मंगलवार, 5 जून 2012

धर्मचिंतन ...7

भोजन की समुचित आपूर्ति और प्राणसुरक्षा की सुनिश्चितता ...ये दो जीवन की अनिवार्य आवश्यकतायें हैं। इन आवश्यकताओं ने विभिन्न जीवों को संगठित होने और अपना-अपना समाज बनाने की बाध्यता उत्पन्न की। बौद्धिक दृष्टि से अधिक विकसित प्राणियों को इन दो अनिवार्य आवश्यकताओं के अतिरिक्त भी कुछ चाहिये।

यह जो "अतिरिक्त कुछ" है इसीने बर्बरता के पाश से मुक्त हो कुछ प्राणियों को सभ्यता के स्वाभाविक गुण की ओर निरंतर बढ़ते रहने को प्रेरित किया। हम अपने आसपास के कुछ प्राणियों की ओर दृष्टिपात करें तो हमें कई प्रजातियों में सभ्यता के कुछ न कुछ लक्षण मिल जाते हैं। मनुष्य इन सभी में विशिष्ट है, इसीलिये उससे अपेक्षाकृत अधिक सभ्य होने की अपेक्षा की जाती है।

जहाँ सभ्यता में हम अन्य प्राणियों की अपेक्षा शीर्ष पर हैं वहीं बर्बरता में हम अन्य हिंस्र प्राणियों से लेश भी कम नहीं हैं। बर्बरता हमें हिंस्र प्राणियों की श्रेणी में रखती है और सभ्यता हमें उनसे पृथक करती है।

हमारे अन्दर दोनो ही प्रकार की क्षमतायें हैं, दोनो परस्पर विपरीत क्षमताओं में निरंतर द्वन्द्व की स्थिति हमारे विवेकवान होने को प्रमाणित करती है।

बर्बरता हमारी विकृति है ...सभ्यता हमारी प्रकृति है। विवेक हमें प्रकृति की ओर प्रेरित करता है, विवेकहीनता हमें विकृति की ओर ढकेलती रहती है।

आज हम समाज की प्रकृति में पतन की स्थिति से चिंतित हो रहे हैं। इस अधोपतन के कारण ही मनुष्य समाज बिखराव की बढ़ रहा है। परस्पर आकर्षण की न्यूनता समाज की अनिवार्य अर्हताओं को शिथिल करती है, और संगठित करने वाले तत्व समाप्त होने लगते हैं। 

समाज में जो परस्पर आकर्षण होता है वह प्रेम, सहनशीलता, उदारता और सहकारिता आदि उदात्त गुणों से निर्मित होता है, मानसिक उच्छ्रंखलता इन गुणों की शत्रु है। 

आज हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता की ओर अन्धे होकर भाग रहे हैं। हर व्यक्ति को स्वतंत्रता चाहिये ...हर प्रकार के बन्धन से मुक्त हो अपने तरीके से जीवन जीने की स्वतंत्रता चाहिये, कुछ भी करते रहने की स्वतंत्रता चाहिये फिर भले ही उससे किसी अन्य की स्वतंत्रता का बलात अपहरण ही क्यों न हो रहा हो।   

हम स्वतंत्रता को समझने में भूल कर रहे हैं । एक आदर्श स्वतंत्रता भी किसी निश्चित बन्धन की अपेक्षा करती है, इस बन्धन(मर्यादा) के अभाव में हम स्वतंत्र नहीं उछ्रंखल होते हैं।

समाज का छोटा सा रूप है परिवार। परिवार के सदस्य भी मर्यादाहीन स्वतंत्रता के लिये विद्रोह पर उद्द्यत हो उठे हैं। पारिवारिक सम्बन्ध छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। पिता-पुत्र-पुत्री के सम्बन्ध क्षीण होते जा रहे हैं। नयी पीढ़ी ने आनन्द के अपने पृथक साधन और मापदण्ड खोज लिये हैं। हर किसी को अपनी खोज पर गर्व है ..इस गर्व ने नयी पीढ़ी को और भी हठी बना दिया है।

प्राचीन भारतीय पारिवारिक मूल्यों,  समाज मूल्यों और राष्ट्रीय मूल्यों के नये मानक आ चुके हैं जिनका धर्म से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है।

धर्मनिरपेक्षता की नयी अवधारणा ने सामाजिक और व्यक्तिगत पतन की गति को तीव्र किया है। अब धर्म के बन्धन ..उसकी मर्यादायें ..उसके नियंत्रण, सभीके विरुद्ध विद्रोह की भावना उग्र होती जा रही है। जीवन से धर्म समाप्त हो गया, धर्म व्यापार का साधन बन गया है। 

