सोमवार, 7 मई 2012

लगातार बढ़ते जा रहे हैं अश्लीलता के दबाव

लेखिका : वन्दना भारतीय

आजादी की एक लम्बी यात्रा के बाद आज़ देश सामाजिक जीवन के सबसे विडंबनापूर्ण बिंदु पर खड़ा है. हर समाज की एक आंतरिक गति होती है. स्थितियों के स्वीकार-अस्वीकार, सहमति-असहमति को वह उसी आंतरिक गति की कसौटी पर कसता है और जो स्थितियाँ या दर्शन सामाजिक ऊर्जा-प्रसार में बाधक लगता है, उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता किनारे कर देता है. हमारे यहाँ ऊर्जा का यह प्रवाह पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया है.

आजादी मिलते ही सरकार चलाने वाले लोगों के मन में कही चोर छिपा बैठा था. लिप्सा और सुविधा की उस कमज़ोर नस पर यदि तभी उँगली रखी जाती तो आज़ नक्शा ही कुछ और होता. पर थके शरीर और बूढ़े मन के नेताओं से यह उम्मीद बेकार थीं. समाज की आंतरिक गति के रास्ते में राजनीति का यह रोड़ा आज़ पहाड़ जितना हो गया है.

नागरिक जीवन के कमज़ोर पड़ते ही पूँजीवादी ताकतों के आगे समर्पण का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह चलता ही जा रहा है. आखिर पूँजीवाद से भय खाने की क्या जरूरत है, जबकि वह सारे उन्नत देशों का आधार है. मुझे लगता है, पूँजीवादी दर्शन को हर देश ने अपने हिसाब से अपनाया है, अपनी तरह से उसमें काटछाँट की है, जबकि यह मूलतः भारतीय चिंतन का दर्शन नहीं रहा है. जब हमने उसका आयात किया, तो अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा कहीं और देखने-सुनने की जरूरत नहीं समझी. एक बात और भी है. औपनिवेशिक विस्तार के मूल में पूँजीवादी दर्शन सदियों से औपनिवेशिक नीति का शिकार रहे हैं. खुद हमारी अपनी प्रकृति किसी रूप में कभी आक्रामक रही नहीं. तब यूरोपीय पूँजीवादी दर्शन कितना फलदायी होता, यह सोचने का विषय है.

