शनिवार, 17 सितंबर 2011

ताजमहल की असलियत ... एक शोध -- 2


गतांक से आगे 

 

तथ्यान्वेषण

हमारे आस-पास दैनिक घटनाओं का एक चक्र सतत प्रवाहमान्‌ रहता है। उनमें से कुछ प्रमुख एवं महत्वपूर्ण घटनाएं इतिहास में भी स्थान पा जाती हैं। इतिहास में अंकित यह घटनाएँ प्रायः विवाद का विषय रही हैं। कारण, इतिहास-लेखन होने तक अधिकांश प्रत्यक्षदर्शी एवं अंतरंग जानकार या तो इस संसार से प्रस्थान कर चुके होते हैं अथवा कई कारणों से मुख नहीं खोल पाते। एक अन्य कारण भी है। कुछ स्वार्थी एवं सम्बद्ध-पक्ष घटनाओं के सत्यपक्ष पर भ्रम का ऐसा पर्दा डाल देते हैं कि वह उजागर होकर जन-साधारण तक आ ही नहीं पाती एवं समय-अन्तराल की धूल उस पर लगातार जमती रहती है तथा उसे और अधिक प्रच्छन्न कर देती है। ऐसी दशा में इतिहास-लेखन अत्यन्त क्लिष्ट कार्य हो जाता है। इतिहास लेखक को निष्पक्ष होने के साथ ही साथ उसकी अत्यन्त खोजपूर्ण दृष्टि का होना भी अति आवश्यक है। इस दृष्टि के लिये स्वातंत्र्य वीर सावरकर एवं वृन्दावनलाल वर्मा के नाम गौरव से लिये जा सकते हैं, जिन्होंने अतीत के लुप्त सूत्रों को जोड़ते हुए सत्य का सुन्दर कालीन बुन डाला ऐसा ही एक उदाहरण ताजमहल है।

आज प्रत्येक पुस्तक, नाटक, कविता, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के माध्यम से लगातार यही बताया जाता है कि ताजमहल को शाहजहाँ ने बनवाया था। प्रतिदिन ताजमहल देखने आने वाले देसी-विदेशी यात्रियों को भी अधकचरे गाइड यही घुट्‌टी पिलाते हैं एवं इसे रोचक बनाने के लिये अनेक घटनाएँ तथा कहानियाँ जोड़ देते हैं। यथा, शाहजहाँ की पटरानी अत्यन्त सुन्दरी थी, शाहजहाँ उससे प्राणपण से प्रेम करता था, मरते-समय रानी ने सम्राट्‌ से वचन लिया था कि वह रानी के लिये एक भव्य-स्मारक का निर्माण करायेगा आदि-आदि। 

सन्‌ १९६५ में श्री पु. ना. ओक नेइस मत का सशक्त खण्डन प्रबल प्रमाणों के आधार पर किया था, परन्तु उस समय के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष-जनों ने इसे मात्र हिन्दुत्व के प्राधान्य को सिद्ध करने का प्रयास-मात्र मानकर गम्भीरता से नहीं लिया। फिर भी, सत्यान्वेषणार्थियों को एक मार्ग तो मिल ही गया था। शोध चलता रहा। भारत में कम, भारत के बाहर अधिक कार्य हुए। आज ऐतिहासिक, पुरातात्विक, वास्तु एवं स्थापत्य कला के ही नहीं अपितु पुष्ट वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया जा सकता है कि जैसा ताजमहल हम आज देख रहे हैं वैसा ही शाहजहाँ के जन्म से पूर्व भी खड़ा था। शाहजहाँ ने उसमें कब्र बनवाई है, कुरान की आयतें लिखवाई हैं एवं कुछ छोटे-मोटे अन्य परिवर्तन ही कराये हैं। आइये सत्यशोधन हेतु हम शाहजहाँ के समकालीन एवं पराकालीन लेखों एवं प्रमाणों की निष्पक्ष समीक्षा करें।

