सोमवार, 28 मई 2012

धर्मचिंतन .....5

व्यष्टि से समष्टि तक के कल्याण की भावना से ऋषिप्रणीत आचरण ही तो मानव मात्र का धर्म है। इस आचरण को किसी नाम विशेष या वर्ग विशेष से बांधा नहीं जा सकता, यह तो सभी मनुष्यों के लिये अनुकरणीय है ...इसीलिये सनातन है।

इस प्रशस्त आचरण के सम्यक पालन के लिये ऋषियों ने वर्णाश्रम व्यवस्था की रचना की। व्यक्तिगत क्षमताओं के समाज हित में सम्यक सदुपयोग हेतु वर्ण व्यवस्था और प्रत्येक वर्ण के लिये अपने लिये निर्धारित कार्य के सम्यक सम्पादन हेतु जीवन के चार कालों में बटी आश्रम व्यवस्था।

व्यक्ति और समूह के लिये ये सर्वोत्तम व्यवस्थायें हैं....सहज और वैज्ञानिक भी।

भारत की वर्ण व्यवस्था एक वैज्ञानिक व्यवस्था होते हुये भी कालांतर में हुयी रूढ़ियों के कारण आज विवादास्पद हो गयी है। दोष वर्ण व्यवस्था का नहीं अपितु वर्ण व्यवस्था पर सक्षम लोगों द्वारा आधिपत्य कर लेने वालों का है जिसके कारण उत्पन्न हुये अवरोधों ने समाज के वर्ण प्रवाह को रोक दिया। वर्ण की तरलता समाप्त कर दी गयी ...उसके स्थान पर आयी कठोरता ने लोगों के विकास के मार्गों को अवरुद्ध कर समाज की सहज गति को बाधित कर दिया। क्षमतायें कुण्ठित होने लगीं ...अक्षम अधिकार सम्पन्न होने लगे। समाज में विषमता को गति मिली।

आज जो सात्विक चिंतक है ....जो नवपथ निर्माता है उसे हम ब्राह्मण नहीं स्वीकारते, जो प्रशासनिक और रक्षा क्षमताओं से युक्त हैं उन्हें हम क्षत्रिय नहीं स्वीकारते, जो समाजव्यवस्था के सुचारु संचालन के लिये वित्त एवम्  संसाधनोत्पादक क्षमतायुक्त हैं उन्हें हम वैश्य नहीं स्वीकारते, और जो अपने शारीरिक बल से अन्य सभी वर्णों का पोषण कर सकने में सक्षम हैं उन्हें हम शूद्र नहीं स्वीकारते। इन क्षमता समूहों से इतर और क्या क्षमतायें हो सकती हैं?

भारत की आर्षपरम्परा में चारों वर्णों में क्षमतावर्धन की सुविधाओं के साथ वर्ण रूपांतरण की तरलता ने व्यक्ति और समाज के गुणात्मक विकास का यशस्वी मार्ग प्रशस्त किया था।
नव विकृतपरम्परा में भी वर्ण रूपांतरण हो रहा है, लोग बिना क्षमता उन्नयन के स्वयं को ब्राह्मण या क्षत्रिय घोषित कर रहे हैं। यह एक छद्म रूपांतरण है ..गुणात्मक नहीं।

रूढ़ियों को तोड़ने के प्रयास में हमने नयी रूढ़ियों की सर्जना कर दी है। जातियों को समाप्त करने की उद्घोषणा के साथ नव प्रचलित आरक्षण व्यवस्था ने जाति भेद को और भी दृढ़्ता प्रदान कर दी है।

हमने अपनी नयी समाजव्यवस्था में अनोखे परिवर्तन किये हैं। जिसकी जो क्षमता है हम उसके अनुरूप उसे कार्य नहीं करने दे रहे। लोग स्वक्षमता के अनुरूप समाज के विकास में अपनी सहभागिता सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें ऐसे कार्य करने के बाध्य किया जा रहा  है जिनके लिये वे सक्षम, समर्थ और कुशल नहीं हैं। एक अकुशल व्यक्ति से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह अपने कार्य से समाज के विकास में अपना योगदान दे।

यह जनसाधारण को समझना होगा कि क्या वास्तव में राजसत्तायें समाज को विकसित करना चाहती हैं  या फिर यह उनका राजनीतिक षड्यंत्र है? सत्तायें यदि वास्तव में समाज का विकास चाहती हैं तो उन्हें पूर्व से प्रशस्त रहे अनुभवी मार्गों का अनुसरण क्यों नहीं करना चाहिये? समाजव्यवस्था के नये प्रयोगों की आवश्यकता क्यों है उन्हें?   