इस दर्शन का एक खतरनाक पक्ष यह भी है कि इसमें वस्तु से लेकर भावनाएँ और संवेदनाएँ एक अंततः व्यापार होते जाना है. आज़ सारी कशमकश इसी व्यापारिकता बनाम मानवीयता के बीच है. भारतीय समाज अपने मूल रूप में मानवीय सरोकारों से थोड़ा ज़्यादा ही जुड़ा रहा है, इसलिये संबंधों-संवेगों को बेचने की कला उसे कभी नहीं आई. आज़ नई अर्थव्यवस्था उसे वस्तुओं के साथ-साथ रिश्तों को बेचने की कला भी सिखा रही है और लोग चमत्कृत हैं. इस चमत्कार की चकाचौंध में जो चीज़ सबसे ज्यादा विज्ञापित की जा रही हैं, वह नारी देह है. आधुनिक होने का मतलब अधिक से अधिक खुलना है और खुलने के दे लिये नारी देह से अधिक बंद और है क्या?
यह एक गंभीर मुद्दा है आधुनिक भारतीय समाज के सन्दर्भ में. कहावत है कि सारे नकटों के बीच एक नाकवाला ही हँसी का पात्र बनता है. कुछ इसी तरह की स्थिति में आज़ की औरत अपने को पाती है. यदि ब्यूटी पार्लर, फैशन शो, ब्वाय फ्रेंड आदि की प्रासंगिकता उसकी समझ में नहीं आती है, तो वह पिछड़े समाज की दकियानूस लड़की है. इसी दबाव का करुण एहसास पटना में आयोजित एक सौन्दर्य प्रतियोगिता में हुआ. यद्यपि आधुनिकता के फ्लड लाइट में बिहार भी रह रहा है, पर सामाजिक जीवन में औरत-मर्द के बीच संबंधों का कोई आधार वहाँ विकसित नहीं हुआ है. कोलेज केम्पस की तो बात ही छोड़ दें. जो कुछ है, वह सड़क-छाप मजनुओं की दिलफेंक अदायें हैं जो मानव युग की शुरुआत से चली आ रही हैं. जिस समाज में लडकियाँ बेहिचक साइकिल तक नहीं चला सकतीं, सीधे लड़कों की आँखों में देखकर बात नहीं कर सकती, वहाँ सौन्दर्य प्रतियोगिता में पूछे गये एक अटपटे सवाल के जवाब में लड़कियों ने बेहिचक उत्तर दिया -- उन्हें चुम्बन से कोई परहेज नहीं. यह जवाब पिछड़ेपन पर आधुनिकता का ठप्पा है या लड़कियों पर अश्लीलता का दबाव है. जाने-अनजाने आधुनिकता का सबसे अच्छा दबाव आज़ औरत ही झेल रही है. उसने 'खिलने के लिये' खुलना शुरू किया था, पर अब इस दौड़ में आज़ वह लगभग नंगी हुई जा रही है.
भारतीय समाज में नारी अस्मिता के लिये अपना पूरा जीवन खपा देने वाली दो औरतें प्रमुख रही हैं और सामाजिक जीवन पर इनका प्रभाव लम्बे समय तक रहा है, ये हैं द्रोपदी और मीरा. अपने-अपने काल की ये दोनों स्त्रियाँ सही मायनों में आधुनिक थीं. अपने समय के समाज की रूढ़िगत मान्यताओं पर चोटकर इन्होंने न केवल अपना जीवन अपनी तरह जिया, वरण सम्पूर्ण सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित किया. आज़ के आधुनिक समाज को शायद यह बात असंभव सी लगे कि अपने समय से कई बरस आगे का जीवन दर्शन अपनाने के बाद भी उनमें से किसी के लिये देह प्रमुख नहीं रही. मीरा के जितना निडर और समरस व्यक्तित्व तो इतिहास में फिर दिखायी नहीं देता. आधुनिक भारतीय इनका बस इतना ही प्रयोजन रह गया है. स्त्री देह के साथ जो मनमानी यहाँ हो रही है और सब कुछ जानने के बाद भी कमनीयता के जाल में औरत जिस तरह फँसती जा रही है, उसका एक कारण अपनी जड़ों से कटना भी है.
यह कैसी अजीब विसंगति है कि छात्रों की समस्याओं को जानने-समझने के लिये विश्वविद्यालय में जिन छात्र संगठनों का जन्म हुआ, उन्हीं में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले कुछ सालों से यूनियन के चुनाव में छात्राओं का वर्चस्व रहा है. इसकी वजह छात्र समस्याओं पर उनकी पकड़, दिलचस्पी या कर्मठता नहीं रही है, वरण उनका सुन्दर होना उनकी जीत का एक महत्वपूर्ण कारक है. आम बातचीत में छात्र स्वीकारते हैं कि छात्राओं के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष होने से गतिशीलता में कमी ही आई है.
युवा पीढ़ी के अन्दर सुन्दरता का आकर्षण हमेशा से रहा है, पर यह युवा ही है जिन्होंने ख़ास मकसदों के आड़े, धर्म, सम्प्रदाय, सुन्दरता या प्यार को नहीं आने दिया है. पिछले पचास-साठ बरसों में मूल्यों का अवमूल्यन होते-होते हालत यहाँ तक आ गई है कि औरत जिस्म के आगे कुछ रह ही नहीं गई है. विश्वविद्यालयों के सन्दर्भ में जहाँ सुन्दरता से वंचित, पर सक्षम कर्मठ लड़कियों का हीनभावना से ग्रस्त होकर हाशिये पर पहुँच जाना है, वहीं सुन्दर लड़कियाँ दूसरों को नचाने की कोशिश में कभी-कभी पूरी जिन्दगी नाचती रह जाती है. सुन्दरता ऐसे असंतुलित निष्कर्ष भी निकालती है.
