शनिवार, 29 जनवरी 2011

जहाँ निष्ठुरता आवश्यक है……………


कहीं किसी की टिप्पणी में ऐसा कुछ पढा था………

1, क्या यह रवैया दुरुस्त है ?
2, क्या हमारी सेना मांस नहीं खाती ?
3, क्या हमारे वीर सैनिकों को राक्षस कहा जाना उचित है ?
4, क्या सिक्ख गुरु बलि नहीं देते थे या मांसाहार नहीं करते थे ?
5, ये थोड़े से शाकाहारी पूरी दुनिया को उनके भोजन के कारण राक्षस ठहराकर क्या लक्ष्य पाना चाहते हैं ?
ऐसे ही…………
क बार यात्रा में हम दो मित्र शाकाहार- मांसाहार पर चर्चा कर रहे थे। मित्र नें कहा यार लोग किसी जीवित प्राणी को मारकर कैसे खा लेते होंगे? यह तो क्रूरता है। सामने सीट पर बैठे दो मित्र हमारी चर्चा को ध्यान से सुन रहे थे, मांसाहार समर्थक थे निर्दयता वाला वाक्य उन्हे नागवार गुजर रहा था। हमें निरुत्तर करने के उद्देश्य से बडा सम्वेदनशील प्रश्न उछाला आप मांसाहार करने वालो को राक्षस कहते हो, हमारे देश की रक्षा करने वाले वीर सैनिक भी मांसाहार करते है, आपने सैनिको को क्यों राक्षस कहा?
आचानक आए प्रश्न से हमें हतप्रभ देखकर एक क्षण के लिये उनके चहरो पर कुटिल विजयी मुस्कान तैर गई।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ...
    [निरामिष पर भी पढ़ सकते हैं और यहाँ भी]
    ...

    .

    शत्रु पर आक्रमण के लिये क्रोध को उत्तेजित करने की आवश्यकता होती है. जिसके लिये मांसाहार की कतई आवश्यकता नहीं होती.
    यदि सैनिकों के पास कुछ ओजस्वी कमांडर हों अथवा दृढ नैतिक चरित्र वाले ट्रेनर हों अथवा कुछ उनके मनोरंजन में राष्ट्रीयता परोसी जाये और गद्दारी के लिये नफरत भरी जाये तो मुझे पक्का विश्वास है कि वे केवल चने और पपीते खा कर भी शत्रु-वध कर सकते हैं. यह सच है कि आमिष आहार [मांस और शराब] से व्यक्ति क्रूर बनता है लेकिन यह सच नहीं कि वे बहादुर और हिम्मती हो जाता है. वह केवल कसाई हो सकता है क्रूरता से दुश्मन को एक गोली की बजाय बीस गोली ठोंक सकता है. ऐसे सैनिक अपनी क्रूरता को वीरता का खोल पहनाकर प्रदर्शित करते हैं.

    फिर भी आपने एक खोखले तर्क को खारिज करके वास्तविकता की ओर सोचने को हमारे कदम बढ़ा दिए हैं.... बहुतेरों को तो ये उत्तर भी नहीं सूझते. . कमाल है आपका चिंतन और तर्क.

    .

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  2. .

    जब मैं अपने स्कूली जीवन में NCC में था तब सोचा करता था कि यदि मैं सैनिक बना तो मैं अपने सैनिक साथियों को बाहरी शत्रु के खिलाफ और देश के भीतर छिपे गद्दारों के खिलाफ जोश भरा करूँगा.
    मैं आज भी सोचता हूँ कि मुझे सेना में दस-पंद्रह दिन में एक प्रस्तुति [presentation] मिल जाये बस. कर लूँगा अपने मन की. विषयांतर हो जाता हूँ जब भी शाकाहार की बात छिड़ती है.
    क्योंकि मैं हमेशा देशप्रेम को शाकाहार से जोड़कर देखता हूँ.
    मित्र सुज्ञ जी,
    इस पर शोध होना चाहिए कि जो शाकाहार करते हैं उनके समस्त कार्य अपेक्षाकृत देश-सापेक्ष होते हैं. वे सौहार्द बनाने के नाम पर समझोते की बोली नहीं बोलते.

    .

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