सबसे पहले  हम शाहजहाँ के स्वयं द्वारा अनुमोदित अभिलेखों की समीक्षा करें तो पायेंगे कि शाहजहाँ बड़ी स्पष्टता एवं ईमानदारी के साथ कहता है कि रानी का स्वर्गवास बुरहानपुर में हआ था तथा उसे वहीं दफना दिया गया था। बाद में उसका शव अकबराबाद (आगरा) लाया गया एवं उसे राजा मानसिंह के भव्य भवनमें, जो उस समय उनके नाती राजा जयसिंह के स्वामित्व में था, दफना दिया गया था। भवन के बारे में वह बताता है कि वह भव्य-भवन विशाल फलदार वृक्षों से घिरा आकाश चुम्बी है एवं उसके ऊपर गुम्बज है। इस सारे वर्णन में शाहजहाँ न तो भवन तोड़ने की बात कहता है और न ही किसी प्रकार के नये निर्माण की ही। वह तो बिना लाग-लपेट स्पष्ट कहता है राजा जयसिंह से भवन लेकर उसमें रानी के शव को दफनाया था। पाठकों को इस कथन पर सन्देह हो रहा होगा कि यह असम्भव कथन शाहजहाँ द्वारा अनुमोदित कैसे हो सकता है? आइये प्रमाण देखें।

प्रथम मुगल बादशाह बाबर अपनी दैनिकी लिखता था, जिसमें वह प्रत्येक दिन की घटित घटनाओं का सटीक वर्णन लिखता था। जब वह भारत आया तो यहाँ पर उपलब्ध सब्जियों-फलों के नाम तथा भाव, अपने देश से उनकी तुलना आदि उसने सभी कुछ लिखा है। यह पुस्तक ''बाबरनामा' कहलाई। इसी प्रथा को आगे बढ़ाया अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ ने, परन्तु थोड़ा बदल कर। उन्होंने स्वयं न लिखकर अपने दरबार में एक विद्वान्‌ को इतिहास लेखन के लिये नियुक्त किया, जिन्होंने इन बादशाहों के काल में घटित घटनाओं का कहीं सत्य तथा कहींअतिरंजित वर्णन किया, क्योंकि स्पष्ट है कि निष्पक्ष इतिहास लेखन इनका विषय न होकर अपने शाह का चरित्र ऊँचा दिखना और उसे प्रसन्न रखना ही इनका इष्ट था। इस प्रकार दरबारी भाँडों, भाटों एवं चारणों में तथा इनमें मात्र इतना ही अन्तर था कि इनका पद गरिमामय था तथा इनकी भाषा साहित्यिक थी। अस्तु, हमको इस अतिरंजना से बचते हुए सत्यान्वेषण करना है।

तो हम बता रहे थे कि अकबर के काल में ''आइन-ए-अकबरी' एवं जहाँगीर के काल में 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' लिखी गईं जब शाहजहाँ शासनारूढ़ हुआ तो उसे भी एक ऐसे ही विद्वान्‌  की आवश्यकता हुई जो दरबार में इस पद को सम्भाले। उस समय पटना में मुल्ला अब्दुल हमीद लाहोरी अपने अवकाश के दिन व्यतीत कर रहे थे। उन्हें सादर दरबार में बुलाया गया तथा इस कार्य पर नियुक्त किया गया। मुल्ला ने १६०० पृष्ठों में शाहजहाँ काल के पहले २० वर्षों का इतिहास लिखा है जिसका नाम 'बादशाह नामा' रखा गया। मुल्ला का मूल लेखन फारसी में है तथा इसका सर्वप्रथम प्रकाशन बंगाल की रॉयल एशियटिक सोसायटी द्वारा किया गया था, सन्‌ १८६७ में। इसके मुख्य सम्पादक थे मेजर डब्ल्यू. एन. लीसे तथा सम्पादक मण्डल में थे मौलवी कबीर अलदीन तथा मौलवी अब्द अल रहीम। संयोग देखिये दो मुस्लिम और एक ईसाई। आइये देखें, इस पुस्तक में मुल्ला अब्दुल हमीद लाहोरी ताजमहल के बारे में क्या लिखता है ?

