मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

मांसाहार प्रचारकों के कुतर्कों का खण्ड़न।

निरामिष: मांसाहार प्रचारकों के कुतर्की जाल का खण्ड़न।


मांसाहारी प्रचारक:- - "हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित"

“हालाँकि हिन्दू धर्म ग्रन्थ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना ली, क्यूंकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे.”

प्रत्युत्तर : वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है, यह देखिए-

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

इस सच्चाई को जानने के बाद जैन-मार्ग से प्रभावित मानने का प्रश्न ही नहीं उठता। हां, कभी आगे चलकर बाद में प्रवर्तित यज्ञों में पशुबलि रूप कुरीति का विरोध अवश्य जैन मत या बौद्ध मत नें किया होगा, लेकिन वह मात्र परिमार्जन था। फिर भी अगर प्रभावित भी हुआ हो तो वह अपने ही सिद्धान्तों का जीर्णोद्धार था । सुसंस्कृति अगर किसी भी संसर्ग से प्रगाढ होती है तो उसमें बुरा क्या है? क्या मात्र इसलिये कि अहिंसा आपकी अवधारणाओं से मेल नहीं खाती? धर्म का मूल अहिंसा, सर्वे भवन्तु सु्खिनः सूक्त के लिए एक आवश्यक सिद्धांत है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "पेड़ पौधों में भी जीवन"

“कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.”

प्रत्युत्तर : अतीत में ऐसे किन लोगों का मानना था कि पेड़-पौधो में जीवन नहीं है? ऐसी 'ज़ाहिल' सभ्यताएं कौन थी? आर्यावर्त में तो सभ्यता युगारम्भ में ही पुख्त बन चुकी थी, अहिंसा में आस्था रखने वाली आर्य सभ्यता न केवल वनस्पति में बल्कि पृथ्वी, वायु, जल और अग्नी में भी जीवन को प्रमाणित कर चुकी थी, जबकि विज्ञान को अभी वहां तक पहुंचना शेष है। अहिंसा की अवधारणा, हिंसा को न्यून से न्यूनत्तम करने की है और उसके लिए शाकाहार ही श्रेष्ठ माध्यम है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "पौधों को भी पीड़ा होती है"

“वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञान कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं …………अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.”

प्रत्युत्तर : हाँ, उसके बाद भी सूक्ष्म हिंसा कम अपराध ही है, इसी में अहिंसक मूल्यों की सुरक्षा है। एक उदा्हरण से समझें- यदि प्रशासन को कोई मार्ग चौडा करना हो, उस मार्ग के एक तरफ विराट निर्माण बने हुए हो, जबकि दूसरी तरफ छोटे साधारण छप्परनुमा अवशेष हो तो प्रशासन किस तरफ के निर्माण को ढआएगा? निश्चित ही वे साधारण व कम व्यय के निर्माण को ही हटाएंगे।  जीवन के विकासक्रम की दृष्टि से अविकसित या अल्पविकसित जीवन की तुलना में अधिक विकसित जीवों को मारना बड़ा अपराध है। रही बात पीड़ा की तो, अगर जीवन है तो पीडा तो होगी ही, वनस्पति जीवन को तो छूने मात्र से उन्हे मरणान्तक पीडा होती है। पर बेहद जरूरी उनकी पीडा को सम्वेदना से महसुस करना। सवाल उनकी पीड़ा से कहीं अधिक, हमारी सम्वेदनाओं को पहुँचती चोट की पीडा का है।जैसे कि, किसी कारण से बालक की गर्भाधान के समय ही मृत्यु हो जाय, पूरे माह पर मृत्यु हो जाय, जन्म लेकर मृत्यु हो, किशोर अवस्था में मृत्यु हो, जवान हो्कर मृत्यु हो या शादी के बाद मृत्यु हो। कहिए किस मृत्यु पर हमें अधिक दुख होगा? निश्चित ही अधिक विकसित होने पर दुख अधिक ही होगा। छोटे से बडे में क्रमशः  हमारे दुख व पीडा महसुस करने में अधिकता आएगी। क्योंकि इसका सम्बंध हमारे भाव से है। जितना दुख ज्यादा, उसे मारने के लिए इतने ही अधिक क्रूर भाव चाहिए। अविकसित से पूर्ण विकसित जीवन की हिंसा करने पर क्रूर भाव की श्रेणी बढती जाती है। बडे पशु की हिंसा के समय अधिक असम्वेदनशीलता की आवश्यकता रहती है, अधिक विकृत व क्रूर भाव चाहिए। इसलिए प्राणहीन होते जीव की पीड़ा से कहीं अधिक, हमारी मरती सम्वेदनाओं की पीड़ा का सवाल है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!"

“एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.”

"कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए."

प्रत्युत्तर : एकेन्द्रिय  और पंचेन्द्रिय को समझना आपके बूते से बाहर की बात है, क्योकि आपके उदाहरण से ही लग रहा है कि उसे समझने का न तो दृष्टिकोण आपमें है न वह सामर्थ्य। किसी भी पंचेन्द्रिय प्राणी में, एक दो या तीन इन्द्रिय कम होने से, वह चौरेन्द्रिय,तेइन्द्रिय,या बेइन्द्रिय नहीं हो जाता, रहेगा वह पंचेन्द्रिय ही। वह विकलांग (अपूर्ण इन्द्रिय) अवश्य माना जा सकता है, किन्तु पाँचो इन्द्रिय धारण करने की योग्यता के कारण वह पंचेन्द्रिय ही रहता है। उसका आन्तरिक इन्द्रिय सामर्थ्य सक्रिय रहता है। जीव के एकेन्द्रीय से पंचेन्द्रीय श्रेणी मुख्य आधार, उसके इन्द्रिय अव्यव नहीं बल्कि उसकी इन्द्रिय शक्तियाँ है। नाक कान आदि तो उपकरण है, शक्तियाँ तो आत्मिक है।और रही बात सहानुभूति की तो निश्चित ही विकलांग के प्रति सहानुभूति अधिक ही होगी। अधिक कम क्या, दया और करूणा तो प्रत्येक जीव के प्रति होनी चाहिए, किन्तु व्यवहार का यथार्थ उपर दिए गये पीड़ा व दुख के उदाहरण से स्पष्ट है। भारतीय संसकृति में अभयदान देय है, न्यायाधीश बनकर सजा देना लक्ष्य नहीं है।क्षमा को यहां वीरों का गहना कहा जाता है, भारतिय संसकृति को यूँ ही उदार व सहिष्णुता की उपमाएं नहीं मिल गई। विवेक यहाँ साफ कहता है कि अधिक इन्द्रीय समर्थ जीव की हत्या, अधिक क्रूर होगी।

आपको तो आपके ही उदाह्रण से समझ आ सकता है………

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, आप के दूसरे भाई के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं। वह जवान होता है, और वह किसी आरोप में फांसी की सजा पाता है ।तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह उस भाई को छोड दें, क्यूंकि इसकी दो इन्द्रियाँ कम हैं, और वह सज़ा-ए-फांसी की पीड़ा को महसुस तो करेगा पर चिल्ला कर अभिव्यक्त नहीं कर सकता, इसलिए यह फांसी उसके बदले, इस दूसरे भाई को दे दें जिसकी सभी इन्द्रियाँ परिपूर्ण हैं, यह मर्मान्तक जोर से चिल्लाएगा, तडपेगा, स्वयं की तड़प देख, करूण रुदन करेगा, इसे ही मृत्यु दंड़ दिया जाय। क्या आप ऐसा करेंगे? किन्तु वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे। क्योंकि आप तो समझदार(?) जो है। ठीक उसी तरह वनस्पति के होते हुए भी बड़े पशु की घात कर मांसाहार करना बड़ा अपराध है।

यह यथार्थ है कि हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है। पर विवेक यह कहता है कि जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। न्यून से न्यूनतम हिंसा का विवेक रखना ही हमारे सम्वेदनशील मानवीय जीवन मूल्य है। वनस्पति आदि सुक्ष्म को आहार बनाने के लिए हमें क्रूर व निष्ठुर भाव नहीं बनाने पडते, किन्तु पंचेन्द्रिय प्राणी का वध कर अपना आहार बनाने से लेकर,आहार ग्रहण करने तक, हमें बेहद क्रूर भावों और निष्ठुर मनोवृति की आवश्यकता होती है। अपरिहार्य हिंसा में भी द्वेष व क्रूर भावों के दुष्प्रभाव से  अपने मानस को सुरक्षित रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । यही तो भाव अहिंसा है। अहिंसक मनोवृति के निर्माण की यह मांग है कि बुद्धि, विवेक और सजगता से हम हिंसकभाव से विरत रहें और अपरिहार्य हिंसा को भी छोटी से छोटी बनाए रखें, सुक्ष्म से सुक्ष्मतर करें, न्यून से न्यूनत्तम करें, अपने भोग को संयमित करते चले जाएं।

अब रही बात जैन मार्ग की तो, जैन गृहस्थ भी प्रायः जैसे जैसे त्याग में समर्थ होते जाते है, वैसे वैसे, योग्यतानुसार शाकाहार में भी, अधिक हिन्साजन्य पदार्थो का त्याग करते जाते है। वे शाकाहार में भी हिंसा त्याग बढ़ाने के उद्देश्य से कन्दमूल, हरी पत्तेदार सब्जीओं आदि का भी त्याग करते है।और इसी तरह स्वयं को कम से कम हिंसा की ओर बढ़ाते चले जाते है।

जबकि मांसाहार में, मांस केवल क्रूरता और प्राणांत की उपज ही नहीं, बल्कि उस उपजे मांस में सडन गलन की प्रक्रिया भी तेज गति से होती है। परिणाम स्वरूप जीवोत्पत्ति भी तीव्र व बहुसंख्य होती है।सबसे भयंकर तथ्य तो यह है कि पकने की प्रक्रिया के बाद भी उसमे जीवों की उत्पत्ति निरन्तर जारी रहती है। अधिक जीवोत्पत्ति और रोग की सम्भावना के साथ साथ यह महाहिंसा का कारण है। अपार हिंसा और हिंसक मनोवृति के साथ क्रूरता ही मांसाहार निषेध का प्रमुख कारण है।

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

अहिंसा सूक्त (विश्व अहिंसा दिवस पर विशेष)

"अहिंसा सकलो धर्मः।" (अनुशासन पर्व- महाभारत) 
भावार्थ:- सभी प्रकार की धार्मिक और सात्विक प्रवृत्तियों का समावेश केवल अहिंसा में हो जाता है।

"हिंसा परो दमः।" (अनुशासन पर्व- महाभारत)
 भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ आत्मनिग्रह है। 

"अहिंसा परमं दानम्।" (पद्म-पुराण) 
 भावार्थ:- अहिंसा स्वरूप अभयदान ही परम दान है। 

"अहिंसा परमं तपः।" (योग-वशिष्ट) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सबसे बड़ी तपस्या है। 

"अहिंसा परमं ज्ञानम्।" (भागवत-स्कंध) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। 