भारत में सत्तालोलुपता की आड़ में सामाजिक परिवर्तन की एक क्षुद्र तरंग ने कभी एक गीत गाया था-"तिलक तराजू और तलवार। इनको मारो जूते चार"। ये तीन वर्ण जूते से पीटने योग्य सुनिश्चित किये गये ...पीटने वाला था तीसरा वर्ण जिसके लिये किसी संज्ञा या विशेषण का प्रयोग नहीं किया गया किंतु वह कौन है यह स्पष्ट था।  इस तरंग ने समाज का कितना भला किया यह भारत के समाज को तय करना होगा।

'ब्राह्मण' आज सर्वाधिक विवादास्पद संज्ञा है। जो कभी मस्तिष्क हुआ करता था समाज का वही विवादास्पद हो गया है। विचार करना होगा कि विवादास्पद केवल संज्ञा भर हुयी है या संज्ञा का पदार्थ(sense of the word) भी ? इस विवाद का कारण भी खोजना होगा।

जिस किसी के पास वैचारिक सहिष्णुता, सरलता, तरलता,  उदारता, साहस, त्याग, नवप्रयोग क्षमता, दूरदृष्टि जैसे वैज्ञानिक गुण और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसा सात्विक भाव है क्यों उसे हम ब्राह्मण स्वीकारने से इंकार करें?  ब्राह्मण वही है जो एक कागज़ भरते ही दूसरा कोरा कागज उत्पन्न करने की क्षमता से युक्त है। उसके पास हर किसी के लिये एक कोरा कागज सदैव रहता है।

यह तय है कि श्रेष्ठ बनने के लिये भारतीय समाज के पुनर्गठन की...नव रूपांतरण की आवश्यकता है। ...और तय यह भी है कि यह कार्य, जो किसी क्रांति से कम नहीं, समाज को स्वयं ही करना होगा।


28 टिप्‍पणियां:

  1. यह जनसाधारण को समझना होगा कि क्या वास्तव में राजसत्तायें समाज को विकसित करना चाहती हैं या फिर यह उनका राजनीतिक षड्यंत्र है? सत्तायें यदि वास्तव में समाज का विकास चाहती हैं तो उन्हें पूर्व से प्रशस्त रहे अनुभवी मार्गों का अनुसरण क्यों नहीं करना चाहिये? समाजव्यवस्था के नये प्रयोगों की आवश्यकता क्यों है उन्हें?

    @ समीक्षात्मक संशय ... जो किसी दूरदर्शी के मस्तिष्क की ही पैदावार हो सकते हैं. मेरे मन में भी इन संशयों के बीज थे.... मैं सोचता ही रह गया और आचार्य के अंकुरित भी हो गये. अब ये संशय कब फलते हैं... प्रतीक्षा है. जनसाधारण कब समझेगा राजसत्ताओं के षडयंत्रों को?

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  2. ब्राह्मण वही है जो एक कागज़ भरते ही दूसरा कोरा कागज उत्पन्न करने की क्षमता से युक्त है। उसके पास हर किसी के लिये एक कोरा कागज सदैव रहता है।

    @ चिंतन की नवीनता भी लुभाती है....
    परिभाषाओं को जब नयी शब्दावली मिल जाती है तो पारिभाषित शब्द भी प्रसन्न होता है और पाठक भी....जातिसूचक संज्ञाओं (शब्दों) पर नये लक्षण आरोपित कर देना सहज नहीं.

