रविवार, 18 मार्च 2012

वेदों की अपौरुषेयता

   समय-समय पर विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की गणना की है। इस विषय में स्पष्ट ही विद्वानों के तीन समूह हैं। एक समूह वेदों को प्राचीनतम सिद्ध करने के प्रयास में है, दूसरा समूह वेदों को अर्वाचीन सिद्ध करने के प्रयास में है और एक तीसरा समूह है जो वेदों को अपौरुषेय स्वीकार करता है। इस विषय पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है जिससे एक अनावश्यक विवाद को समाप्त किया जा सके। यहाँ हम कुछ सामान्य से बिन्दुओं पर चिंतन करेंगे।
    विद्वानों ने ऐतिह्य प्रमाणों, उपलब्ध विभिन्न साक्ष्यों की कड़ी जोड़ने, और अनुमान के आधार पर वेदों का अलग-अलग रचनाकाल निर्धारित किया है। यह एक मनोभौतिक प्रयास है जबकि वेदों के विषय में चिंतन करते समय उसके आध्यात्मिक पक्ष की उपेक्षा की जाती रही है।
   वेदों के बारे कहा जाता है कि 1- ब्रह्मा के चार मुखों से चार वेदों की उत्पत्ति हुयी। इसलिये ये सृष्टि के प्रारम्भ से ही अपने अस्तित्व में हैं। 2- वेदव्यास ने ब्रह्मा के मुख से निकले वेद(ज्ञान) को लिपिबद्ध किया।
    पहले ही स्पष्ट करदूँ कि भारतीय दर्शन में तीन आदि देवों में से एक ब्रह्मा है जो शेष दो- विष्णु और शिव की तरह ही अनादि, अनंत, अखण्ड और अमूर्त है। लोक में इनके मूर्त स्वरूप के दर्शन होते हैं जो मनुष्य की अपनी कल्पना पर आधारित हैं। परवर्तीकाल में इन देवों का इतना मानवीयकरण किया गया कि मनुष्य जीवन की सभी सामान्य घटनाओं को इनके साथ जोड़कर देखा जाने लगा। फिर तो न जाने कितनी रोचक कहानियाँ भी गढ़ ली गयीं और इनका उपयोग लोक रंजन के लिये भी होने लगा। भारतीय दर्शन उन ऋषियों का ऋणी है जिन्होंने तात्विक ज्ञान का मानवीयकरण करते समय दार्शनिक-आध्यात्मिक भावों के लिये विभिन्न प्रतीकों का प्रयोग कर अमूर्त को मूर्त बनाकर जन सामान्य के लिये प्रस्तुत किया। इसके दो प्रत्यक्ष लाभ हुये, एक तो यह कि तात्विक ज्ञान, जो जनसामान्य का प्रायः विषय नहीं हुआ करता हीनबुद्धि लोगों की विकृत व्याख्या से बचा रहा। वे सतही भौतिक व्याख्याओं में उलझे रहे और दूसरा यह कि अनेक गूढ़ तथ्यों को इन प्रतीकों में सहेज कर विषय को रोचक बना दिया गया।
   अब ब्रह्मा के चार मुखों का क्या अर्थ है यह बताने की आवश्यकता नहीं रह गयी। मनुष्य जीवन से सम्बन्धित सभी अनिवार्य विषयों के सनातन ज्ञान का मौलिक वर्गीकरण कर वेद्व्यास द्वारा चार वेदों को लिपिबद्ध किया गया। वैदिक ज्ञान श्रुत परम्परा से प्रवाहित होता हुआ.... पीढ़ी दर पीढ़ी चलता हुआ वेदव्यास की लेखनी के माध्यम से लिपिबद्ध हुआ। अर्थात वेदव्यास मूल लेखक न होकर एक संकलक थे जिन्होंने श्रुतज्ञान अगली पीढ़ियों के लिये संरक्षित करने का महान कार्य किया। तब इसका मूल लेखक कौन था यह प्रश्न सामने आता है। इसका उत्तर देने के