"अहिंसा परमं पदम्।" (भागवत-स्कंध) 
भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वोत्तम आत्मविकास अवस्था है। 

"अहिंसा परमं ध्यानम्।" (योग-वशिष्ट) 
भावार्थ:- अहिंसा की परिपालना ही उत्कृष्ट ध्यान है।

"अहिंसैव हि संसारमरावमृतसारणिः।" (योग-शास्त्र) 
भावार्थ:- अहिंसा ही संसार रूप मरूस्थल में अमृत का मधुर झरना है। 

"रूपमारोग्यमैश्वर्यमहिंसाफलमश्नुते।" (बृहस्पति स्मृति) 
भावार्थ:- सौन्दर्य, नीरोगता एवं ऐश्वर्य सभी अहिंसा के फल है। 

"अहिंसया च भूतानानमृतत्वाय कल्पते।" (मनु-स्मृति) 
भावार्थ:- अहिंसा के फल स्वरूप, प्राणियों को अमरत्व पद की प्राप्ति होती है। 

"ये न हिंसन्ति भूतानि शुद्धात्मानो दयापराः।" (वराह-पुराण) 
भावार्थ:- जो प्राण-भूत जीवों की हिंसा नहीं करते, वे ही आत्माएं पवित्र और दयावान है।

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

ताजमहल की असलियत ... एक शोध -- 8

०७ फरमानों की समीक्षा

फरवरी माह के आलेख में आपने शाहजहाँ द्वारा आमेर के राजा जयसिंह के नाम भेजे गये तीन राज्यादेश (फरमान) पढ़े। यह तीनों लगभग एक ही विषय पर केन्द्रित हैं कि राजा जयसिंह अपने राज्य में स्थित मकराना की खानों से संगमरमर पत्थर भिजवाने की व्यवस्था करें। इन फरमानों का अब तक यही अर्थ लगाया जाता रहा है कि सफेद संगमरमर से बने ताजमहल को शाहजहाँ ने ही बनवाया था जिसका पुष्ट प्रमाण है कि सम्राज्ञी मुमताज उज ज़मानी की मृत्यु के पश्चात्‌ शाहजहाँ ने संगमरमर अकबराबाद मंगवाने के लिये फरमान जारी किये, परन्तु वास्तवकिता इसके विपरीत है। इन फरमानों का गहन अध्ययन ही यह सिद्ध करेगा किशाहजहाँ ने ताजमहल नहीं बनवाया था।

तर्क में कुछ लोग कहेंगे कि फरमानों में संगमरमर लाने की बात कही गई है, परन्तु उसी संगमरमर से ताजमहल बनाया गया, ऐसा स्पष्ट तो क्या संकेत मात्र भी कहीं नहीं है। अतः यह सिद्ध नहीं होता कि मकराना से लाये गये पत्थर से ताजमहल ही बनाया गया था। सम्भव है उस पत्थर का किसी अन्य भवन के बनाने में प्रयोग किया गया हो ? मैं इस तर्क को कुतर्क ही मानूंगा। अनेक प्रमाणों के आधार पर यह स्वयं सिद्ध है कि उपरोक्त फरमानों के आधार पर मकराना की खानों से लाये गये सफेद संगमरमर का प्रयोग ताजमहल में ही किया गया था। आप कहेंगे कि यह दोहीर बात कैसी ? एक ओर आप कह रहे हैं कि लाये गये पत्थर का प्रयोग शाहजहाँ ने ताजमहल में किया था तथा साथ ही साथ यह भी कह रहे हैं कि ताजमहल शाहजहाँ ने नहीं बनवाया था। हाँ ! यह दोनों बातें ही सत्य हैं, परन्तु कृपया कुछ प्रतीक्षा कीजिये।

सम्राज्ञी मुमताज उज ज़मानी का देहान्त आधुनिक मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र की सीमा पर बसे बुरहानपुर नामक स्थान पर दिनांक १७ जिल्काद १०४० हिजरी तदनुसार १७ जून सन्‌ १६३१ ई. को हुआ था तथा उसे वहीं ताप्ती नदी के तट पर जैऩाबाद नामक स्थान पर दफना दिया गया था। शव को दफनाने का प्रमाण है कि ८ दिन पश्चात्‌ शाहजहाँ ताप्ती नदी पार कर कब्र पर गया था। तत्पश्चात्‌ ४ जुलाई सन्‌ १६३१ (४ जिल्हज १०४० हिजरी) को प्रथम गुलाब जल छिड़कने की रस्म भी वहीं पर पूरी की गई। आगे बादशाहनामा कहता है कि १७ जमादिल अव्वल १०४१ हिजरी (११ दिसम्बर सन्‌ १६३१) को सम्राज्ञी के शव को आगरा ले जाया गया जो वहाँ १५ जमादिल आखिर १०४१ हिजरी (८ जनवरी सन्‌ १६३२) को पहुँचा और उसे दफनायां न जाकर ताजमहल परिसर में रख दिया गया। क्यों ? आइए गवेषणा करें।

राजा मानसिंह के महल (ताजमहल) पर शाहजहाँ एवं मुमताज महल की निगाह जहाँगीर के शासनकाल से थी। उसके स्वयं के शासन के प्रथम तीन वर्ष अति व्यस्तता (शासन सुधारने, विद्रोहों का दमन करने तथा दक्षिण के कुछ राज्यों पर आक्रमण करने) में बीते। इसी समय सम्राज्ञी का देहान्त हो गया। शाहजहाँ को यह एक अच्छा अवसर अनायास मिल गया तथा बादशाहनामा के अनुसार, 'महानगर के दक्षिण में स्थित विशाल मनोरम रसयुक्त वाटिका से घिरा हुआ और उसके बीच का वह भवन जो मानसिंह के महल के नाम से प्रसिद्ध था को रानी को दफनाने के लिये चुना गया।'

इस विषय पर तर्क-वितर्क न करते हुए कि राजा का महल ही क्यों चुना गया, हम सीधे विषय पर आते हैं। महल का चुनाव कर लेने के पश्चात्‌ उसके स्वामी राजा जयसिंह को महल सम्राट्‌ को दे देने के लिये कहा गया। स्पष्ट है कि इस अन्याय से जयसिंह असमंजस में पड़ गया। उसने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। उसे समझाने का बहुत प्रयास किया गया, परन्तु काम न बना और लगभग पाँच मास का समय बीच गया। तब एक भीषण षड्‌यन्त्र के तहत सच्चा या झूठा (इसलिये कि रानी की असली कब्र तो आज भी बुरहानपुर में बिना खुदी सही दशा में उपलब्ध है) एक शव लाकर महल परिसर में राजा जयसिंह पर दबाव बनाने के लिए रख दिया गया। राजा जयसिंह को, 'धार्मिक पवित्रता तथा दुख के अवसर 'की महत्ता बताई गई, परन्तु राजा टस से मस न हुआ। इसीलिये शव लगभग ६ः मास उसी परिसर में पड़ा रहा। अन्ततः राजा को झुकना पड़ा तथा वह महल छोड़कर आमेर चला गया। रानी के शव को कब दफनाया गया, वह दिनांक कहीं उपलब्ध नहीं है। बादशाहनामा में मात्र इतना इंगित है उसे अगले वर्ष दफनाया गया। मुसलमानी वर्ष १ मुहर्रम से प्रारम्भ होता है और गणना के अनुसार उस वर्ष यह दिनांक १९ जुलाई सन्‌ १६३२ को पड़ा था। यह आवश्यक नहीं कि शव इसी दिन दफनाया गया हो, क्योंकि बादशाहनामा के अनुसार, 'अगले वर्ष उस भव्य शव को..... आकाश चुम्बी बड़ी समाधि के अन्दर............जिस पर गुम्बज है..............पवित्र भूमि को सौंप दिया।' हम कल्पना कर सकते हैं कि शव को १९ जुलाई के पश्चात्‌, परन्तु २० सितम्बर से पूर्व किसी दिन दफनाया गया। इस कार्य से निपटने के पश्चात्‌ षड्‌यन्त्रकारियों ने निश्चय किया कि सम्भव है राजा जयसिंह पुनः अपने महल को वापस लेने के प्रयास करें अस्तु इसमें रानी की कब्र बनवा दी जाये तथा कुरान लिखा दी जाय। इस कार्य के लिये संगमरमर पत्थर की आवश्यकता थी, क्योंकि पूरा महल सफेद संगमरमर का बना हुआ था। शाहजहाँ का दुर्भाग्य कि पत्थर भी राजा जयसिंह की ही जागीर में उपलब्ध था। राजा कहीं भड़क न जाय ताजमहल का नाम न लिख कर पहले फरमान में मात्र पत्थर काटने वाले तथा किराये की गाड़ियों की बात कही गई है।

इस बात को दूसरे ढंग से अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। प्रश्न यह उठता है कि रानी को दफन करने के तुरन्त बाद शाहजहाँ को संगमरमर की आवश्यकता क्यों पड़ गई ? यहाँ पर मैं यह स्पष्ट करना अपना कर्त्तव्य मानता हूं कि नींव से लेकर ऊपर का बड़ा प्रांगण तथा उसके ऊपर संगमरमर का बना चबूतरा तथा उसके ऊपर का विशालकाय संगमरमर का भवन गुम्बज सहित, सम्पूर्ण लाल पत्थर तथा ईंटों का बना हुआ है। जो भाग संगमरमर का बना दिखाई पड़ता है वहां पर ईंट की १३ फीट मोटी दीवाल पर मात्र ६ इंच मोटा संगमरमर दोनों ओर चिपका है। अतः स्पष्ट है कि यदि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया होता तो उसे धौलपुर की खानों से लाल पत्थर तथा स्थानीय भट्‌ठों से ईंट की व्यवस्था करनी पड़ती तथा जब १२-१४ वर्ष में पूरा महल बन चुका होता उस समय ऊपर चिपकाने के लिये संगमरमर पत्थर की आवश्यकता होती, न कि पहले ही वर्ष। कहाँ है वे फरमान जिनमें लाल पत्थर तथा ईंटों की मांग की गई थी।

जिन्होंने भी ताजमहल देखा है वह भली भाँति जानते हैं कि मुखय सफेद भाग को छोड़कर भी उसकी कुर्सी के चारों ओर का विशाल प्रांगण भूमि से ६०-८० फीट की ऊँचाई तक है और यह सभी ईंट, गारा, चूना तथा लाल पत्थर का बना हुआ है। यह भी एक तथ्य है कि इसकी नींव में कम से कम ४२ कुएँ हैं जो निश्चित रूप से संगमरमर द्वारा नहीं बनाए गये हैं। फरमानों की तिथि पर यदि ध्यान दें तो ज्ञात होता है कि पहला फरमान २०/०९/१६३२ तथा तीसरा और अन्तिम फरमान दिनांक ०१/०७/१६३७ई. का है। यह ही भवन बनने का प्रारम्भ समय होना चाहिए था। स्पष्ट है कि इस अवधि में शाहजहाँ को संगमरमर की आवश्यकता किसी रूप में भी भवन बनाने के लिये नहीं थी। हाँ, दोनों कब्रें (शाहजहाँ की नहीं) बनाने के लिये तथा कुरान लिखवाने के लिए संगमरमर की आवश्यकता अवश्य थी। दो कब्रों से मेरा तात्पर्य ऊपर तथा नीचे की कब्रों से हैं। नीचे की कब्र इसलिये बनाई गई थी कि यदि कभी राजा जयसिंह वापस भवन को बलात्‌ प्राप्त कर कब्र को नष्ट भी कर दें तो नीचे की तथाकथित कब्र (जो उस समय छिपी थी) सुरक्षित बनी रहे और भवन को पुनः प्राप्त करने की दशा में कहा जा सके कि मकबरा तथा कब्र सुरक्षित है।