उक्त बादशाहनामा तीन खण्डों में है। इस १६०० पृष्ठों के महाग्रन्थ में ताजमहल के बारे में मात्र एक दो-पृष्ठ ही लिखे गऐ हैं। जिस ताजमहल के बारे में संसार-भर में सैकड़ों लेखकों, कवियों और इतिहासकारों ने लाखों पृष्ठ लिख डाले, यदि उसे शाहजहाँ ने बनाया होता तो क्या लाहोरी स्वयं उसका अतिरंजित वर्णन नहीं करता ? जैसा कि पराकालीन लेखकों ने लिखा है। क्या समकालीन मुल्ला स्वयं नहीं लिख सकता था कि सारे संसार से अभिकल्प (डिजायन) मँगाये गये, पर शाहजहाँ को कोई नहीं भाया, फिर एक भा गया। किस -किस प्रकार से मूल्यवान पत्थर कितनी मात्रा में तथा किस भाव में मँगाये गये थे, आदि। बादशाहनामा में यह भी लिखा होता कि इस भवन की नींव कब रखी गई, कितने दिनों में यह तैयार हुआ एवं इसमें कितने मजदूरों-कारीगरों आदि ने कार्य किया था।

बादशाहनामा के प्रथम खण्ड के पृष्ठ ४०२ पर २२ पंक्तियाँ लिखी गई हैं इनमें से प्रथम २० पंक्तियों में जिस घटना का वर्णन है, उस सम्बन्धका ताजमहल से नहीं है। पंक्ति क्र. २१ तथा २२ एवं पृष्ठ ४०३ की १९ पंक्तियों में इस घटना का पूर्ण एवं रोचक वर्णन किया गया है। यहाँ पर पहले मूल फारसी पाठ को नागरी लिपि में दे रहा हूँ। उर्दू के जानकार पाठक उससे कुछ अनुमान लगा सकेंगे। तत्पश्चात्‌ उसका हिन्दी रूपान्तर पाठकों के हित के लिये दे रहा हूँ। हिन्दी अनुवाद अंग्रेजी लेख को देखकर किया गया एवं हिन्दी में ऐसा प्रथम प्रयास है, अस्तु । सम्भव है किसी स्थल पर उपयुक्त शब्द न लिखा गया हो। यदि पाठकगण ऐसी किसी भूल को इंगित करेंगे तो आभारी रहूँगा।