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  3. बिना दर्शन का मर्म जाने रूढ़ियों की राह में जाने से निष्कर्ष कठिन हो जाते हैं।

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    1. एक्सपर्ट की कही.... थोड़े से शब्दों में ... बहुत कुछ कहती है.
      प्रवीण जी, सार्थक टिप्पणी से परिचर्चा सफल मानी जाती है.
      आपका आभार, जो परिचर्चा में कम शब्दों से भी शामिल हो जाते हो.

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  4. बेहद गहन और विशाल चिंतन आपने यहाँ प्रस्तुत किया,
    वर्ण वयवस्था पर मैमे ओशो के कुछ ऐसे विचार पढ़े थे कि ये एक वैज्ञानिक प्रयोग था भारतीय ऋषि मुनियों का आत्मा को उसके स्वभाव के अनुसार शरीर धारण करवाने का! उनके अनुसार आत्मा को channel provide कर दिए गए थे शरीर धारण करने के लिए उसके स्वभाव के अनुसार ही, तब एक वर्ण में उसी वर्ण की आत्मा शरीर धारण करती और जीवन पर्यंत अपने धर्म -स्वभाव के अनुसार बिना किसी कुंठा के अपनी उस जन्म की यात्रा पूरी करती! पर अब सब खिचड़ी हो चुका है...

    कुँवर जी,

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    1. @ आत्मा को उसके स्वभाव के अनुसार शरीर धारण करवाने का!
      सत्य है, व्यक्ति की आत्मा अपने कर्मों के आधार पर ही अगला शरीर धारण करती है और अपनी शेष लौकिक या आध्यात्मिक यात्रा पूरी करती है।

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    2. कुँवर जी, रामराम

      आपने एक नया विषय परिचर्चा को दे दिया है... आचार्य जी से चाहूँगा कि वे कभी 'आत्मा-परमात्मा और शरीर में उनकी इच्छित गति' पर परिचर्चा करवायें.

      कुँवर जी के साथ हम भी उस चर्चा का सुख लेंगे. अभी तो इस परिचर्चा में अन्य सत्संगियों की सुन (पढ़) लूँ.... देख रहा हूँ चर्चा में काफी वैचारिक घर्षण हुआ है. मैं भी लाभ ले लूँ.

      'आत्मा के स्वभाव' पर नये सिरे से बहस होनी चाहिए.... अभी तो मुझे लग रहा है 'बुरे स्वभाव वाली दुष्ट आत्मायें' सत्ता पर हावी हो चुकी हैं. उन्हें ध्वस्त करने में ऎसी चर्चाओं से भी परोक्ष लाभ होता है.

      @
      'आत्मा का इच्छित शरीर में प्रवेश ले पाना' क्या वास्तव में अब दुरूह है? और क्या अब वे (आत्मा) अपने चुने हुए शरीर को धर्म-स्वभाव के अनुसार जीवन पर्यंत चला पा रहा रहा है? वास्तव में विचारणीय है.

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    3. @ 'आत्मा-परमात्मा और शरीर में उनकी इच्छित गति' पर परिचर्चा
      भाई प्रतुल जी! यह बड़ा ही गूढ़ विषय है ....उलझा हुआ भी, किंतु इस विषय पर चर्चा अवश्य होगी किसी दिन।

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  5. dharmchintan (yadi yah dharmchintan hai to) ke kai prashnon ka uttar yahaan hai -

    http://gsm3419.blogspot.in/2011/09/blog-post_4423.html

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    1. yahaan se kuchh bhaag quote kar rahi hoon -kyonki aap kah rhe hain ki link nahi khula

      चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
      आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥७-१६॥
      अर्थात हे भारत श्रेष्ट अर्जुन! आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी, ऐसे चार प्रकार के लोग मुझे भजते हैं |

      आर्त भक्त कैसे होते हैं ? आइए पहले इनके विषय में जाने | आर्त का सामन्य अर्थ होता है - दुःख से पीड़ित व्यक्ति | अत: आर्त भक्त वे हैं, जो अपनी किसी दुख के निवारण के लिए भक्ति करते हैं | ... कब ? तभी जब इन्हें कोई शारीरक या मानसिक कष्ट आ घेरता है |