अमानत खाँ शीराजी नामक व्यक्ति ने कुरान लिखने का कार्य किया था। उसने कई स्थानों पर अपना नाम तथा तारीख लिखी है। अन्तिम तारीख १६३९ ई. की है, यही कारण है कि सन्‌ १६३७ ई. के बाद संगमरमर की मांग नहीं की गई थी।

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि तीन फरमानों के द्वारा शाहजहाँ ने आमेर नरेश राजा जयसिंह को संगमरमर भेजने की व्यवस्था करने का आदेश दिया था। यहाँ पर पहला प्रश्न यह उपस्थित होता है कि शाहजहाँ को सन्‌ १६३२-३३ में संगमरमर कीही आवश्यकता क्यों पड़ी ? यही नहीं दूसरा प्रश्न यह भी है कि मात्र ४ मास पश्चात्‌ ही दूसरा फरमान भेजने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?

पहले सम्राज्ञी के शव को दफनाने के २ मास बाद ही शाहजहाँ द्वारा संगमरमर प्राप्त करने के लिये आदेश देना, उसे प्राप्त करने के लिये उच्च-अधिकारियों की नियुक्ति करना, तत्पश्चात्‌ लगातार दो अन्य फरमान भेजना सिद्ध करता है कि शाहजहाँ को कुछ ऐसा निर्माण कराना था जिसमें संगमरमर पत्थर की ही अतिशीघ्र आवश्यकता थी। ताजमहल का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि सम्राज्ञी की कब्र संगमरमर की बनी है तथा कुरान भी संगमरमर पर ही लिखी हैं। अधिक ध्यान से देखने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कुरान के आसपास के फूल-बूटे आदि कुरान से अधिक स्पष्ट तथा पुराने हैं। यह ऐसे पुष्ट प्रमाण हैं कि जिनसे स्पष्ट हो जाता है कि शाहजहाँ ने राजा जयसिंह से संगमरमर प्राप्त किया था तथा कब्रों का निर्माण कराया था एवं कुरान लिखवाई थी। यदि ऐसा न होता तो शाहजहाँ को संगमरमर की आवश्यकता सम्राज्ञी के मरने के कई वर्ष बाद ही होती न कि अविलम्ब। संगमरमर की आवश्यकता तो भवन के गुम्बज तक निर्माण पूरा होने के पश्चात्‌ ही ऊपर सेचिपकाने के लिये होती। माना कि संगमरमर पर फूल-बूटे आदि खुदवाने के लिये कुछ समय पूर्व ही उसकी आवश्यकता रही होगी, परन्तु इस तर्क में भी दम नहीं है। जब तक मुखय भवन बन कर तैयार न हो जाय तथा उसके प्रत्येक भाग का सूक्ष्मतम माप न ले लिया जाय तब तक किसी पत्थर को खुदाई के लिये छुआ नहीं जा सकता। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ताजमहल में सादे पत्थर का प्रयोग खुदाई किये गये पत्थर से लगभग दस गुना अधिक है।

फरमानो में शाहजहाँ ने संगमरमर के लिये गाड़ियों की व्यवस्था करने तथा भुगतान सम्बन्धी आदेश दिये हैं। यह अति आश्चर्यजनक ही लगता है कि उस युग में जब सम्राट्‌ की भ्रकुटि हिलाने मात्र से कार्य त्वरित गति से हो जाता था, शाहजहाँ को मात्र ४-५ मास में एक नहीं दो आदेश-पत्र (फरमान) क्यों भेजने पड़े थे ? दूसरा फरमान पढ़ने से ज्ञात होता है कि राजा जयसिंह ने न तो पत्थर काटने वालों की ही व्यवस्था की, न ही गाड़ियाँ ही उपलब्ध कराईं। साथ ही साथ उसने मुल्क शाह की भी कोई सहायता नहीं की। जिस प्रकार एक सेनापति के असफल होने पर दूसरा अधिक वीर सेनापति भेजा जाता था, उसी प्रकार मुल्कशाह के असफल होने पर दूसरे फरमानके साथ इलाहादाद को भेजा गया। इस फरमान में 'इस समय अधिक महत्व देने के लिए' लिखा गया अर्थात्‌ ४ मास में संगमरमर प्राप्त न करना शाहजहाँ के लिये कितना 'महत्वपूर्ण' बन गया था। साथ ही साथ शाहजहाँ ने मुल्कशाह के साथ भेजे गये धन का हिसाब भी मांगा था। स्पष्ट है कि राजा जयसिंह का व्यवहार एक स्वामिभक्त मनसबदार का न होकर एक धृष्ट राजा के समान था जो असहयोग करने पर उतारू था।

अन्तिम फरमान से राजा जयसिंह का असहयोग अति स्पष्ट हो जाता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि राजा द्वारा कोई सहायता उपलब्ध न कराये जाने पर इलाहादाद ने अपने स्वयं के मुतसद्दियों द्वारा स्वतन्त्र रूप से (बिना राजा जयसिंह की सहायता के) थोड़ा बहुत संगमरमर प्राप्त करना प्रारम्भ कर दिया था, परन्तु राजा को यह भी रुचिकर नहीं था। अतः उसने इस कार्य में भी बाधा डालनी प्रारम्भ कर दी। यह सुस्पष्ट आरोप फरमान में है कि राजा के सैनिक आमेर तथा राजनगर में पत्थर काटने वालों को रोक रहे हैं। बिना राजा जयसिंह की सहमति के सैनिकों अथवा आदमियों को इतना साहस कैसे हो सकता था कि वे सम्राट्‌ के कार्य में बाधा डालें।

मेरा निश्चित मत है कि खानों से संगमरमर कोई भी व्यक्तिसाधारणतया प्राप्त कर सकता था तथा मूल्य देकर शाहजहाँ स्वयं भी पत्थर सुविधापूर्वक प्राप्त कर सकता था। इसके लिये किसी प्रकार के फरमान भेजने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी पहले कुछ मास में पत्थर प्राप्त करने में असफल होने पर शाहजहाँ ने फरमान भेजा। पहले फरमान के बाद ही पर्याप्त संगमरमर मिल जाना चाहिए। यदि राजा असहयोग कर रहा था तो उसे दण्ड दिया जाना चाहिए थ। फरमानों के अन्त में यद्यपि स्पष्ट लिखा जाता था, 'भूल न करें', आदि। इस अति आवश्यक कार्य को अपना दायित्व न समझने की गुरुतर भूल करने, तीन-तीन आदेश पत्रों को रद्‌दी की टोकरी में फेंक कर भी राजा जयसिंह (मात्र एक मनसबदार) मूछों पर ताव देता रहा और सम्राट्‌ होते हुए भी शाहजहाँ कुछ न कर सका ? है न आश्चर्यजनक ! वह युग पूर्ण दया अथवा पूर्ण दण्ड का था। शासन प्रसन्न हो जाय तो सहज ही लाखों के मूल्य के पुरस्कार दे दें और यदि रुष्ट हो जाय तो कम से कम दण्ड सूली पर चढ़वा देना, हाथी के पैर से कुचलवा देना, कुत्तों से नुचवाना अथवा सार्वजनिक रूप से वध कराना आदि होता था तथा राजा एवं मनसबदार इसके अपवाद नहीं थे। इनको भी दण्ड मिलने के उदाहरण हैं यथा अब्दुल रहीमखानखाना, अमर सिंह राठौर, शिवाजी, राजा जसवन्त सिं आदि। इस विषय पर आगे विचार करेंगे, पहले संगमरमर पर।

तीसरे फरमान के पश्चात्‌ का कोई अन्य फरमान भेजा गया, ऐसा प्रतीत नहीं होता हैं इसका यह तात्पर्य नहीं कि राजा जयसिंह के व्यवहार में परिवर्तन आ गया था अपितु मात्र इतना है कि सन्‌ १६३७-३८ में जो संगमरमर पहुँचा उस पर कुरान लिखी गई एवं संगमरमर का काम कुरान लेखन के साथ ही सन्‌ १६३९ ई. में समाप्त हो गया था।

अब पुनः मुखय प्रश्न पर आएं कि राजा जयसिंह का व्यवहार आश्चर्यजनक रूप से उद्‌दण्ड तथा नकारात्मक क्यों था ? साथ ही साथ शाहजहाँ का व्यवहार भी नम्र एवं शिष्ट क्यों था ? इसके लिये दूर नहीं जाना होगा। आइये, पहले बादशाहनामा को देखते हैं। पृष्ठ ४०३ पर पंक्ति २९ के अनुसार राजा मानसिंह का महल जो उस समय राजा जयसिंह के स्वामित्व में था, रानी के शव को दफनाने के लिये चुना गया था। इसी पृष्ठ की पंक्ति ३१ के अनुसार राजा जयसिंह के लिये अपनी यह पैत्रिक सम्पत्ति अत्यन्त मूल्यवान्‌ थी। ऐसी मूल्यवान्‌ सम्पत्ति राजा जयसिंह से दुखद विछोह एवं धार्मिक पवित्रता के नाम पर बलात्‌ छीन ली गई थी। यद्यपि यह कहा गया था कि बदले में भूमि का एकटुकड़ा दिया गया था। वह कितना बड़ा टुकड़ा था तथा कहाँ पर था इसका कोई विवरण नहीं दिया गया। वस्तुतः यह भूमि देना भी संदिग्ध है। पाठक समझ सकते हैं कि ताजमहल जैसी मूल्यवान्‌ सम्पत्ति के बदले में यदि भिूमि का एक टुकड़ा (चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो) यदि सचमुच दे दिया जाए तो भी पाने वाला कितना असंतुष्ट होगा ? स्पष्ट है कि शाहजहाँ के इस कृत्य से राजा जयसिंह न केवल असंतुष्ट ही थे अपितु रुष्ट भी थे। मकराना (उन्हीं के राज्य) की खानों से संगमरमर मंगा कर शाहजहाँ द्वारा राजा जयसिंह के भव्य भवन पर कुरान लिखना भला उन्हें कैसे सहन हो सकता था। यह तो जले पर नमक छिड़कने जैसा था। ताजमहल छिन जाने में तो जयसिंह का वश नहीं चला, परन्तु मकराना की खानें तो उसके राज्य-क्षेत्र में अवस्थित थीं, अतः सीमा में रहते हुए जितना अवरोध (विरोध) सम्भव था उसने उत्पन्न किया उसने अप्रत्यक्ष रूप से कारीगर भी रोक दिये थे। यही कारण था कि शाहजहाँ लगातार शिष्ट बना रहा, क्योंकि उसे भय था कि यदि राजा जयसिंह को व्यर्थ में दण्डित किया गया तो वह विद्रोह भी कर सकता था ओर उस दशा में अन्य राजपूत भी उसका साथ दे सकते थे। ताजमहल परकुरान लिखाने से भी यही तात्पर्य था कि शाहजहाँ उस भवन पर मात्र अपने नाम का ठप्पा भर लगाना चाहता था।