लिये एक ही उदाहरण देना चाहूँगा, चिकित्सा शिक्षा के विद्यार्थी जिस शरीर रचना शास्त्र का अध्ययन करते हैं उसे पूरी दुनिया के लोग ग्रे की एनाटॉमी के नाम से जानते हैं। इससे यह स्पष्ट सन्देश मिलता है कि इस एनाटॉमी के लेखक हेनरी ग्रे हैं। पर चिकित्सा विज्ञान में एनाटॉमी ग्रे के जन्म से पहले भी पाठ्यक्रम में थी और ग्रे की मृत्यु के पश्चात तो उसके कलेवर और तथ्यों में निरंतर वृद्धि होती रही है। यह कोई कविता या उपन्यास नहीं है जिसके लिये लोग अपने नाम को लेकर इतना परेशान  होते रहते हैं। कोई भी ज्ञान एक लम्बी समय साधना का परिणाम होता है जिसमें न जाने कितनी पीढ़ियों का समर्पण और त्याग होम हुआ रहता है।
   तो वैदिक ज्ञान भी युगों के तपोपरांत संचित, परिवर्धित और संवर्धित ज्ञान का एक संकलन है जिसे बहुत बाद में लिपिबद्ध किया गया। जिस तरह लिपि के आविष्कार से पहले भी भाषाओं का अस्तित्व था उसी तरह वेदों के संकलन से पूर्व भी वैदिक ज्ञान अपने अस्तित्व में था। उस युग में रॉयल्टी का भी कोई झंझट नहीं था कि हर कोई अपने नाम से एक-एक ऋचा का उल्लेख करता। दूसरे, तब ज्ञान का उद्देश्य आज की तरह व्यापार नहीं था, न ही श्रेय लेने की कोई होड़ हुआ करती थी। सब कुछ प्राणिमात्र के कल्याण की पवित्र भावना से किया जाता था। ज्ञान तब श्रद्धा की चीज थी, लोग पवित्र भावना से अनुसन्धान में लगे रहते थे। प्राप्त हुआ ज्ञान ईश्वर के वरदान या उपकार के परिणाम के रूप में स्वीकार किया जाता था। इसलिये ज्ञान का श्रेय उसके अनुसन्धानकर्ता को नहीं अपितु ईश्वर को दिया जाता था। यह सर्वशक्तिमान के प्रति मनुष्य की विनम्र कृतज्ञता थी। यूनीवर्सल ट्रुथ मनुष्य के जन्म से पूर्व भी था और इस धरती के समाप्त हो जाने के बाद भी रहेगा। ऐसा ज्ञान सनातन है... अपरिवर्तनीय है, इसलिये अपौरुषेय है। इसीलिये वेदों की अपौरुषेयता निर्विवाद तथ्य है।


4 टिप्‍पणियां:

  1. अपौरुषेयता का सार्थक बोधगम्य तार्किक विवेचन!!
    आलेख कईं प्रचलित भ्रम और गूढ़ता का आवरण हटाता है॥

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  2. वाह! ऎसी विचार-लहरी में गोते लगाने से मानस के समस्त रोग [अहंकार, लोभ आदि वृत्तियाँ] नष्ट हो जाएँ!
    बहुत ही सुन्दर व्याख्या की है...इस व्याख्या ने वेदों को अपौरुषेय सिद्ध कर कॉपी राइट और पेटेंट के लोभियों को शर्मसार कर दिया है. इस जगती में दोनों तरह के लोगों को देखा जा सकता है, एक वे हैं जो अपने जीवन की समस्त जमापूँजी को मुक्तहस्त से बाँटते नहीं अघाते, दूसरे वे हैं जो इकलौती स्व-संशोधित कृति का जीवनपर्यंत मूल्य वसूलना चाहते हैं. आपकी इस निस्पृह ज्ञान-लहरी का स्नान बहुत सुखद लगा.

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  3. काफी तर्क पूर्ण ढंग से समझाया है.

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