रविवार, 28 नवंबर 2010

जांके नख अरु जटा विशाला,सोई तापस प्रसिद्द कलिकाला

हिन्दू मन अभी भी उस मानसिकता से नहीं निकल पाया है जब मध्यकाल में उसके देश,धर्म,संस्कृति, सभी को तहस-नहस किया जा रहा था. तत्कालीन समाज इसका प्रतिकार नहीं कर पाया,और अपने को असहाय समझ निराशा के गर्त में डूब रहा था. 
तब संतो ने भक्ति में नाच -गान संकीर्तन,प्रवचन आदि से समाज के मन को दिलासा देते हुए उन्हें संभालने की सफल कोशिश की थी.

नहीं तो हिन्दू धर्म में तो कर्मवाद प्रधान है- "कर्म प्रधान विश्व करी राखा, जो जस कराइ तस फल चाखा"(तुलसीकृत रामायण).जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल मिलता है.

जब सुख दुःख कर्मो के परिणाम है तो यह पाखंडी गुरु कैसे किसी को दुखो से छुटकारा दिला सकतें है . गुरु की आवश्यकता बताई गयी है, पर ज्ञान प्राप्ति के लिए.और ज्ञान पाने का उद्देश्य उस परमेश्वर की शरण प्राप्त करना है न की,तथाकथित कलयुगी भगवानो की. 
शास्त्रों में संतो के जो लक्षण बताये गएँ है - वह आज के इन पाखंडियों में कहाँ मिलते है. बाकी पाखंडियो के जो लक्षण तुलसीबाबा ने बतलाये है उन पे यह पूरे खरे उतरते है
तुलसीदास जी के शब्दों में -
"जांके नख अरु जटा विशाला,सोई तापस प्रसिद्द कलिकाला" -
जिसने लम्बी-लम्बी जटा और नाखून रखें हो(ढोंग रचा रखा हो) ऐसे पाखंडी ही कलियुग में बड़े तपस्वी कहलातें है.
"नारी मुई,गृह संपत्ति नाशी,मुंड मुंडाए भये सन्यासी "
जिसकी पत्नी मर गयी घर-बार संपत्ति का नाश हो गया है, ऐसे लोग सिर मुंडवा के सन्यासी का भेष धरे बैठ जाते है
 

हिन्दू समाज आज इन ढोंगियों के पाँव पड़ने में ही अपना कल्याण मान रहा है .

5 टिप्‍पणियां:

  1. धर्मठग

    धर्मध्वजी सदा लुब्धः छाद्यिको लोकदम्भकः।
    वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्रः सर्वाभिसंघकः।
    आधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थमाधनतत्परः।
    शठी मिथ्याविनीतश्च वक्रवृतिचरो द्विजः॥

    अर्थ : धर्म के नाम पर लोगों को ठगने वाले, सदा लोभी,कपटी,अपनी बढाई हाँकने वाले, हिंसक वैर रखने वाले, अल्पगुणी पर महाहानि करने वाले, अपने पक्ष को मिथ्या जानकर भी न छोडने वाले झूठी शपथ खाने वाले यह लोग बगुला की तरह उपर से उज्जवल लेकिन भीतर मैले होते है।

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  2. आज सुबह ही शायद सभी समाचार चैनेल बापू आशाराम जी के आश्रम के अवैध निर्माण को ढहाए जाने कि खबर प्रमुखता से दिखा रहे थे. ऐसे बाबाओं को पूज्यनीय कहना तो वास्तव में अपराध है.

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  3. @भारतीय नागरिक जी- "ऐसा ही" नहीं, ऐसा भी हो रहा है!सारा तो पाखण्ड नहीं है,हो भी नहीं सकता!

    कुंवर जी,

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  4. @अमित भाई साहब- ये तो आप सही ही कह रहे है कि हिन्दू समाज ढोंगी-पाखंडियों के चरणों में पड़ कर ही अपना कल्याण मान रहा है,परन्तु,जो है ही पाखण्ड वो अधिक दिन नहीं टिक पाया है!हमारी अज्ञानता के कारण ही उनका धंधा खूब फलता-फूलता है!

    लेकिन जो सन्त सच्चे है वो आज भी सच्चे है,इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता!मुझमे अभी इतना ना तो साहस है और ना ही इतनी समझ कि किसी भी (स्वयं कथित भी)सन्त का विश्लेषण कर के उसे सन्त या असाधु घोषित करूँ!और ये कैसे सुनिश्चित हो कि कौन कितना पावन-पवित्र है!

    अब कैसे गुरु को किस कसौटी पे कसे...?

    कुंवर जी,

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