बादशाहनामा पृष्ठ ४०२ की अन्तिम २ पंक्तियां
२१. रोज़ ए जुमा हफ्दहूम जमाद इल अव्वल नाशे मुक़द्‌दसे मुसाफिरे अक्लीमे,
२२. मुकद्‌दुस हज़रत मेहद आलिया मुमताज़ उजजमानीरा केह बा तारीक ए अ अमानत मुदाफून
हिन्दी अनुवाद पृष्ठ ४०२ बादशाहनामा
२१. शुक्रवार १७ जमादिल अव्वल साम्राज्य की यात्री का वह पवित्र शव।
२२. पाक हजरत मुमताज़ उल ज़मानी का जो अस्थायी रूप से दफनाया गया था को भेजा गया।
बादशाहनामा पृष्ठ ४०३ की प्रथम १९ पंक्तियाँ
१. बूद मसाहूब ए बादशेहजादए नामदार मुहम्मद शाह शुजा बहादुर अ वजीर खान,
२. वा सती उन्‌निसा खानम केह बा मिज़ाज़शानासी वा कारदानी बा दारजा ए आओलई पेश,
३. दास्ती व वकालत एलान मालिके जहान मलिकाए जहानियान रसीदेह बूद, वाने-ए
४. दारुल खलाफाएं अकबराबाद नामूदन्द वा हुक्म शुद केह हर रोज़ दर राह आश ए बिसीयार
५. वा दाराहीम व दानानीरे बेशुमार बा फुक्रा वा नयाज़्मदान बीबीहन्द, वा जमीने दर
६. निहायत रिफात वा निजाहत केह जुनूबरू ए आन मिस्र जामा अस्त वा
७. पेश अज़ एैन मंज़िल ए राजाह मानसिंह बूद वदारी वक्त बा राजाह जयसिंह
८. नबीर ए ताल्लुक दश्त बारा-ए-मदफान ए आन बहिश्त मुवात्तन बार गुज़ीदन्द 
९. अगर चेह राजा जयसिंह हुसूल ए एैन दावलातरा फोज़े अज़ीम दानिश्त अनमाब
१०. अज़रू ए एहतियात के दर जमीय ए शेवन खुसूसन उमूरे दीनीएह नागुजिर अस्त
११. दर अवाज़ आन आली मज्जिल ए अज़ खलीसा ए शरीफाह बदू मरहत फरमूदन्द
१२. बाद अज रसीदाने नाश बा आन शहर ए करामत बहर पंजदहून ज़मादी उस्‌ सानी एह।
१२. सालए आयन्देह पैकारे नूरानी ए आन आसमानी जौहर बा खाके पाक सिपुर्देह आमद
१३. सालए आयन्देह पैकारे नूरानी ए आन आसमानी जौहर बा खाके पाक सिपुर्देह आमद
१४. वा मुतसद्‌दीयान-ए-दारुल खिलाफाह बा हुक्मे मुअल्ला ए अजालातुल वक्त तुरबत ए फलक मरताबते
१५. आनजहाऩ इफ्फत्रा अज नज़र पोशीदन्द वा इमारते ए आलीशान वा गुम्बजे
१६. रफी बुनियान केह ता रस्तखीज़ दर बलन्दी यादगारे हिम्मत ए गर्दून रिफात
१७. हजरते साहिब करह ए सानी बाशेद वा दर उस्तुवारी नमूदारे इस्तीगमत
१८. अजायम बनी तरह अफगन्दन्द वा मुहन्दिसाने दूरबीन बा मैमारान ए सानत
१९. आफरीन चिहाल लाख रुपियाह अखरजते एैन इमारत बर आवुर्द नमूनदन्द
बादशाह नामा के पृष्ठ ४०३ का हिन्दु अनुवाद
१. साथ में थे राजकुमार मुहम्मद शुजा बहादुर, वजीर खान।
२. और सती उन्‌ निसा खानम जो परलोकगामिनी की प्रकृति से विशेष परिचित थी।
३. और अपने कर्त्तव्य में अत्यन्त निपुण थी तथा उस रानियों की महारानी के विचारों का प्रतिनिधित्व करती थी, आदि।
४. उसे (पार्थिव शरीर को) राजधानी अकबराबाद (आगरा) लाया गया और उसी दिन एक आदेश प्रसारित किया गया।
५. यात्रा के समय (मार्ग में) अनगिनत सिक्के फकीरों और गरीबों में बाँटे जाएं वह स्थल।
६. महान्‌ नगर के दक्षिण में स्थित विशाल मनोरम रसयुक्त वाटिका (बाग) से घिरा हुआ, और
७. उसके बीच का वह भवन जो मानसिंह के महल के नाम से प्रसिद्ध था, इस समय राजा जयसिंह के स्वामित्व में था।
८. जो पौत्र थे, कोरानी को दफपाने के लिये चुना गया जिसका स्थान अब स्वर्ग में था।
९. यद्यपि राजा जयसिंह इस अत्यन्त प्रिय पैत्रक सम्पत्ति को उपहार में दे सकते थे,
१०. फिर भी अत्यन्त सतर्कता बरतते हुए जो धार्मिक पवित्रता तथा गमी के समय अति आवश्यक है।
११. उस महान भवन के बदले उन्हें सरकारी भूमि का एक टुकड़ा दिया गया।
१२. १५ जमादी उस सानी को उस महान्‌ नगर में पार्थिव शरीर आने के बाद,
१३. अगले वर्ष उस भव्य शव को पवित्र भूमि को सौंप दिया गया।
१४. उस दिन राजकीय आदेश के अन्तर्गत राजधानी के अधिकारियों ने उस आकाश चुम्बी बड़ी समाधि के अन्दर,
१५. उस धार्मिक महिला को संसार की दृष्टि से छिपा दिया, उस महान भवन में जिस पर गुम्बज है।
१६. जो अपने आकार में इतना ऊँचा स्मारक है, आकाश आयामी साहस।
१७. साहिब क़रानी सानी (सम्राट) का और शकित में इतना पुष्ट।
१८. अपने संकल्प में इतनी दृढ़-नींव रखी गई और दूरदर्शी ज्यामितिज्ञों और कुशल कारीगरों (द्वारा)
१९. इस भवन पर चालीस लाख रुपये व्यय किये गये।