जब तक व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, राजनीति, व्यापार आदि संस्थाओं पर धर्म का नियंत्रण रहा तब तक समाज निरंतर सुख की साधना करता रहा। हमारे चारो पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से अब धर्म का दूर दूर तक नाता नहीं रहा। धर्म न तो धर्म में रहा, न अर्थ में , न काम में  और न मोक्ष में। चारो पुरुषार्थ अनियंत्रित काम में समाहित हो चुके हैं।

आज हमारे कार्यालय के लेखापाल को मासिक बैठक में अधिकारी के समक्ष बुलाया गया। उत्कोच (रिश्वत) लेकर भी काम न करने के सामूहिक आरोप से आरोपित लेखापाल जी के चेहरे पर अद्भुत निष्काम भाव था, लज्जा का कहीं लेश भी नहीं। सभी चिकित्सकों के बीच लेखापाल महोदय ने उत्कोच लेना स्वीकार किया, एक चिकित्सक से कुछ ही देर पहले ली गयी सोलह सौ रुपये की रिश्वत वापस भी की परंतु इस उद्घोषणा के साथ कि अब "आज से आप लोग अपने कार्यालयीन कार्य अपने तरीके से करवाया करिये, हम किसी विलम्ब के लिये उत्तरदायी नहीं होंगे।"

लेखापाल जी इसे उत्कोच नहीं मानते, पारिश्रमिक मानते हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे अपनी"मेहनत" का पैसा माँगते हैं।

लगभग दो घण्टे के इस वाक्युद्ध में एक आदर्श श्रोता की भूमिका में रहे अधिकारी जी ने मात्र इतना ही कहा कि लेखापाल जी के द्वारा ली गयी रिश्वत में से उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है। 

लेखापाल जी और अधिकारी जी दोनो ही स्वयं को अधार्मिक नहीं मानते और ईश्वर के भक्त हैं। लेखापाल जी ने धर्म की अपनी अलग परिभाषा लिख ली है और उन्हें इससे कोई लेना देना नहीं कि कोई उनकी लिखी परिभाषाओं से कितना सहमत है?     

   
हम धर्म की अपनी-अपनी परिभाषायें गढ़ने में सिद्ध हस्त हैं

4 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत निष्कर्ष सूत्र प्रवाहित हुए है………
    "बर्बरता हमारी विकृति है ...सभ्यता हमारी प्रकृति है। विवेक हमें प्रकृति की ओर प्रेरित करता है, विवेकहीनता हमें विकृति की ओर ढकेलती रहती है।"
    और दुर्भाग्य यह कि सभ्यता और विवेक का मार्ग कठिन पुरुषार्थ से भरा जबकि पतन और विकृति का मार्ग सहज बहाव व फिसलन भरा।
    कठोर व कठिन जीवनचर्या से पलायन करता मनुष्य सहजता के प्रलोभन में पतनमार्गी बन जाता है।

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  2. मानसिक उच्छ्रंखलता विकृतिपथ के पतन मार्ग का महिमामण्डन करती है। अधोपतन को सहज सामन्य आवश्यकता के रूप में स्थापित करने को जुझती है। ऐसी विकृतियां अपनी पतन आधारित नैतिकता निर्धारित करती है। नैतिकता के भी अपने मानदंड बना लेते है। जैसे लेखापाल ने उत्कोच को पारिश्रमिक माना। भला नैतिकता के भी अलग अलग पैमाने हो सकते है? सत्य सत्य होता है, ईमान ईमान होता है, नैतिकता नैतिकता ही होती है सर्वांग शुद्ध। उसकी श्रेणियां नहीं होती। शिथिलतावादी व पतनवादी अक्सर अपनी सुविधा के लिए नैतिकता की श्रेणियां व पैमाने गढ़ लेते है।
    पैमाने गढ़ने के बाद भी रूकते नहीं, ऐसे विकृत पैमानों को ससम्मान स्वीकार करने की अनुशंसा करते है ताकि अवमूल्यन को स्वीकार्यता प्राप्त हो। यही विकारों का विकास ट्रेंड है।

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  3. ईश्वर भी तो, भाँति भाँति के भक्त धरे बैठा है।

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  4. इंटीलेक्चुअल ब्लेस्फ़ेमी का दौर चल रहा है बन्धुओ! प्रलय का आवश्यक घटक है यह। प्रलय भी तो होनी ही चाहिये न! बिना इसके प्रकृति का चक्र पूरा होगा कैसे?

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