इसके अतिरिक्त भी एक कारण था। अपने पिता जहाँगीर के समय में शाहजहाँ, जो उस समय शाहजादा खुर्रम के नाम से प्रसिद्ध था, ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया था। उस समय समाज्ञी नूरजहाँ ने आमेर के राजा जयसिंह को खुर्रम का विद्रोह दबाने के लिऐ आगरा बुलाया था। जब वह आगरा आये तो उनकी अनुपथिति का लाभ उठा कर खुर्रम ने उनकी राजधानी को लूट लिया था। अन्ततः राजा जयसिंह ने खुर्रम का पीछ करते हुए उसे परास्त कर जहाँगीर के चरणों में ला कर डाल दिया था। स्पष्ट है कि सन्‌ १६२८ में गद्‌दी पर बैठते समय शाहजहाँ के मन में गाँठ थी और वह बदला लेने के लिये अवसर की खोज में था और वह अवसर उसे रानी की मृत्यु के रूप में ३ वर्ष में ही मिल भी गया। स्पष्ट है कि राजा मानसिंह का वह भव्य भवन (ताजमहल) अकबर के समय से ही मुगलों की आँखें में खटक रहा होगा। अकबर के राजा बिहारीमल (भारमल) एवं उनके पुत्र भगवन्त दास तथा पौत्र मानसिंह से निकट के सम्बन्ध थे। जहाँगीर मानसिंह का सगा बहनोई था। अतः इन दोनों ने ऐसा कुछ नहीं किया। दूसरा कारण यह भी था कि राजा मानसिंह मुगल सम्राज्य के महान्‌ स्तम्भ थे, जिनके ऊपर पूरा मुगल शासन तन्त्र टिका था। यद्यपि यही दशा राजा जयसिंह की भी थी, परन्तु उनकी अल्प आयु का लाभ उठाते हुए जब शाहजहाँ को मौका मिला तो उसने धार्मिक अवसर तथा दुखद समय आदि के बहाने उक्त भव्य भवन को राजा जयसिंह से छीन लिया। अन्यथा कोई कारण न था कि खुली भूमि न लेकर एक भव्य भवन को 'दफनाने' के लिये चुना गया।

एक अन्य बात फरमानों से स्पष्ट होती है कि मुल्कशाह एवं इलाहादाद को राजा के पास आमेर भेजा गया था जब कि प्रचलित नियम के अनुसार राजा को आमेर में न होकर आगरा में शाहजहाँ के पास ही होना चाहिए थां उस समय के राजा मात्र कुछ दिनों के लिये ही (सम्राट्‌ से छुट्‌टी लेकर ही) अपनी राजधानी जा सकते थे। अतः राजा का असन्तुष्ट होकर आमेर चलेजाना तथा वहाँ पर कई वर्ष तक रहना कारण रहित नहीं हो सकता हैं इतिहास साक्षी है कि जयसिंह शाहजहाँ के विरुद्ध दक्षिण में औरंगजेब को गुप्त सूचनाएँ भेजता था तथा उसने उत्तराधिकार के युद्ध में न केवल स्वयं औरंगजेब का साथ दिया था अपितु इसके लिये राजा जसवन्त सिंह को भी मना लिया था।
ज़ारी ...



लेखक  : पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

स्‍वतन्‍त्रतादिवस की शुभकामनाओं के साथ संस्‍कृतजगत् ईपत्रिका का तृतीय संस्‍करण




प्रिय बन्‍धु
स्‍वतन्‍त्रतादिवस की पूर्वसंध्‍या पर संस्‍कृतजगत् ईपत्रिका का यह तृतीय संस्‍करण आपके समक्ष प्रस्‍तुत किया जा रहा है । इस पत्रिका में प्राय: सभी लेख स्‍वतन्‍त्रतादिवस से ही सम्‍बन्धित हैं । हाँ ईपत्रिका के अन्‍त में श्रीराधाकृष्‍णसहस्रनामावली भी जोड दी गई है जिससे पत्रिका का आकार कुछ बढ गया है । पत्रिका की गुणवत्‍ता को बढाने के लिये कुछ अन्‍य प्रयोग भी किये गये हैं । आशा है आपको हमारा यह प्रयास पसन्‍द आयेगा ।

पत्रिका की प्रतियाँ ग्रहण करने के लिये अधोक्‍तश्रृंखला पर स्‍पर्श करें



रविवार, 1 जुलाई 2012

संस्‍कृतजगत् ईपत्रिका का द्वितीय संस्‍करण

प्रिय मित्रों
निश्‍चय ही यह आप सभी के सहयोग तथा संस्‍कृत माता की कृपा का परिणाम है कि संस्कृतजगत् ईपत्रिका के प्रथम संस्‍करण के ही पाठकों की संख्‍या एक हजार से अधिक पहूँच गई ।
इसी क्रम में संस्‍कृतजगत् पत्रिका के द्वितीय संस्‍करण को भी प्रस्‍तुत किया गया है ।  त्रैमासिकी पत्रिका होने के कारण हम इसे तीन महीनों के अन्‍तराल पर ही प्रस्‍तुत कर पा रहे हैं, हालाँकि कई मित्रों का सुझाव तथा कुछ ज्‍येष्‍ठों की आज्ञा हुई इसे मासिक ईपत्रिका के रूप में निकालने के लिये, किन्‍तु उतनी मात्रा में आपके लेख न आने के कारण अभी फिलहाल इस पत्रिका को तीन महीने में एक बार ही प्रस्‍तुत किया जा रहा है ।  आगे जैसे जैसे आपके लेखों की संख्‍या बढती जाएगी, हम इस ईपत्रिका को मासिक ईपत्रिका करने की दिशा में अग्रसर होंगे ।
सम्‍प्रति आपके सम्‍मुख इस ईपत्रिका का द्वितीय संस्‍करण प्रस्‍तुत किया जा रहा है ।  पत्रिका का यह संस्‍करण ज्ञान की दृष्टि से और भी उपयोगी बनाया गया है, हालाँकि कुछ टंकण सम्‍बन्‍धी त्रुटियाँ भी हैं इस अंक में किन्‍तु वह सीमित ही हैं, तथा उनका पत्रिका की गुणवत्‍ता पर कोई बुरा प्रभाव नहीं है ।
अग्रिम संस्‍करण का प्रकाशन अगस्‍त मास में किया जाएगा ।  अग्रिम संस्‍करण के लिये अपने लेख pramukh@sanskritjagat.com पर अपने नाम व संक्षिप्‍त परिचय के साथ भेज सकते हैं ।  फेसबुक प्रयोग करने वाले सीधे फेसबुक के संस्‍कृतजगत् ईपत्रिका समूह में अपने लेख प्रकाशित कर स‍कते हैं, आपके लेख वहीं से सीधे ले लिये जाएँगे ।

द्वितीय संस्‍करण तलपूर्ति के लिये निम्‍नप्रदत्‍त श्रृंखलाओं में किसी एक पर स्‍पर्श करें ।


सोमवार, 25 जून 2012

ईशावास्योपनिषद् ....1

ईशावास्य उपनिषद्  में कुल 18 मंत्र हैं। उपनिषद् का अध्येता इन मंत्रों के साथ ज्ञान के अलौकिक सागर का दर्शन करता है । उपनिषद् का प्रारम्भ  "ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ...." मंत्र से होता है। किंतु इससे पूर्व एक शांति मंत्र ......

"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ 

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

आज हम अपनी चर्चा "ॐ" से प्रारम्भ करेंगे जो कि अपने आप में एक महामंत्र है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय की परम ऊर्जाओं को अपने में समाहित करने वाला यह मंत्र अद्भुत है। लोग इसका उच्चारण तीन प्रकार से करते हैं, क्रमशः  -   'औम्', 'ओउम्' और 'अउम्'। इसका सही उच्चारण है 'ओउम्' किंतु मंत्र के रूप में सिद्ध करने के लिये इसका सही उच्चारण है 'अउम्' ।

'अ' की ध्वनि ऊर्जा सृष्टि का, 'उ' की ध्वनि ऊर्जा सृष्टि की स्थिति का एवम् 'म्' (अनुस्वार) की ध्वनि ऊर्जा सृष्टि के विलय का प्रतिनिधित्व करती है। मंत्र सिद्धि के लिये सुखासन या पद्मासन में बैठकर शांतचित्त हो सुखश्वास के साथ "अउम्" का उच्चारण किया जाना चाहिये। यद्यपि यह उपनिषद ज्ञान का उपदेश देता है कर्मकाण्ड का नहीं तथापि शांतिमंत्र के प्रथम मंत्र  'ॐ' की सिद्धि की वैज्ञानिक दृष्ट्या चर्चा किया जाना अप्रासंगिक नहीं है। मंत्र विज्ञान शुद्ध ध्वनि विज्ञान है, अतः मंत्र सिद्धि के समय ध्वनियों की ऊर्जा को उपयुक्त स्थान पर अनुभव किया जाना चाहिये। यथा, 'अ' के उच्चारण के कम्पन को नाभि में, 'उ' के उच्चारण के कम्पन को कण्ठ में और अनुस्वार के उच्चारण के कम्पन को मूर्धा और ओष्ठ में अनुभव किया जाना चाहिये।

कम्पन 'ऊर्जा' का प्रकट स्वरूप है अतः  मात्र के चिंतन और उच्चारण से हम प्रकट ब्रह्माण्ड से अपना तादात्म्य बैठा पाने में सफल हो जाते हैं। प्रश्न उठ सकता है कि तादात्म्य की आवश्यकता क्यों है?

