शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

भोजन निजि पसंद ना पसंद का ही मसला नहीं……-निरामिष


अकसर कहा जाता है कि आहार व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि (चॉइस) की बात है। जिसका जो दिल करे खाए। हमारा आहार कोई अन्य उपदेशित या प्रबन्धित क्यों करे? क्या खाना क्या नहीं खाना यह हमारा अपना स्वतंत्र निर्णय है।

किन्तु यह सरासर एक संकीर्ण और स्वार्थी सोच है, विशेषकर तब जब उसके साथ हिंसा सलग्न हो। प्रथम दृष्टि में व्यक्तिगत सा लगने वाला यह आहार निर्णय, समग्र दृष्टि से पूरे विश्व के जन-जीवन को प्रभावित कर सकता है। मात्र आहार ही नहीं हमारा कोई भी कर्म यदि किसी दूसरे के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा हो, उस दशा में तो और भी धीर-गम्भीर चिंतन और विवेकयुक्त निर्णय हमारा उत्तरदायित्व बन जाता है। यदि आपके किसी भी कृत्य से कोई दूसरा  (मनुष्य या प्राणी जो भी) प्रभावित होता है, समाज प्रभावित होता है, देश प्रभावित होता है विश्व प्रभावित होता है उस स्थिति में आपके आहार-निर्णय की एकांगी सोच या स्वछंद विचारधारा, कैसे मात्र व्यक्तिगत रह सकती है।

दूसरे जीवन का सवाल
आहत होती भावनाओं का सवाल
हिंसा को प्रोत्साहन का सवाल
वैश्विक मानव पोषण और स्वास्थ्यका सवाल
विश्व खाद्यसंकट का सवाल
विश्व पर्यावरण का सवाल

निरामिष पर है सभी जवाब

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