प्रारम्भ होते समय तथा सन्‌ १६५३ में कार्य समाप्त होते समय तो वह अवश्य ही उपस्थित रहा होगा। क्योंकि तभी वह इस महान्‌ कार्य का साक्षी हो सकता है। दुर्भाग्य से टैवर्नियर इन दोनों अवसरों पर उपस्थित नहीं था। मात्र इतने से ही यह सिद्ध हो जाता है कि टैवर्नियर के कथन में सत्य का अंश न्यून है, इसके पश्चात्‌ किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं रहती है।

डॉ. बाल के प्राक्कथन के पृष्ठ १४ के अनुसार टैवर्नियर आगरा में सबसे पहली बार सन्‌ १६४०-४१ की शरद ऋतु में आया था। अर्थात्‌ टैवर्नियर के अनुसार ताजमहल सन्‌ १६४० के अन्तिम मासों में बनना प्रारम्भ हुआ होगा? क्या भूतकाल का इतिहास लेखक एवं आज का प्रबुद्ध पाठक इसे स्वीकार करेगा? नहीं, परन्तु कुतर्क के आधार पर मैं स्वीकार कर लेता हूँ कि सन्‌ १६४० में टैवर्नियर के आगरा आगमन के बाद ही ताजमहल का निर्माण प्रारम्भ हुआ होगा। टैवर्नियर झूठ क्यों बोलेगा? वह विदेशी है, यूरोपीय है, निष्पक्ष है। यहाँ की किसी जाति-विशेष से उसका कोई सम्बन्ध नहीं था और सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह अपने को प्रत्यक्षदर्शी कहता है। क्योंकि किसी भी शव को भूमि में दफन करने के कितने ही वर्षों बाद उसके ऊपर मकबरा बनाया जा सकता है तो यहाँ भी सन्‌ १६४० में बनना प्रारम्भ हो सकता है, परन्तु यहाँ पर हम यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बादशाहनामा में स्पष्ट उल्लेख हे कि साम्राज्ञी के शव को खुली भूमि में नहीं अपितु बने हुए भवन में दफनाया गया था। साथ ही भवन को उपयुक्त अवस्था में लाने के लिये उसे कुछ मास के लिये बाहर बाग में रखा गया था। अतः यह सिद्ध होता है कि टैवर्नियर ने ताजमहल के बनने का प्रारम्भ नहीं देखा था।

क्या टैवर्नियर के कथन का दूसरा अंश सत्य है? क्या टैवर्नियर ने ताजमहल परिपूर्ण होते हुए देखा था ? अनेक इतिहासकारों का मत है कि ताजमहल का निर्माण-काल सन्‌ १६३१ से सन्‌ १६५३ ई. था। सम्भव है यह धारणा टैवर्नियर के ही इस कथन से बनी हो कि इस कार्य पर २२ वर्षों तक निरन्तर कार्य हुआ। यदि हम १६५३ को ताजमहल के बनने का समापन वर्ष मानें तो उस समय टैवर्नियर के स्वकथनानुसार उसे उस वर्ष ताजमहल के पास ही होना चाहिए था।

यह सत्य है कि टैवर्नियर ने सन्‌ १६५१-५५ में भारत वर्ष की यात्रा की थी, परन्तु इस यात्रा में वह आगरा तो क्या उत्तर भारत में भी नहीं आया था। टैवर्नियर की उस यात्रा के स्थल इस प्रकार रहे थे। डॉ. बाल के अनुसार वह मछलीपट्‌टनम्‌-मद्रास-गन्डेफोट-गोलकुण्डा-सूरत-अहमदाबाद-सूरत-अहमदाबाद और अन्त में सूरत होकर वापस फ्रांस चला गया था। इस प्रकार इस यात्रा में वह आगरा आया ही नहीं था। अतः सन्‌ १६५३ में उसके द्वारा ताजमहल परिपूर्ण होते देखना सिद्ध नहीं होता है।

अब भी एक शंका तो रह ही जाती है। सम्भव है टैवर्नियर ने सत्य ही लिखा हो और ताजमहल वास्तव में सन्‌ १६४१-६३ (२२ वर्ष) में ही बना हो और इस प्रकार टैवर्नियर ने इस कथन का प्रारभ तथा समापन स्वयं देख हो, क्योंकि अपनी चौथी भारत यात्रा के दौरान वह सन्‌ १६५७-६२ में भारत वर्ष में था।

ध्यान दें : 
सन्‌ १६५८ ई. में औरंगज़ेब ने सम्राट शाहजहाँ को गद्‌दी से उतार कर लाल किले में बन्दी बना लिया था, जहाँ से अनेक विद्वानों के अनुसार वह आंसू भरी आंखों से ताजमहल को ताका करता था अर्थात्‌ बने हुए भवन को न कि अधबने भवन को जिसे पूरा होने में अभी ५ वर्ष और लगने बाकी थे। किसी ने भी यह नहीं कहा कि शाहजहाँ ताजमहल को बनते हुए बन्दीगृह से देखा करता था। किसी ने यह नहीं कहा कि ताजमहल बनाना शाहजहाँ ने प्रारम्भ किया था, परन्तु औरंगजे़ब ने अपने पिता द्वारा प्रारम्भ किये हुए कार्य को पिता को बन्दी बनाकर भी माता के प्रति भक्तिभाव से पूरा किया था। इतिहास में स्पष्ट लिखा है कि चित्तौड़गढ़ का विजय स्तम्भ बनाना तो राणा कुम्भा ने प्रारम्भ किया था, परन्तु उसकी मृत्यु के उपरान्त उसे पूरा उनके पुत्र ने किया था। कोई औरंगजे़ब जैसे शासक से यह आशा कैसे कर सकता है कि वह इस प्रकार के फालतू कामों पर एक पैसा भी खर्च करता जिसके अपनी कंजूसी के कितने ही चर्चे प्रसिद्ध हैं।

अस्तु, यह अब स्वयं सिद्ध है कि टैवर्नियर ने ताजमहल का प्रारम्भ एवं समापन नहीं देखा था।


ज़ारी....
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