मनुष्य की सबसे बड़ी महात्वाकांक्षा प्रकृति का आद्योपांत रहस्योद्घाटन करने की रही है। वह अपने बारे में जानना चाहता है ...अपने चारो ओर के परिवेश के बारे में जानना चाहता है ...ब्रह्माण्ड के बारे जानना चाहता है।
जानने की समग्रता "उत्पत्ति, स्थिति और लय" को समझे बिना पूरी नहीं हो सकती।   के उच्चारण से निकलने वाली ध्वनि ऊर्जा इन तीनो स्थितियों का स्थूल कार्यरूप है। मंत्र की सिद्धि हमें स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाती है...कार्यभाव से कारणभाव की ओर ले जाती है। इस कारणभाव को जानना ही तो प्रकृति का रहस्योद्घाटन है। और यह जानने के लिये आवश्यक है प्रकट ब्रह्माण्ड से अपना तादात्म्य बैठाना।

मंत्र के अंत में तीन बार शांति का उच्चारण किया गया है। यहाँ एक सहज जिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है कि तीन बार क्यों?
ब्रह्माण्ड की तीन स्थितियाँ हो सकती हैं - उत्पत्ति, स्थिति और लय। तीनों स्थितियों में शांति अभिप्रेत है इसलिये तीन बार शांति का उच्चारण करने की परम्परा है। यह शांति स्वीकार की शांति है .....यथावत स्वीकार। ब्रह्माण्ड की हर स्थिति को निर्मलमन से स्वीकारने की आकांक्षा है। किंतु इतना सरल नहीं है हर स्थिति को स्वीकार कर लेना, बड़ी कठिन साधना है यह। इसलिये मन को प्रकृतिस्थ करने, स्वीकारयोग्य बनाने के लिये तीन बार शांति का उच्चारण किये जाने का विधान है।  

शेष चर्चा अगले अंक में ....    


शुक्रवार, 22 जून 2012

प्राचीन भारत में चिकित्सा का गौरव

मातृ एवम् शिशु के स्वास्थ्य की रक्षा विश्व के कई देशों में आज भी एक बड़ी समस्या है। इस सन्दर्भ में प्राचीन भारत का चिकित्सा साहित्य हमें गौरवान्वित करता है। महर्षि कष्यप ने शिशुओं के कुछ रोगों के लिये लेहन (चाट कर ग्रहण करने योग्य) औषधियों की व्यवस्था की है। उनके बताये योगों का उपयोग उन व्याधियों में भी है जो आधुनिक चिकित्सा विधा से असाध्य या कष्ट साध्य हैं। यहाँ हम कुछ योगों का उल्लेख कर रहे हैं-

1- इम्यूनिटी हेतु लेहनम् -

सुवर्णप्राशनं ह्येतेन्मेधाग्नि बलवर्धनम्।
आयुष्यं मंगलं पुण्यं वृष्यं वर्ण्यं ग्रहापहम् ॥

पुनः इसी सन्दर्भ में महर्षि सुश्रुत ने भी वर्णन किया है -

अथ कुमारं शीताभिरद्भिराश्वास्य जात कर्मणि कृते मधुसर्पिरनंतचूर्णमंगुल्याsनामिकया लेहयेत् ।
(सुवर्ण भस्म न केवल एण्टीबायटिक है अपितु रोगप्रतिरोधक्षमता को बढ़ाने वाली और मेध्य होने से वर्तमान टीकाकरण का एक निर्दोष विकल्प भी है।)

2- ब्रेन टॉनिक (मेधावर्धक लेहनम्) -

ब्राह्मीमण्डूकपर्णी च त्रिफला चित्रको वचा।
शतपुष्पाशतावर्यौ दंती नागबला त्रिवृत् ।।
एकैकं मधुसर्पिभ्यां मेधाजननमभ्यसेत् ।
कल्याणकं पंचगव्यं मेध्यं ब्राह्मीघृतं तथा॥

3- स्किन डिसीज़ हेतु लेहनम् -

समंगा(मंजिष्ठा) त्रिफला ब्राह्मी द्वे बले चित्रकस्तथा ।
मधु सर्पिरिति प्राश्यं मेधायुर्बलवृद्धये ॥

4- वाणी दोष हेतु लेहनम् -

कुष्ठ वटांकुरा गौरी पिप्पल्यस्त्रिफलावचा।
ससैन्धवैर्धृतम् पक्वं मेधाजननमुत्तमम् ।

5- ऑटोइम्म्यून डिसऑर्डर हेतु लेहनम् -

ब्राह्मी सिद्धार्थकाः कुष्ठं सैन्धवं सारिवावचा।
पिप्पल्यश्चेति तैः सिद्धं घृतं नाम्नाsभयं स्मृतम्।
...प्रबाधन्ते कुमारं तं यः प्राश्नीयादिदं घृतम्॥

6- डिसीज़ेज़ ऑफ़ अन्नोन इटियोलॉजी के लिये लेहनम् -

ब्राह्मी सिद्धार्थक वचा सारिवा कुष्ठ सैन्धवैः ।
सकणैः साधितं पीतं वांग्मेधा स्मृतिकृद् घृतम् ॥
आयुष्यं पापरक्षोघ्नं भूतोन्माद निवर्हणम्।
( यह योग अष्टांग हृदय संहिता का है)

7- व्याधिमुक्ति पश्चात् रीवाइटलाइजेशन हेतु लेहनम् - 

खदिरः पृश्निपर्णी च स्यतृ(न्दनः / अर्जुन) सैन्धवं बले।
केवुकेतिकषायः स्यात् पादशिष्टो जलाढ़के।
अर्धप्रस्थं पचेदत्र तुल्य क्षीरं घृतस्यतु ।
घृतं संवर्धनं नाम लेह्यं मधुयुतं सदा॥
निर्व्याधिर्वर्धते शीघ्रं संसर्पत्याशु गच्छति।
पंगुमूकाश्रुतिजड़ा युज्यंते चाशु कर्मभिः।  

ध्यान रहे घृत और मधु समान मात्रा में न मिलाकर विषम मात्रा में ही मिलाया जाय अन्यथा यह विषतुल्य प्रभाव देता है।  

मंगलवार, 19 जून 2012

बाध्यता - एक विमर्ष

प्रश्न है कि धर्म के नाम पर सुहाग के प्रतीकों को ढोने की बाध्यता स्त्री को ही क्यों ?

परिवर्तन से परिभाषित होता है समय और समय की धारा में बहता है समाज । 
हमारे चारो ओर होनेवाला परिवर्तन कैसा भी  हो, वह आकर्षित तो करता ही है हमें ।
यह आकर्षण कभी हर्षित करता है, कभी कुपित तो कभी दुखित भी । इस आकर्षण के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिक्रिया हमारी दिशा तय करती है ।     
इस परिवर्तन से अमेरिका और योरोप में बसे प्रवासी भारतीयों की जीवन शैली प्रभावित हो रही है। यह प्रभाव वहाँ के समाज की परम्पराओं, आवश्यकताओं और नवीनता के प्रति मनुष्य के स्वाभाविक झुकाव का परिणाम है। यह परिणाम किसी को लुभाता है तो किसी को अपनी टूटती जड़ों की पीड़ा से दुखित करता है।
पल्लवी श्रीवास्तव को प्रवासी भारतीयों में हो रहे सांस्कृतिक-सामाजिक परिवर्तन की पीड़ा उद्वेलित करती है तो तृप्ति जी संस्कृति के नाम पर गलत बातें विरासत में दिये जाने के विरुद्ध हैं।
प्रसंग है प्रवासी भारतीय महिलाओं में सुहाग के प्रतीकों को अनिवार्य स्वीकार न करने की प्रवृत्ति। कुछ लोगों का तर्क है कि धर्म के नाम पर सुहागिन के प्रतीक चिन्हों को ढोने की बाध्यता केवल स्त्री को ही क्यों? पुरुषों के लिये ऐसी कोई बाध्यता क्यों नहीं है? उनके अनुसार यह एक पक्षीय बाध्यता स्त्री पर पुरुष के वर्चस्व और उस पर शासन करने की प्रवृत्ति का प्रतीक है। 
समानता की बात करते समय हम भूल जाते हैं कि शारीरिक संरचना और शरीर क्रियात्मक भिन्नता के कारण स्त्री-पुरुष की मानसिकता के स्वाभाविक अंतर की उपेक्षा नहीं की जा सकती। श्रंगार के प्रति जैसा स्वाभाविक झुकाव स्त्रियों में देखने को मिलता है वैसा पुरुषों में नहीं मिलता। कदाचित इसी कारण पुरुषों के वैवाहिक प्रतीक चिन्हों का पुरुष समाज में अभाव है।  
 तृप्ति जी 'संस्कृति' के नाम पर नयी पीढ़ी को चूड़ी, बिन्दी, बिछिया, सिन्दूर जैसी अनावश्यक, अव्यावहारिक और 'गलत' चीजों को अपनाने की स्वीकृति देने के पक्ष में नहीं हैं।
इस सम्बंध में मेरा विनम्र निवेदन है कि जो गलत है वह 'संस्कृति' नहीं है, और जो 'संस्कृति' है वह गलत नही हो सकती। 'संस्कृति' 'रूढ़ि' नहीं है, एक सार्थक परम्परा है, समाज के लिये हितकारी है ...उपादेय है।
'संस्कृति' हमारे सामूहिक विचारों और व्यवहारों का परिष्कृत रूप है। विचार हमारे अन्दर का बौद्धिक भाव है जो व्यवहार में प्रकट होता है किंतु यह किसी क्रिया के परिणामस्वरूप ही परिलक्षित और विज्ञापित हो पाता है। किंतु जब कोई क्रिया/घटना न हो रही हो तब ऐसी स्थिति में अपने विचारों की घोषणा करना मनुष्य का स्वभाव है जिसके लिये उसे कुछ प्रतीकों का सहारा लेना पड़ता है। विश्व की सभी सभ्यताओं में ऐसा किसी न किसी स्तर पर होता रहा है, आज भी हो रहा है ...कल भी होता रहेगा। इसलिये प्रतीकों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
कल्पना कीजिये, सारे प्रतीकों को समाप्त कर दिया जाय तो जीवन कैसा होगा? मुद्रा (करेंसी) पर कितने सारे प्रतीक होते हैं !  राज्यों के विभिन्न विभागों के अलग प्रतीक है, बैंकों के अपने-अपने प्रतीक हैं, ध्वजों के अपने प्रतीक हैं .....प्रतीक विहीन है क्या? इन्हें समाप्त कर दिया जाय तो विश्व के सारे काम बहुत कठिन हो जायेंगे, बहुत अव्यवस्था उत्पन्न हो जायेगी।
तो हमारे सामाजिक जीवन से सम्बन्धित किसी प्रतीक को अप्रासंगिक क्यों मान लिया जाय? यह बात अलग है कि ब्रिटेन के मौसम के अनुरूप भारतीय परिधान और प्रतीकों को अधिक व्यावहारिक न पाया जाता हो पर प्रतीकों को पूरी तरह महत्वहीन नहीं माना जा सकता। मौसम के अनुरूप उसमें कुछ पारिवर्तन किया जा सकता है ...ताकि सांस्कृतिक परम्परा बनी रहे। ध्यान रहे, संस्कृति और रूढ़ में अंतर है। जो परम्परा औचित्यहीन, अतार्किक और अनुपयोगी है वही रूढ़ है। जब तक उसमें औचित्य, तर्क और उपयोगिता के तत्व बने रहेंगे वह रूढ़ नहीं बल्कि संस्कृति कहलायेगी। जो निरंतर संस्कारित हो वही तो संस्कृति है।
किसी समाज के लोगों का परिधान उसकी सामाजिक और परिवेशजन्य आवश्यकताओं के अनुसार विकसित और निर्धारित होता है। यह एक सहज और विकासमान प्रक्रिया है इसलिये प्रवासियों के प्रसंग में नये समाज और परिवेश के अनुरूप परिवर्तन स्वाभाविक है। किंतु अपनी पृथक पहचान के लिये हमें अपनी मूल परम्पराओं को सहेजना भी उतना ही आवश्यक है अन्यथा तब हम इंग्लैण्ड जाकर अपनी भारतीय पहचान प्रदर्शित कैसे करेंगे? 
विमर्ष में एक तर्क यह भी दिया गया कि वैवाहिक प्रतीकों को अपनाना नितांत निजी विषय है।
कोई परम्परा नितांत निजी कैसे हो सकती है? परम्परा समूह का विषय है व्यक्ति विशेष का नहीं। व्यक्ति विशेष का निजी विषय उसका अपना अभ्यास(आदत) हो सकता है किंतु कोई परम्परा तो तभी बनती है जब किसी व्यवहार को समूह में अपना लिया जाय। हम निजता का सम्मान करते हैं पर निजता को भी अपनी मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिये।