      दूसरे प्रकार के भक्त होते हैं - अर्थार्थी | ये वे भक्त हैं जो सांसारिक पदार्थों की कामना के लिए भक्ति करते हैं | धन - वैभव, संतान आदि नियामतें पाने के लिए इबादत करते हैं | ...महापुरष कहते हैं कि यह मांगना ही भक्ति मार्ग में सबसे बड़ी बाधक है | जब किसी हेतु से भक्ति की जाती है, तो वह भक्ति नहीं व्यापार बन जाती है |

      तीसरे प्रकार के भक्त जिज्ञासु प्रविर्ती के होते हैं | इनमें ईश्वर को जानने की तीव्र ललक होती है | इस कारण ये शास्त्र ग्रंथों का गहन अध्ययन व् रटन करते हैं | पोथी पंडित बन जाते हैं | फलस्वरूप इनका बोधिक विकास तो हो जाता है | ये शास्त्रर्थ करने में निपुण हो जाते हैं | परन्तु आत्मिक लाभ नहीं उठा पाते |

      चोथी श्रेणी ज्ञानी भक्तों की है | ...न ऐसा नहीं इनके जीवन में कोई सांसारिक अभाव नहीं होता | लेकिन ये उस अभाव की पूर्ति के लिए ईश्वर से कभी गुहार नहीं करते | प्रभु से केवल प्रभु को मांगते हैं |

      तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
      प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥७-१७॥
      अर्थात इन चार प्रकार के भक्तों में, परमात्मा के साथ नित्ययुक्त अनन्य प्रेम करने वाला ज्ञानी विशेष है, क्यों कि ज्ञानी के लिए मैं अत्यंत प्रिय हूँ, तथा मेरे लिए वह अत्यंत प्रिय है |

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    2. श्रीमद्भगवद्गीता तो ज्ञान का कोष है, उसका प्रत्येक श्लोक प्रभावित करता है।

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    3. यदि भक्ति चार उद्देश्यों की पूर्ति करती है अथवा चार प्रकार से प्रभु का भजन कराती है तब तो समय-समय पर चारों ही प्रकार से हम उसे भजते हैं.
      — साइकिल सवार और पैदल (मैं) की मुठभेड़ में जब हाथ का अंगूठा फटकर खून से सन गया .... तब मैं 'हाय राम' 'राम' राम' शब्दों से 'आर्त भक्ति' करता हुआ घर लौट आया. और तभी सोचता भी जा रहा था कि कल कार्यालय में अपने बेहद जरूरी काम कैसे करूँगा.... "हे भगवान्, कोई उपाय निकालो न!" [ दुःख और कातर भाव से की जाने वाली ..... इसे कहते हैं 'शुद्ध आर्त भक्ति']

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    4. — हमारे जीवन में तमाम अभाव हैं उसे कम करने के लिये या समाप्त करने के लिये मैं और पत्नी सुबह-शाम प्रभु की आराधना करते हैं..... प्रतिदिन की पूजा एक आदत बन जाने के कारण और देने वाले की कंजूसी के कारण हम दोनों अब ये भूल भी गये हैं कि हम भक्ति करते क्यों हैं... मतलब ये कि हमने माँगना ही छोड़ दिया है... लेकिन पूजा (भक्ति) अब आदत हो चुकी है. महापुरुषों ने सही कहा है कि 'भक्ति में माँगना नहीं चाहिए' क्योंकि वे जानते हैं कि प्रभु (जिसकी भक्ति की जा रही है) कुछ दे नहीं सकता, उसके वश में नहीं है कुछ दे पाना.' जब वह कुछ दे नहीं सकता तो आखिर उसे भजा क्यों जाये?'

      मैं समझता हूँ कि "जब अभावग्रस्त किसी को सक्षम जानकार गुहार लगाता है तब ही उसे 'अर्थार्थी भक्ति' कहा जाता है. यह भक्ति फलीभूत कैसे होती है... इस पर मेरा दृष्टिकोण कुछ इस तरह है....