उपरोक्त लेख का सारांश निम्न प्रकार बनता है :
'मुमताज़ उज ज़मानी का पार्थिव शरीर १७ जमादिल अब्बल को आगरा भेजा गया जो वहाँ पर १५ जमादिलसानी को पहुँचा था। शव को दफनाने के लिये जो स्थ्ल चुना गया, वह नगर के दक्षिण स्थित राजा मानसिंह के महल के नाम से जाना जाता था। वह महल आकार में विशाल, भव्य, गगनचुम्बी गुम्बजयुक्त एवं बहुत विशाल बाग से घिरा था। अगले वर्ष राजाज्ञा से अधिकारियों ने शव को दफनाया। कुशल ज्यामितिज्ञों एवं कारीगरों को लगाकर (कब्र बनाने की) नींव डाली और इमारत पर ४० लाख रुपये व्यय हुआ।'' इससे निम्नलिखित तथ्य स्पष्ट उभर कर सामने आते हैं :
१. रानी को राजा मानसिंह के महल में दफनाया गया था।
२. जिस महल में दफनाया गया था उसके वर्णन में और आज के ताजमहल में विचित्र साम्य है, कोई अन्तर नहीं है।
३. महल को गिराने का कहीं वर्णन नहीं है।
४. (गिरा कर पुनः बनाया गया, ऐसा वर्णन न होने पर भी) जिस समय दफनाया गया था उस समय वह बड़ी समाधि आकाश चुम्बी, महान एवं गुम्बज युक्त थी।
५. दफनाते समय शाहजहाँ उपस्थित नहीं था।
६. अगले वर्ष दफनाया गया था। रानी की मृत्यु बरहानपुर में हुई थी तथा उसे वहीं दफना दिया गया था। उसे वहाँ से निकालकर आगरा इसलिये लाया गया होगा कि यहाँ पर कोई विशेष प्रबन्ध उसे दफनाने के लिये किया गया होगा। यदिविशेष प्रबन्ध नहीं था तो शव आगरा लाया क्यों गया था ? कुछ दिन वहीं दफन रहने दिया होता। यदि आगरा शव आ ही गया था तो उसे तुरन्त दफना कर १० वर्षों बाद भी २२ वर्ष तक समाधि बनाई जा सकती थी ? क्या इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि शव आने तक भवन उपलब्ध नहीं था अथवा उसमें आवश्यक फेर बदल किये जा रहे थे क्योंकि भवन देर से उपलब्ध हो सका था।

पाठकगण एक बात पर और ध्यान दें कि शाहजहाँ अपनी परम प्रियरानी को दफन करने स्वयं नहीं आया था।

बादशाहनामा में स्वयं में यह पूरी घटना है। इसके आगे १०-१२ या २२ वर्ष तक बाजमहल बनने का कोई विवरण नहीं है। लाहोरी के अनुसार अगले वर्ष दफ़न करने के साथ कब्र बनाई एवं काम पूरा हो गया। बाद में जो कुछ अन्य लेखकों द्वारा अन्यत्र लिखा गया वह झूठ एवं कल्पना पर आधारित ही माना जाएगा। उसका समकालीन प्रमाण कोई उपलब्ध नहीं है।




जारी ......
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"ताजमहल की असलियत"  पोस्ट-माला की प्रकाशित पोस्टें --

16 टिप्‍पणियां:

  1. सुज्ञ जी और अमित जी कृपया मेरी सहायता करें.... ताजमहल की असलियत मुझसे फ़ैल गयी है. संभाले नहीं संभल रही.. अब क्या करूँ? .. ये तो होना ही था.

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  2. सच तो काफ़ी लोगों को पता भी है कुछ बारीकियाँ लोगों को बतानी बाकि है। वो आप बखूबी कर रहे हो।

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  3. आदरणीय भाई प्रतुल जी
    इस बारे में पता तो था, परन्तु इतनी जानकारी नहीं थी| आपने विस्तार से शोधपरक आलेख लिखा है, जो कि बहुत लाभदायी सिद्ध होगा|
    दरअसल ताज महल से जुडी कुछ तस्वीरें मैंने देखीं थीं, जिनमे ताजमहल को एक प्राचीन शिव मंदिर दिखाया गया है| कुछ गुप्त दरवाज़े भी हैं, जिन्हें खोला नहीं जाता|
    आखिर कुछ तो राज़ की बात है|

    अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी|

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  4. आदरणीय भाई प्रतुल जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    ताजमहल की असलियत ... एक शोध के लिए आभार ! बहुत सारे तथ्य पहली बार संदर्भों सहित पढ़ने को मिले हैं । लगन और श्रम से तैयार शृंखला के लिए आभार !