मंगलवार, 5 जून 2012

धर्मचिंतन ...7

भोजन की समुचित आपूर्ति और प्राणसुरक्षा की सुनिश्चितता ...ये दो जीवन की अनिवार्य आवश्यकतायें हैं। इन आवश्यकताओं ने विभिन्न जीवों को संगठित होने और अपना-अपना समाज बनाने की बाध्यता उत्पन्न की। बौद्धिक दृष्टि से अधिक विकसित प्राणियों को इन दो अनिवार्य आवश्यकताओं के अतिरिक्त भी कुछ चाहिये।

यह जो "अतिरिक्त कुछ" है इसीने बर्बरता के पाश से मुक्त हो कुछ प्राणियों को सभ्यता के स्वाभाविक गुण की ओर निरंतर बढ़ते रहने को प्रेरित किया। हम अपने आसपास के कुछ प्राणियों की ओर दृष्टिपात करें तो हमें कई प्रजातियों में सभ्यता के कुछ न कुछ लक्षण मिल जाते हैं। मनुष्य इन सभी में विशिष्ट है, इसीलिये उससे अपेक्षाकृत अधिक सभ्य होने की अपेक्षा की जाती है।

जहाँ सभ्यता में हम अन्य प्राणियों की अपेक्षा शीर्ष पर हैं वहीं बर्बरता में हम अन्य हिंस्र प्राणियों से लेश भी कम नहीं हैं। बर्बरता हमें हिंस्र प्राणियों की श्रेणी में रखती है और सभ्यता हमें उनसे पृथक करती है।

हमारे अन्दर दोनो ही प्रकार की क्षमतायें हैं, दोनो परस्पर विपरीत क्षमताओं में निरंतर द्वन्द्व की स्थिति हमारे विवेकवान होने को प्रमाणित करती है।

बर्बरता हमारी विकृति है ...सभ्यता हमारी प्रकृति है। विवेक हमें प्रकृति की ओर प्रेरित करता है, विवेकहीनता हमें विकृति की ओर ढकेलती रहती है।

आज हम समाज की प्रकृति में पतन की स्थिति से चिंतित हो रहे हैं। इस अधोपतन के कारण ही मनुष्य समाज बिखराव की बढ़ रहा है। परस्पर आकर्षण की न्यूनता समाज की अनिवार्य अर्हताओं को शिथिल करती है, और संगठित करने वाले तत्व समाप्त होने लगते हैं। 

समाज में जो परस्पर आकर्षण होता है वह प्रेम, सहनशीलता, उदारता और सहकारिता आदि उदात्त गुणों से निर्मित होता है, मानसिक उच्छ्रंखलता इन गुणों की शत्रु है। 

आज हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता की ओर अन्धे होकर भाग रहे हैं। हर व्यक्ति को स्वतंत्रता चाहिये ...हर प्रकार के बन्धन से मुक्त हो अपने तरीके से जीवन जीने की स्वतंत्रता चाहिये, कुछ भी करते रहने की स्वतंत्रता चाहिये फिर भले ही उससे किसी अन्य की स्वतंत्रता का बलात अपहरण ही क्यों न हो रहा हो।   

हम स्वतंत्रता को समझने में भूल कर रहे हैं । एक आदर्श स्वतंत्रता भी किसी निश्चित बन्धन की अपेक्षा करती है, इस बन्धन(मर्यादा) के अभाव में हम स्वतंत्र नहीं उछ्रंखल होते हैं।

समाज का छोटा सा रूप है परिवार। परिवार के सदस्य भी मर्यादाहीन स्वतंत्रता के लिये विद्रोह पर उद्द्यत हो उठे हैं। पारिवारिक सम्बन्ध छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। पिता-पुत्र-पुत्री के सम्बन्ध क्षीण होते जा रहे हैं। नयी पीढ़ी ने आनन्द के अपने पृथक साधन और मापदण्ड खोज लिये हैं। हर किसी को अपनी खोज पर गर्व है ..इस गर्व ने नयी पीढ़ी को और भी हठी बना दिया है।

प्राचीन भारतीय पारिवारिक मूल्यों,  समाज मूल्यों और राष्ट्रीय मूल्यों के नये मानक आ चुके हैं जिनका धर्म से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है।

धर्मनिरपेक्षता की नयी अवधारणा ने सामाजिक और व्यक्तिगत पतन की गति को तीव्र किया है। अब धर्म के बन्धन ..उसकी मर्यादायें ..उसके नियंत्रण, सभीके विरुद्ध विद्रोह की भावना उग्र होती जा रही है। जीवन से धर्म समाप्त हो गया, धर्म व्यापार का साधन बन गया है। 

जब तक व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, राजनीति, व्यापार आदि संस्थाओं पर धर्म का नियंत्रण रहा तब तक समाज निरंतर सुख की साधना करता रहा। हमारे चारो पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से अब धर्म का दूर दूर तक नाता नहीं रहा। धर्म न तो धर्म में रहा, न अर्थ में , न काम में  और न मोक्ष में। चारो पुरुषार्थ अनियंत्रित काम में समाहित हो चुके हैं।

आज हमारे कार्यालय के लेखापाल को मासिक बैठक में अधिकारी के समक्ष बुलाया गया। उत्कोच (रिश्वत) लेकर भी काम न करने के सामूहिक आरोप से आरोपित लेखापाल जी के चेहरे पर अद्भुत निष्काम भाव था, लज्जा का कहीं लेश भी नहीं। सभी चिकित्सकों के बीच लेखापाल महोदय ने उत्कोच लेना स्वीकार किया, एक चिकित्सक से कुछ ही देर पहले ली गयी सोलह सौ रुपये की रिश्वत वापस भी की परंतु इस उद्घोषणा के साथ कि अब "आज से आप लोग अपने कार्यालयीन कार्य अपने तरीके से करवाया करिये, हम किसी विलम्ब के लिये उत्तरदायी नहीं होंगे।"

लेखापाल जी इसे उत्कोच नहीं मानते, पारिश्रमिक मानते हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे अपनी"मेहनत" का पैसा माँगते हैं।

लगभग दो घण्टे के इस वाक्युद्ध में एक आदर्श श्रोता की भूमिका में रहे अधिकारी जी ने मात्र इतना ही कहा कि लेखापाल जी के द्वारा ली गयी रिश्वत में से उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। 

लेखापाल जी और अधिकारी जी दोनो ही स्वयं को अधार्मिक नहीं मानते और ईश्वर के भक्त हैं। लेखापाल जी ने धर्म की अपनी अलग परिभाषा लिख ली है और उन्हें इससे कोई लेना देना नहीं कि कोई उनकी लिखी परिभाषाओं से कितना सहमत है?     

   
हम धर्म की अपनी-अपनी परिभाषायें गढ़ने में सिद्ध हस्त हैं

गुरुवार, 31 मई 2012

धर्मचिंतन ...6

 

आज हम विचारों के सन्धिकाल पर हैं। वैदिक युग का प्रकाश ढ़ल चुका है, अज्ञान का तमस घिरता आ रहा है...अभी पूरी तरह घिर नहीं पाया। कुछ धुँधलका सा है जिसमें दिख तो सब कुछ रहा है पर स्पष्ट कुछ भी नहीं है। मनुष्य के जीवन का यह संकट काल है..द्विविधाओं से भरा हुआ....विचलन की सम्भावनाओं को अपने में समेटे हुये।

इस तमस में धर्म और अधर्म के मध्य की विभाजक रेखा लुप्त होती जा रही है। कल किसी ने बताया कि अब भारत में भी अविवाहित युगलों को एक साथ रहने के विधिक अधिकार मिलने वाले हैं। यदि ऐसा होता है तो यह भारतीय परिवार, समाज और सनातन धर्म को और भी छिन्न-भिन्न करने का एक बड़ा कारण बनेगा। भारतीय समाज व्यवस्था में अविवाहित युगलों को एक साथ रहने की अनुमति कभी नहीं रही। कामेच्छा के तीव्र प्रवाह को सही दिशा में ले जाने की अपेक्षा अन्धकूप की ओर ले जाने का प्रयास है यह। 

चिंतनीय है ....हमारे चार प्रशस्त आश्रमों का क्या होगा तब? इन आश्रमों की पारस्परिक सीमा रेखायें क्या होंगी? धर्मानुशीलन के चार अनिवार्य अवसरों को समाप्त कर देने से धर्मानुशीलन का अवसर कैसे मिल सकेगा?  

चारो आश्रमों में श्रेष्ठ गृहस्थ आश्रम का तो लोप ही हो जायेगा। ऐसे युगलों से उत्पन्न संतानों को पश्चिम की परम्परा के अनुसार माता-पिता का नहीं अपितु शासन का उत्तरदायित्व माना जायेगा। चर्चों  के पादरी उनके पिता होंगे। पारिवारिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो जायेगा।  भारतीय समाज जब पूरी तरह पतन के गर्त में डूब जायेगा तब फिर कोई वैलेंटाइन जन्म लेगा और भारत के लोगों को विवाह के महत्व को समझायेगा। 

नवीनता प्रकृति का नियम है ...अवश्यम्भावी है पर इस नवीनता के व्यामोह में हम जिधर बढ़ते जा रहे हैं वह समाज के विकास की नहीं ..पतन की दिशा है। समझ में नहीं आता कि जिन परम्पराओं के दुष्परिणामों को  भोग चुकने के पश्चात् पश्चिम तिलांजलि देना चाह रहा है उन्हें ही पूर्व क्यों अपनाना चाह रहा है? 