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    5. 'मैं बस में यात्रा कर रहा था... एक अनजान व्यक्ति बस में चढ़कर 'राम मनोहर लोहिया अस्पताल' के बारे में में पूछ रहा था.... लेकिन जिससे पूछ रहा था... वह बताने में समय ले रहा था.... उसके बताने से पहले ही मैंने उसे अमुक स्थान के बारे में सही-सही बता दिया.' उसने मुझे 'धन्यवाद किया' और आगे बढ़ गया... जबकि उस अनजान राही ने मुझसे पूछा भी नहीं था फिर भी उसके 'धन्यवाद का पात्र' मैं अनायास ही हो गया.

      जीवन में न जाने कितने ही प्रकरण ऐसे घटित होते हैं... जिनका श्रेय हमें अनायास मिल जाता है.

      अनजान राही (भक्त) चाहता है.... जिससे पूछना (माँगना) ... मिलता उससे बेशक नहीं कुछ...

      लेकिन आस-पास के लोग उसकी सहायता कर देते हैं. ..... इस तरह फलीभूत होती है 'अर्थार्थी भक्ति'.

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    6. — जो जिज्ञासु वृत्ति के भक्त होते हैं उन्हें क्या सचमुच आत्मिक लाभ नहीं मिलता? यह आत्मिक लाभ क्या 'आनंद' रूप से हटकर है? जिज्ञासाओं का शमन होने पर जो आत्मिक सुख होता है वह क्या लाभ नहीं? क्या लाभ 'वस्तुओं' में ही गिना जाता है? क्या 'आनंद' का होना लाभ नहीं माना जाता? जिज्ञासाओं का शमन होना और फिर नयी-नयी जिज्ञासाओं का उदभव होते रहना ठीक उसी तरह से तो है ... जैसे एक फसल पक गयी, काट ली गयी और फिर उसी भूमि पर नयी फसल लेने के लिये नये बीज बो दिये गये.' इस चक्र का चलते रहना क्या आत्मिक आनंद को क्षरित करता है?

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    7. जी - यह भी सही interpretations हो सकते हैं |

      आपके प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं हैं | खोज रही हूँ | परन्तु खोज अधूरी ही रहती है | only a very knowledgeable person can probably answer these questions - i don't fit that definition |

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    8. — ज्ञानी भक्त प्रभु को क्या वास्तव में 'सक्षम' मानते हैं?....प्रभु से केवल प्रभु को माँगने के पीछे उनकी समझ और सोच क्या है?

      वे जानते हैं.... प्रभु के देने का तरीका 'सामान्य व्यापार वाला' नहीं, मतलब 'एक हाथ ले, एक हाथ दे' वाला तरीका यहाँ कारगर नहीं....

      क्योंकि शरीर साध्य है...इसलिये वह शारीरिक स्वास्थ्य के लिये योग की शरण लेता है, आहार में संतुलन लाता है.

      और मानसिक स्वास्थ्य के लिये उसकी चंचलता, जो कि तनाव का कारण है, को नियंत्रित करता है. शब्द जाप पद्धति, भजन-कीर्तन उसके ध्यान को एकाग्र करते हैं... इसे भक्ति नाम से जरूर जाना जाता है किन्तु ये असल में अस्थिरचित्त व्यक्ति के लिये मानसिक-चिकित्साएँ हैं... शब्द चाहे 'राम' नाम हो अथवा 'ॐ' नाम हो अथवा कोई भी शब्द (जिसे जपने वाला अच्छे सन्दर्भ से जोड़कर ग्रहण करता है) हो, इनका जाप लाभ देगा ही. वह शारीरिक और मानसिक लाभ इसलिये लेता है कि वह मुख्य काम में बाधा नहीं लाना चाहता है अर्थात वह आधार मज़बूत रखकर ही 'अज्ञात शक्तियों' और 'उलझे रहस्यों' पर चिंतन कर सकेगा. उसकी भक्ति बाह्य रूप से बेशक 'छाप तिलक माला' वाली हो किन्तु आंतरिक रूप से उसके पाने की चेष्टाओं को नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए.