    पहली कड़ी भी पढ़ नहीं पाया … अभी देखूंगा ।

    पुनश्चः
    राष्ट्रहित और जन जागरण हेतु निरंतर सक्रिय रहने के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  5. ताजमहल के बारे में यही पढ़ा था की वो पहले शिव मंदिर था ... केवल सतही जानकारी थी .. इस शोध पूर्ण लेख के माध्यम से काफी जानकारी मिल रही है ..

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  6. इस शोध पूर्ण लेख के माध्यम से काफी अच्छी जानकारी मिल रही है ..अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी| आभार..

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  7. प्रतुल जी,

    पाठको को स्वयं चिंतन कर तथ्य स्थापित करने में सहायता देता यह शोध प्रबंध है। शोधार्थी इस आलेख से तथ्यपूर्ण संदर्भ प्राप्त कर सकेंगे। यह अतिउत्तम और सार्थक प्रयास है। शून्य से अद्भुत प्रमाण प्राप्त किए गये है।

    प्रतुल जी, ताजमहल की असलियत फ़ैल नहीं गयी बल्कि वास्तविकता प्रसारित होती ही है।

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  8. इस लेख के लिए आभार...

    आपके ब्लॉग को यहां जोड़ा है (सामूहिक ब्लॉग सूची) मे
    1 ब्लॉग सबका

    फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  9. राम राम प्रतुल जी,



    इस शोध श्रृंखला को प्रकाशित करते ने के लिए आपका आभार और अभिनन्दन!ऐसे कितने ही शोध सत्यता को तो दर्शाते है पर स्वयं लुप्त हो जाते है!इसके पीछे कारण चाहे जो भी रहते हो पर सच एक बार फिर तिनके की ओत में खड़ा मुस्कुराता रह जाता है!



    ऐसी ही एक बहस पहले भी चली थी ब्लॉग-जगत में!तब भी इस सोच को गलत बताने वाले बहुत से जन इक्कट्ठे हो आये थे,इस बार वो सरे पता नहीं कहा चले गए.....



    आपको ढेरो शुभकामनाये है जी....



    कुँवर जी,

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  10. बहुत ही रचनात्मक और सुंदर पोस्ट बधाई

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  11. पु.ना. ओक के ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में पढा तो था पर विश्वास नही हुआ क्यूं कि इस तरह का वास्तुशिल्प तो भारत में और कहीं नही दिखता सिवाय मुस्लिम वास्तुओं के । इरान में इस प्रकार की इमारते हैं तेहरान में भी और आशफान में भी । यदि इतनी सुंदर इमारत पहले से थी तो किसी और पर्यटक ने इसका उल्लेख क्यूं नही किया । मंदिर अवश्य रहा होगा पर इसके बारे में अधिक शोध की और ठोस सबूतों की आवश्यकता है ।

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    उत्तर
    1. आशा जी ! निवेदन करना चाहूंगा कि पुरुषोत्तम नारायण जी की उक्त पुस्तक में उन्होंने क्रोनोलोजिकल ऑर्डर में इतिहास के जिन तथ्यों का उद्घाटन किया है उन्हें जानने के बाद उस पर विश्वास न करने का कोई कारण नहीं बनता. दूसरी बात यह कि अभी तक किसी भी इतिहासकार ने उनके एक भी तथ्य का खंडन नहीं किया है. ताजमहल के कुछ हिस्से अभी भी आम जनता के लिए वर्ज्य हैं. इन हिस्सों में महालय के टूटे हुए हिस्से और मूर्तियों के टुकड़े हैं....अच्छा होगा यदि पुरातत्व विभाग द्वारा निष्पक्षतापूर्वक इस सबकी जाँच कर सत्य को भारत और पूरे विश्व के समक्ष उद्घाटित किया जाय.

      हटाएं
  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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