हमें विचार करना होगा कि भारतीय समाज की रूप-रेखा धर्म के अनुकूल कैसे बनायी जाय। पारिवारिक जीवन में एक सुव्यवस्था, दृढ़ता और प्रेममय सम्बन्धों की ऊर्जा प्रवाहित करने के लिये  हमें शीघ्र ही कोई निर्णय लेना होगा। विनम्र आग्रह है उन नवयुगलों से जो पश्चिम की इस परम्परा को भारत में पोषित करना चाह्ते हैं कि वे इस पथ के दुष्परिणामों के बारे में पहले गम्भीरता से चिंतन अवश्य करें। क्या वे अपने बच्चों के प्रति अपने पवित्र उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ना चाह्ते हैं? क्या वे चाहते हैं कि उनके रक्तांशों का पालन पोषण शासन के कर्मचारी करें या फिर वे मातृ-पितृ विहीन हो पशुओं की भाँति स्वतंत्र रूप से जीवन संघर्ष में अपने भाग्य का निर्माण करें ?

ध्यान रखना होगा ...मानव सभ्यता की सबसे बड़ी पूँजी है प्रेम ......हम उसे ही खोने का उपक्रम कर रहे हैं। मैं पश्चिम की परम्पराओं का विरोध नहीं कर रहा किंतु जो परम्परायें दोषपूर्ण प्रमाणित हो चुकी हैं उनकी ओर हमारा आकर्षण क्यों होना चाहिये? अनुकरण ही करना है तो पश्चिम् की राष्ट्रीय भावना और जनसेवा भावना का अनुकरण क्यों न करें?  

क्रमशः ......

   


सोमवार, 28 मई 2012

धर्मचिंतन .....5

व्यष्टि से समष्टि तक के कल्याण की भावना से ऋषिप्रणीत आचरण ही तो मानव मात्र का धर्म है। इस आचरण को किसी नाम विशेष या वर्ग विशेष से बांधा नहीं जा सकता, यह तो सभी मनुष्यों के लिये अनुकरणीय है ...इसीलिये सनातन है।

इस प्रशस्त आचरण के सम्यक पालन के लिये ऋषियों ने वर्णाश्रम व्यवस्था की रचना की। व्यक्तिगत क्षमताओं के समाज हित में सम्यक सदुपयोग हेतु वर्ण व्यवस्था और प्रत्येक वर्ण के लिये अपने लिये निर्धारित कार्य के सम्यक सम्पादन हेतु जीवन के चार कालों में बटी आश्रम व्यवस्था।

व्यक्ति और समूह के लिये ये सर्वोत्तम व्यवस्थायें हैं....सहज और वैज्ञानिक भी।

भारत की वर्ण व्यवस्था एक वैज्ञानिक व्यवस्था होते हुये भी कालांतर में हुयी रूढ़ियों के कारण आज विवादास्पद हो गयी है। दोष वर्ण व्यवस्था का नहीं अपितु वर्ण व्यवस्था पर सक्षम लोगों द्वारा आधिपत्य कर लेने वालों का है जिसके कारण उत्पन्न हुये अवरोधों ने समाज के वर्ण प्रवाह को रोक दिया। वर्ण की तरलता समाप्त कर दी गयी ...उसके स्थान पर आयी कठोरता ने लोगों के विकास के मार्गों को अवरुद्ध कर समाज की सहज गति को बाधित कर दिया। क्षमतायें कुण्ठित होने लगीं ...अक्षम अधिकार सम्पन्न होने लगे। समाज में विषमता को गति मिली।

आज जो सात्विक चिंतक है ....जो नवपथ निर्माता है उसे हम ब्राह्मण नहीं स्वीकारते, जो प्रशासनिक और रक्षा क्षमताओं से युक्त हैं उन्हें हम क्षत्रिय नहीं स्वीकारते, जो समाजव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिये वित्त एवम्  संसाधनोत्पादक क्षमतायुक्त हैं उन्हें हम वैश्य नहीं स्वीकारते, और जो अपने शारीरिक बल से अन्य सभी वर्णों का पोषण कर सकने में सक्षम हैं उन्हें हम शूद्र नहीं स्वीकारते। इन क्षमता समूहों से इतर और क्या क्षमतायें हो सकती हैं?

भारत की आर्षपरम्परा में चारों वर्णों में क्षमतावर्धन की सुविधाओं के साथ वर्ण रूपांतरण की तरलता ने व्यक्ति और समाज के गुणात्मक विकास का यशस्वी मार्ग प्रशस्त किया था।
नव विकृतपरम्परा में भी वर्ण रूपांतरण हो रहा है, लोग बिना क्षमता उन्नयन के स्वयं को ब्राह्मण या क्षत्रिय घोषित कर रहे हैं। यह एक छद्म रूपांतरण है ..गुणात्मक नहीं।

रूढ़ियों को तोड़ने के प्रयास में हमने नयी रूढ़ियों की सर्जना कर दी है। जातियों को समाप्त करने की उद्घोषणा के साथ नव प्रचलित आरक्षण व्यवस्था ने जाति भेद को और भी दृढ़्ता प्रदान कर दी है।

हमने अपनी नयी समाजव्यवस्था में अनोखे परिवर्तन किये हैं। जिसकी जो क्षमता है हम उसके अनुरूप उसे कार्य नहीं करने दे रहे। लोग स्वक्षमता के अनुरूप समाज के विकास में अपनी सहभागिता सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें ऐसे कार्य करने के बाध्य किया जा रहा  है जिनके लिये वे सक्षम, समर्थ और कुशल नहीं हैं। एक अकुशल व्यक्ति से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह अपने कार्य से समाज के विकास में अपना योगदान दे।

यह जनसाधारण को समझना होगा कि क्या वास्तव में राजसत्तायें समाज को विकसित करना चाहती हैं  या फिर यह उनका राजनीतिक षड्यंत्र है? सत्तायें यदि वास्तव में समाज का विकास चाहती हैं तो उन्हें पूर्व से प्रशस्त रहे अनुभवी मार्गों का अनुसरण क्यों नहीं करना चाहिये? समाजव्यवस्था के नये प्रयोगों की आवश्यकता क्यों है उन्हें?   

भारत में सत्तालोलुपता की आड़ में सामाजिक परिवर्तन की एक क्षुद्र तरंग ने कभी एक गीत गाया था-"तिलक तराजू और तलवार। इनको मारो जूते चार"। ये तीन वर्ण जूते से पीटने योग्य सुनिश्चित किये गये ...पीटने वाला था तीसरा वर्ण जिसके लिये किसी संज्ञा या विशेषण का प्रयोग नहीं किया गया किंतु वह कौन है यह स्पष्ट था।  इस तरंग ने समाज का कितना भला किया यह भारत के समाज को तय करना होगा।

'ब्राह्मण' आज सर्वाधिक विवादास्पद संज्ञा है। जो कभी मस्तिष्क हुआ करता था समाज का वही विवादास्पद हो गया है। विचार करना होगा कि विवादास्पद केवल संज्ञा भर हुयी है या संज्ञा का पदार्थ(sense of the word) भी ? इस विवाद का कारण भी खोजना होगा।

जिस किसी के पास वैचारिक सहिष्णुता, सरलता, तरलता,  उदारता, साहस, त्याग, नवप्रयोग क्षमता, दूरदृष्टि जैसे वैज्ञानिक गुण और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसा सात्विक भाव है क्यों उसे हम ब्राह्मण स्वीकारने से इंकार करें?  ब्राह्मण वही है जो एक कागज़ भरते ही दूसरा कोरा कागज उत्पन्न करने की क्षमता से युक्त है। उसके पास हर किसी के लिये एक कोरा कागज सदैव रहता है।

यह तय है कि श्रेष्ठ बनने के लिये भारतीय समाज के पुनर्गठन की...नव रूपांतरण की आवश्यकता है। ...और तय यह भी है कि यह कार्य, जो किसी क्रांति से कम नहीं, समाज को स्वयं ही करना होगा।


शनिवार, 26 मई 2012

धर्म चिन्तन ...4

सहिष्णुता और प्राणीमात्रके प्रति प्रेम के कारण भारत के लोगों ने वसुधैव 
कुटुम्बकम का उद्घोष किया था। यह एक आदर्श विराटपरिवार की कल्पना थी। किन्तु जैसा कि प्रायः होता आया है व्यावहारिकता के धरातल तक आते-आते आदर्श बिखरने और टूटने लगते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श भी बिखरने लगा। कुटुम्ब के ही कुछ लोग कुटुम्ब पर आघात करते रहे और अंततः भारत को पराधीन होना पड़ा। भारत का स्वाभिमान आहत हुआ, आदर्शों पर प्रश्न चिन्ह लगे और हमें विपन्न हो जाना पड़ा। 

यह विपन्नता केवल आर्थिक ही नहीं थी अपितु सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक, राजनैतिक....सभी प्रकार की विपन्नता थी। 

नहीं ...हमारा आदर्श दोषयुक्त नहीं था ...आदर्श दोषयुक्त हो ही नहीं सकता। तब क्यों हुआ यह सब? 
यह विचारणीय है। इस विषय पर चिंतन किये जाने की आवश्यकता है।

संभवतः हमने समाज के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर अधिक ध्यान नहीं दिया और आदर्श के आकाश में उड़ते रहे....धरातल छूट गया....धरातल की सारी चीजें छूट गयीं। समाज की इकाई छिन्न-भिन्न हो गयी। 
...और समाज का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि वह सशक्त होना चाहता है ...अपने ही एक अंग पर प्रभुत्व बनाना चाहता है। समाज स्वयं के ही अंग के शोषण से पोषित होता है। सामाजिक विषमता का सूत्रपात यहीं से होता है। 

आज विदेशी दासता से मुक्त होने के पश्चात् भी हम अपने स्वाभिमान को पुनः प्राप्त नहीं कर सके हैं। अपने प्राचीन भारतीय गौरव को स्पर्श तक नहीं कर सके हैं। आंग्ल शासन के विदा होने के पश्चात् भी हम अपने तंत्र को नहीं ला पाये ...उस तंत्र को नहीं ला पाये जिस तंत्र के कारण हम पूरे विश्व में जाने जाते थे।

आयातित संविधान, आयातित विचार, आयातित संस्कृति, आयातित भाषा, आयातित व्यापार तंत्र, आयातित उपभोग वस्तुयें....हम स्व के अधीन हो ही कहाँ सके? 
हमारा तंत्र  "स्व-तंत्र" होना चाहिये ..पूरी तरह भारतीय होना चाहिये .....भारत की माटी की सुगन्ध की तरह ..पूर्ण स्वदेशी। तभी हमें राष्ट्रधर्म के दर्शन हो सकेंगे.....अभी तो राष्ट्रधर्म कहीं दिखायी तक नहीं देता। 

मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों हुआ ...कैसे हुआ ...कि हमने वसुधैव कुटुम्बकम् की पताका तो फहराई पर काल विशेष में समाज के दो अत्यंत महत्वपूर्ण अंगों, स्त्रियों और सवर्णेतर वर्ग की घोर उपेक्षा की। उन्हें उनके सामान्य अधिकारों से वंचित रखा, उनका शोषण किया ...अमानवीयता की सीमा तक। 
बाद के कालखण्ड में सवर्णेतर वर्ग की उपेक्षा बन्द हुयी ...शनैःशनैः वे समाज की मुख्यधारा में आने लगे ...किंतु इस बीच बहुत बड़ी क्षति हो चुकी थी ....वह क्षति अभी भी हो रही है .....धर्मांतरण की क्षति। भारत के एक वर्ग का बड़ी तीव्रता के साथ धर्मांतरण हुआ....अभी भी हो रहा है ....यह प्रक्रिया किंचित कम अवश्य हुयी है पर पूर्ण विराम नहीं हो सका अभी तक। यद्यपि इस धर्मांतरण से कोई विशेष लाभ हुआ हो उन्हें ..ऐसा भी कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता।

धर्म की अवधारणा को समझे बिना देशज धर्म का परित्याग कर आयातित धर्म का धारण भारतीय समाज और भारत की धरती को खण्डित करने का एक बार पुनः कारण बन सकता है। 

मैं धर्मांतरण को देशद्रोह के रूप में देखता हूँ। यह महान सनातनधर्म के प्रति अविश्वास का प्रतीक और उसकी व्यर्थता की उद्घोषणा है। यह धर्म के मर्म को न समझने का हठ है। यह भारत को खण्डित करने का वंचनापूर्ण आन्दोलन है। 

काल विशेष में स्त्रियों और शूद्रों को लेकर उपेक्षा, शोषण और उनके घोर अपमान का जो षड्यंत्र भारत में चला वह घोर ग्लानि का कारण है....उसके कारण अब हम अपनी परम्पराओं पर गर्व करने योग्य नहीं रह गये। भारतीय समाज के पतन का एक बहुत बड़ा कारण यह भी रहा है।

स्त्रियों और शूद्रों के लिये अपमानजनक उद्घोषणायें करने वाले लोग निन्दा के पात्र हैं। मैं ऐसी हर उस उद्घोषणा और साहित्यिक रचना की भर्त्सना करता हूँ जो उन्हें सहज मानवीय अधिकार से वंचित कर अपमानित करती है। 

क्रमशः ...         
    

गुरुवार, 24 मई 2012

धर्म चिंतन ...3

आचरण में वैयक्तिक होते हुए भी प्रभाव में व्यापक होता है धर्म। यह वैयक्तिक आचरण ही आत्मानुशासित समाज का प्राण है।


समाज की इकाई होने के कारण मनुष्यके लिए धर्म को अपने आचरण में लाना आवश्यक होता है। इसीलिए सुसमाज के लिए यह एक आवश्यक घटक है। समाज का उत्थान और पतन ही मापदंड है सद्धर्म के अनुशीलन का। समाज की नीव पारस्परिक प्रेम की सुदृढ़ शिलाओं से निर्मित होती है। किन्तु हम आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं....अभिकेंद्रण की इस प्रक्रिया ने हमें स्वार्थी और असंवेदनशील बना दिया है।


महानगरों के लोग चिंतित हैं कि समाज बिखर रहा है। पारस्परिक प्रेम और सहयोग का अभाव होता जा रहा है। पश्चिमी देशों के समाज की संरचना और उसके तत्व हमारे यहाँ से भिन्न हैं। भारत का समाज इतना दुर्बल और खोखला कभी नहीं रहा जितना कि आज है।


क्या कारण हैं इस खोखलेपन के ..?


यह ज्वलंत प्रश्न है ...इसका समाधान खोजना होगा हमें।


पिछली बार के चिंतन में एक प्रश्न यह भी उठा था कि लोगों में पारस्परिक प्रेम उत्पन्न कैसे किया जाय ? प्रेम तो सहज मन की उदार और व्यापक अनुभूति है। यह किसी दबाव में आकर नहीं हो सकता। इसके लिये हमें भारतीय समाज की प्राचीन संरचना और आश्रम व्यवस्था की ओर एक बार फिर देखनाहोगा। मानव जीवन की कुल जीवन अवधि में उसके कर्तव्यों का सुनिश्चित विभाजन ही इसका रहस्य है। हमारे उत्तरदायित्व तय थे,कर्तव्यों के सुनिश्चित विभाजन ने समाज को कर्मण्य बना दिया था।


बहुत से कार्य जो आज शासन के उत्तरदायित्व हैं ... तब समाज के उत्तरदायित्व थे ... जिनमें विशेष कार्य थे शिक्षा, पर्यावरणीय सुरक्षा और अशक्तों का स्वैच्छिक उत्तरदायित्व। समाज के ये उत्तरदायित्व अब शासन के उत्तरदायित्व हैं इसीलिए संस्कार बोध और धर्माचरण जैसे जीवन के आवश्यक तत्व लुप्त होते चले गए। तब कार्य श्रेष्ठ था ...अब विभिन्न पदों में बटे समाज को शासन प्रदत्त सुविधाएं श्रेष्ठ हो गयी हैं....कई स्तर पर होने वाले चुनाव ने पारस्परिक प्रेम को आग लगा दी। समाज की इकाई आत्माभिमुख हो स्वार्थ में लिप्त हो गयी है।


तो प्रेम उत्पन्न करने का उपाय है समाज की संरचना और व्यवस्था में आमूल परिवर्तन किया जाना। गृहस्थाश्रम के पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्ति उपरांत वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति समाज के लिए ही समर्पित होता था। यह व्यवस्था पुनः जीवित किये बिना हम भारत को उसका प्राचीन गौरव कदाचित ही दिला सकें।


भौतिक विकास और यांत्रिक सुविधाओं ने जीवन की कठिनाइयों में कमी की है किन्तु इस विकास ने जीवन से संतोष, निष्ठा, प्रेम और सुख के महाकोष को लूट कर रिक्त कर दिया है। आश्रम व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का उत्तरदायित्व समाज का है शासन का नहीं। समाज को एक समानांतर व्यवस्था बनानी होगी ..एक ऐसी व्यवस्था जिससे शासन पर निर्भरता कम से कम होती चली जाय। भारतीय समाज सशक्त तभी बन सकेगा।


क्रमशः ......

मंगलवार, 22 मई 2012

धर्म चिंतन -2

  जीवन की सार्थकता के लिए हमें एक साथ कई धर्मों का पालन करने की आवश्यकता होती है। यह अलग बात है कि हम प्रतिबद्ध नहीं हो पाते उन सब के लिए....विशेषकर समाजधर्म के पालन के लिए, जो कि सबसे प्रमुख धर्म है ....प्रमुख भी और जटिल भी।
जटिल क्यों ? क्या कारण है इसका?
मानव प्रकृति की विविधताओं और स्वयं की पृथक पहचान की तीव्र अभिलाषा ने ही इसे इतना अधिक जटिल बना दिया है।
 मानव "मैं" की अपेक्षा करता है ...
और मानवसमाज "हम" की अपेक्षा करता है।
"हम" के बिना समाज उद्देश्यहीन है, "मैं "के बिना व्यक्ति अपनी पहचान के लिए विकल है। सारा संकट इसी असामंजस्य को लेकर है।
इस असामंजस्य के कारण धर्म गौण होता चला गया है। आज लोग बात तो 'हम' की करते हैं किन्तु अपने 'मैं' को शीर्ष पर रखकर। इसकी निष्पत्ति पाखण्ड में होती है।
प्रेम और आनंद ही लक्ष्य है मानव जीवन का ...किन्तु उसके अन्वेषण की दिशा से भटक गए हैं हम। हमारी सारी उठापटक ...सारा जीवन व्यापार इस आनंद की प्राप्ति के लिए ही है।
पर हम लोभी हो गए हैं आनंद को स्वयं तक ही सीमित रखना चाहते हैं, यह भूल गए हैं कि आनंद का तो यह स्वभाव ही नहीं है ....वह बंदी हो कर नहीं ठहर सकता ....व्यापक होना चाहता है। व्यापक होकर फ़ैल जाना चाहता है प्राणी मात्र में।
हम किसी प्राणी को पीड़ा से तड़पते हुए देखते हैं तो दुखी होते हैं, किसी गाय के छौने को उछलते-कूदते देखते हैं तो मन में प्रसन्नता की लहर उत्पन्न होती है। यह सहज स्वभाव है जो हमारे आचरण से अब च्युत होता जा रहा है। अब हम दूसरों की पीड़ा में अपने आनंद को खोजने लगे हैं ...”समाज” की अवधारणा की तो हत्या कर डाली हमने, धर्म ठहरेगा कहाँ?
हम विस्मृत करते जा रहे हैं कि आनंद तो बाटने की चीज़ है ...जितना बाटते हैं उतना ही बढ़ता है।
आनंद को बाटने के लिए प्रेम चाहिए ...प्रेम के लिए उदारता चाहिए ....उदारता के लिए सहनशीलता और ...सहनशीलता के लिए वैचारिक शुद्धता चाहिए। यही तो हैं वे उदात्त मानवीय गुण जो धर्म को स्वरूप प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त धर्म और क्या हो सकता है भला ?
धर्म को ग्रंथों की सीमा में बन्दी नहीं बनाया जा सकता, न वहाँ रहकर फलीभूत हो पाता है वह। ऐसा हो पाता तो धर्म का साम्राज्य स्थापित हो गया होता अब तक।
ग्रंथ को पढ़कर उसकी विषय वस्तु की व्याख्या हो सकती है पर जीवन में लाने के लिये तो कुछ अन्य उपाय ही करना पड़ेगा। आज सभी धर्मों के ग्रंथ उपलब्ध हैं ...उनकी व्याख्यायें भी उपलब्ध हैं ...उनके श्रोता भी हैं ...पर धर्म को जीने वालों का अभाव हो गया है।
हम चर्चा कितनी भी करलें धर्म की.........पारायण कितना भी करलें ग्रंथों का किंतु जब तक प्रेम करना नहीं सीखेंगे तब तक धर्म की अवधारणा को जी नहीं सकेंगे।
 प्रेम! किससे करना है प्रेम?
 समाज के हर व्यक्ति को प्रेम चाहिये ....पर वह दूसरों से नहीं करना चाहता। प्रेम लेना तो चाहता है सबसे....  पर देना नहीं चाहता है किसी को भी। लेना ही लेना व्यक्ति का कार्य है ....लेना और देना समाज का कार्य है। उन्मुक्त भाव से होना चाहिये यह लेनदेन ......स्वार्थ से परे .....निरपेक्ष भाव से ....और प्रसन्नतापूर्वक भी। देते समय कष्ट है मन में ...या अपेक्षा है प्रतिदान की तो यह स्वस्थ्य लेन-देन नहीं हुआ, पाखण्ड हुआ यह। और जहाँ पाखण्ड है वहाँ धर्म ठहरता ही नहीं पल को भी।यह प्रेम ही है जो हमें समाज में एक दूसरे से बाँधकर रखता है। प्रेम नहीं तो समाज नहीं ...भीड़ है वह ....संवेदनहीन लोगों की भीड़।
किंतु यह प्रेम किया कैसे जाय ...? इस पर चर्चा अगली बार ..
क्रमशः .......
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