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    9. @ चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः ...आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च
      ईश्वर को भजने वालों का यह सामान्य वर्गीकरण है। प्रशस्त भक्त है ज्ञानी,क्योंकि वह सब कुछ डिस्क्रिमिनेट करने के बाद ईश्वर को भजता है। उसका भजन निःस्वार्थ है। ईश्वर ने उसे जितना जो कुछ दिया है वह उतने से ही संतुष्ट है और उससे अधिक की आशा नहीं करता। इसके बाद भी ईश्वर को भजता है इसीलिये चारो भक्तों में प्रशस्त है। जो जिज्ञासु है वह विद्यार्थी की भाँति उत्सुक है ...जानने के लिये, यही तो सच्चा पथिक है। यह ज्ञानी से तुरंत पूर्व की स्थिति ह। लाभ की ...कुछ पाने की आशा यहाँ भी है किंतु विषय श्रेष्ठ है इसलिये यह भक्त भी श्रेष्ठ है।जिज्ञासु किसी सांसारिक वस्तु की आशा नहीं करता ...ज्ञान की आशा करता है, ज्ञान का पिपासु है वह इसलिये उसकी जिज्ञासा जब शांत होती है तो वह भी अवर्णनीय़ सुख का लाभ करता है.....हम एक्सटेसी कह सकते हैं इसे।
      जो अर्थार्थी है वह सांसारिक मायामोह के पाश में आबद्ध है, ईश्वर का यह भजन प्रशस्त नहीं कहा जा सकता। जो आर्त है वह विवशता में ईश्वर को भज रहा है। पीड़ा न होती तो कदाचित न भजता। कंडीशनल है उसका भजन...इसीलिये निकृष्ट है। किंतु इन चारो भक्तों में एक बात जो सामान्य है वह है ईश्वर को ही भजना किसी अन्य को नहीं। अर्थात ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्था का होना ही भारतीय लोक जीवन का आध्यात्मिक प्राण है। जब हम कहते हैं कि सब मिट गये पर कुछ बात है कि हमारी हस्ती नहीं मिटती ...तो उसका कारण यही है। ईश्वर के प्रति इस स्वाभाविक आस्था का प्रवाह हमें मिटने नहीं देता।

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    10. @....प्रभु से केवल प्रभु को माँगने के पीछे उनकी समझ और सोच क्या है?
      हम दौड़ते हैं तभी तक जब तक अभिलषित को पा नहीं लेते। पा लेते ही दौड़ समाप्त हो जाती है, यह जिज्ञासु की दौड़ है। किंतु तब एक दूसरी स्थिति निर्मित हो जाती है...जो पा लिया है उसे खोने का तो डर हो ही सकता है न! तो ज्ञानी की जो भक्ति है वह इस पा लेनेवाली स्थिति को बनाये रखने के लिये है। वह अतिरिक्त नहीं पाना चाहता, जो पा लिया है उसे ही बनाये रखना चाहता है। यह चाहत हमें अकर्मण्य और दम्भी होने से बचाती है।

      हटाएं
  6. बेहद गहन और वशाल िचंतनआपनेयहाँतुतकया, वण वयवथा पर मैमेओशो केकुछ ऐसेवचार पढ़ेथेक ये एक वैािनक योग था भारतीय ऋष मुिनय का आमा को उसके वभाव केअनुसारशरर धारण करवाने का! उनके अनुसारआमा को channel provide कर दए गए थे शररधारण करनेके िलए उसकेवभाव केअनुसारह, तब एक वण म उसी वणक आमा शरर धारण करती और जीवन पयत अपने धम -वभाव के अनुसार बना कसी कुंठा के अपनी उस जम क याा पूर करती! पर अब सब खिचड़ी हो चुका है...

    कुँवर जी,

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  7. आदरणीय सुज्ञ जी का लिखा कुछ कोट कर रही हूँ ( ( इसमें मेरा लिखा कुछ भी नहीं है | respected guruvar sugya ji - yadi aapko aapatti hai - to kahiyega, yah tippani hataa loongi ) ) :

    सत्य पाने का मार्ग अति कठिन है। सत्यार्थी अगर सत्य पाने के लिए कटिबद्ध है, तो उसे बहुत सा त्याग चाहिए। और अटूट सावधानी भी। कईं तरह के मोह उसे मार्ग चलित कर सकते है। उसके स्वयं के दृष्टिकोण भी उसके सत्य पाने में बाधक हो सकते है।
    १. मताग्रह न रखें : सत्य खोजी को चाहिए, चाहे कैसे भी उसके दृढ और स्थापित पूर्वाग्रह हो। चाहे वे कितने भी यथार्थ प्रतीत होते हो। जिस समय उसका चिंतन सत्य की शोध में सलग्न हो, उस समय मात्र के लिए तो उसे अपने पूर्वाग्रह या कदाग्रह को तत्क्षण त्याग देना चाहिए। अन्यथा वे पूर्वाग्रह, सत्य को बाधित करते रहेंगे। सोचें कि मेरा चिंतन ,मेरी धारणाओं, मेरे आग्रहों से प्रभावित तो नहीं हो रहा? कभी कभी तो हमारी स्वयं की 'मौलिक विचारशीलता' पर ही अहं उत्पन्न हो जाता है। और अहं, यथार्थ जानने के बाद भी स्वयं में, विचार परिवर्तन के अवसर को अवरोधित करता है। सोचें कि कहीं मैं अपनी ही वैचारिकता के मोहजाल में, स्वच्छंद चिंतन में तो नहीं बह रहा? कभी कभी तो अजानते ही हमारे विश्लेषण मताग्रह के अधीन हो जाते है। प्रायः ऐसी स्थिति हमें, सत्य तथ्य से भटका देती है।
    २. पक्षपात से बचें : प्रायः हमारी वैचारिकता पर किसी न किसी विचारधारा का प्रभाव होता है। तथ्यों की परीक्षा-समीक्षा करते हुए, अनायास ही हमारा पलड़ा सत्य विरूद्ध झुक सकता है। औरअक्सर हम सत्य के साथ 'वैचारिक पक्षपात' कर बैठते है। इस तरह के पक्षपात के प्रति पूर्ण सावधानी जरूरी है। पूर्व स्थापित निष्कर्षों के प्रति निर्ममता (क्रूरता नहीं - निः + मम = निर्मम )- का दृढ भाव चाहिए। सम्यक दृष्टि से निरपेक्ष ध्येय आवश्यक है।
    ३. सत्य के प्रति श्रद्धा : यह निश्चित है कि कोई एक 'परम सत्य' अवश्य है। और सत्य 'एक' ही है। सत्य को जानना समझना और स्वीकार करना हमारे लिए नितांत ही आवश्यक है।" सत्य पर इस प्रकार की अटल श्रद्धा होना जरूरी है। सत्य के प्रति यही आस्था, सत्य जानने का दृढ मनोबल प्रदान करती है। उसी विश्वास के आधार पर हम अथक परिश्रम पूर्व सत्य मार्ग पर डटे रह सकते है। अन्यथा जरा सी प्रतिकूलता, सत्य संशोधन को विराम दे देती है।
    ४. परीक्षक बनें : परीक्षा करें कि विचार, तर्कसंगत-सुसंगत है अथवा नहीं। वे न्यायोचित है या नहीं। भिन्नदृष्टिकोण होने कारण हम प्रथम दृष्टि में ही विपरित विश्लेषण पर पहुँच जाते है। जैसे सिक्के के दो पहलू होते है। दूसरे पहलू पर भी विचार जरूरी है। जल्द निर्णय का प्रलोभन त्याग कर, कम से कम एक बार तो विपरित दृष्टिकोण से चिंतन करना ही चाहिए। परिक्षक से सदैव तटस्थता की अपेक्षा की जाती है। सत्य सर्वेक्षण में तटस्थ दृष्टि तो आवश्यक ही है।
    ५. भेद-विज्ञान को समझें : जो वस्तु जैसी है, उसे यथारूप में ही मनन करें और उसे प्रस्तुत भी उसी यथार्थ रूप में करें। न उसका कम आंकलन करें न उसमें अतिश्योक्ति करें न अपवाद मार्ग का अनुसरण करें। तथ्यों का नीर-क्षीर विवेक करें। उसकी सार्थक समीक्षा करते हुए नीर-क्षीर विभाजन करें। और हेय, ज्ञेय, उपादेय के अनुरूप व्यवहार करें। क्योंकि जगत की सारी सूचनाएँ, हेय, ज्ञेय और उपादेय के अनुसार व्यवहार में लानी चाहिए। अर्थात् ‘हेय’ जो छोड़ने लायक है उसे छोड़ें। ‘ज्ञेय’ जो मात्र जानने लायक है उसे जाने। और ‘उपादेय’ जो अपनाने लायक है उसे अपनाएँ।

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    1. सत्यार्थी के लिये सम्यक दिशानिर्देश है, सहमत हूँ।

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    2. अरे वाह!! यहां तो हमारे विचार पुनः परीक्षा पर चढ़ाए गए है। समीक्षा होती तो आनन्द दुगुना हो जाता।

      कौशलेन्द्र जी नें विचारों पर सहमति प्रदान कर अभिभूत कर दिया। आभार आपका।

      शिल्पा जी आपका भी आभार।

      कोई अन्य ब्लॉग होता तो मेरे इस इतने बडे आलेख को बुद्धि प्रदर्शन और अनधिकार चेष्टा कहकर टिप्पणी से हटा देता। :) भारत भारती तो अपनाईच परिवार है। :)

      हटाएं
    3. सुज्ञ जी! यह बुद्धिविलास नहीं अपितु सत्यार्थी के लिये शास्त्रोक्त दिशानिर्देश हैं। इसके इतर और कोई भी मार्ग ज्ञानपिपासु को सत्य तक नहीं ले जा सकता। इसे हम ancient methodology of scientific research भी कहते हैं। ऋषि प्रणीत इस मार्ग की उपेक्षा के कारण ही तो लोग बुद्धि विभ्रम में पड़े हुये हैं। इस विषय पर मेरा एक शोधपत्र भी है।
      आपका यह आलेख बहुउद्देश्यीय है। वैज्ञानिक अनुसन्धानों में भी इन सिद्धांतों का उपयोग किया जाना चाहिये...तभी हम सत्य के समीप पहुँच सकेंगे।

      हटाएं
    4. कईं तरह के मोह उसे मार्ग चलित कर सकते है।
      @ मुझे लगता है सुज्ञ जी के आलेख के इस वाक्य में 'चलित' शब्द के स्थान पर 'स्खलित' होना चाहिए.
      मोह से मार्ग स्खलित होने का भय रहता है... 'चलित' से कहने का भाव स्पष्ट नहीं हो पा रहा है.

      .... हर बार की तरह इस बार भी 'चर्चासुख' हुआ.

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    5. सही कहा प्रतुल जी, स्खलित सही है। फिसलन के अर्थ प्रयोग 'चलित' की आदत सी है। किन्तु शब्द तो वही जो पाठक तक सटीक भाव प्रेषित करे। "भिन्न भिन्न प्रकार के मोह उसे मार्ग से विचलित कर सकते है।" यह वाक्य कैसा रहेगा?

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  8. सार्थक विवेचन……

    "व्यष्टि से समष्टि तक के कल्याण की भावना से ऋषिप्रणीत आचरण ही तो मानव मात्र का धर्म है। इस आचरण को किसी नाम विशेष या वर्ग विशेष से बांधा नहीं जा सकता, यह तो सभी मनुष्यों के लिये अनुकरणीय है ...इसीलिये सनातन है।"

    'ब्राह्मण' संज्ञा आज विवादास्पद ही नहीं ताने उल्हाने के लिए रह गई है।

    लोगों में विद्वेष फैलाने और समाज का विखण्डन करने के षडयन्त्र के रूप में भेदभाव के मुद्दे को प्रबल बनाया गया।

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