दैहिक सौन्दर्य आज़ अचानक जैसे रणनीति का हिस्सा बन गया है औरत के प्रति उसका रुख आक्रामक हो उठा है. आक्रामक इस अर्थ में कि बिना अपीलिंग हुए जैसे अब औरत का निस्तार नहीं. सच तो यह है कि विज्ञापनों के अलावा औरत की निजता को सबसे ज़्यादा छिन्न-भिन्न औरत ने ही किया है. सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय का सौन्दर्य किसी एक के जीने-मरने का सबब (!) न रहकर किस तरह विज्ञापित का लेबल बनकर रह गया है, उसकी कोई परवाह किये बिना चौदह साल से ऊपर की हर किशोरी, जिसके पास ५ फुट ४ इंच की लम्बाई और नाक नक्श थोड़े सीधे हैं, सुष्मिता और ऐश्वर्या के हाथों अपने सिर पर किसी न किसी ताज को रखा हुआ देख रही है. इसके लिये वह कुछ भी करने को तैयार है. हर छोटे-छोटे शहर के गली-मोहल्लों में खुलते ब्यूटी पार्लर और उसी तादाद में छोटे-छोटे शहरों तक में होने वाली मिस सिटी सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ उसी देशभक्ति को परवान चढ़ा रही हैं. गाहे-बगाहे उज्ज्वलता राउत जैसी (मुम्बई उपनगर दहीसर निवासिनी) मध्यवर्गीय परिवार की कोई लड़की जब ऎसी प्रतियोगिताओं की किसी ऊँची सीढ़ी तक जा पहुँचती है, तो लड़कियों की आँखों की नींद उड़ जाती है. हर किसी की आँखों में बसने का सपना तो साकार होना ही है-- साथ ही समृद्धि के पहले दरवाजे में दाखिला मिलता है पचास हजार डालर के साथ. हर सौन्दर्य प्रतियोगिता के पीछे कोई न कोई विज्ञापन एजेंसी होती है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष यह कहती होती है कि सौन्दर्य प्राकृतिक अवदान नहीं. हमारी शरण में आओ, हम तुम्हारे छिपे सौन्दर्य को उभार देंगे. उपग्रह की मदद से टीवी द्वारा जब यह सन्देश सात दिन के चमत्कारी उपाय की शक्ल में घर-घर पहुँचता है तो जैसे एक जटिल मनोविज्ञानिक ग्रंथि हर घर में अपनी जगह बना लेती है. थम्सअप के लिये गगनचुम्बी इमारत से छलांग लगा मौत के मुँह में समाने वाला बच्चा इसका ही शिकार है तो शिकार है वह किशोरी भी, जो महानगर की गलियों में घर-घर चौका बर्तन करती हुई माँ से उसकी एक महीने की पगार लड़कर लेती है-- पढ़ने के लिये नहीं, गोरा बनाने वाली क्रीम के लिये. इन सौन्दर्य प्रसाधनों के कंधे से कंधा मिलाये खड़े हैं ब्यूटी पार्लर, जो रंग को सही आकार देने का दावा करते हैं. इन सौन्दर्य प्रसाधनों और ब्यूटी पार्लरों ने सम्मोहिनी विद्या का ऐसा जादू फैलाया कि बच्चे की स्कूल फीस और ब्यूटी पार्लर की मासिक फीस के बीच रस्साकशी शुरू हो गई है.
आज़ पंद्रह सौ करोड़ रुपये के सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग में जहाँ हर साल पंद्रह प्रतिशत का उछाल रहा है, वहीं नाक-नक्श को आकर्षक रखने के लिये प्लास्टिक सर्जरी का चलन भी बढ़ रहा है. मशहूर प्लास्टिक सर्जन डॉ. नरेश पंड्या (मुम्बई) का कहना है कि कोस्मेटिक सर्जरी सिर्फ मॉडल ही नहीं, साधारण लोग भी सपना रहे हैं. दरअसल, ये साधारण लोग ही सौन्दर्य के आक्रमण का शिकार हैं. किसी भी कीमत पर सौन्दर्य को बनाए रखना है. देह को उम्र से चुराए रखना है, वरना नौकरी या पढ़ायी से नहीं, औरत घर से बाहर कर दी जायेगी --- विज्ञापन की दुनिया के माध्यम से कुछ ऐसा ही समाँ-सौन्दर्य विशेषज्ञों ने बाँध रखा है. लाचार मध्यमवर्गीय स्त्री ठिठक कर सोचती है कि मुट्ठी में अतिरिक्त बच गये दस रुपये का फ़ल खरीद ले या अपनी भवें दुरुस्त करवा लें. बात यहीं आकर नहीं रुकती. अब तो नाक या ठुड्डी ही नहीं कोस्मेटिक सर्जरी द्वारा स्तनों को घटाने-बढ़ाने के कारगर उपाय मौजूद हैं. इस सारी स्थिति पर सौन्दर्य विशेषज्ञों की टिप्पणी है कि भारतीय महिला ने अंततः मातृत्व से स्त्रीत्व की हैसियत प्राप्त कर ली है. अब यह अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर सचेत है (इंडिया टुडे, २० नवम्बर १९९६). यह सौन्दर्य का कोमल पवित्र चेहरा नहीं, विरूपित और आक्रामक मुद्रा है, जिससे डर लगता है.
इसकी एक बड़ी वजह उपग्रह टीवी का हमला है. टेलीविज़न के चलते आज़ विज्ञापन बाज़ार सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता हुआ घरों से स्त्री और बच्चों को उठाने लग गया है. प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या का अनुकरण करते हुए मात्र आधा घंटा टीवी के विज्ञापनों पर नज़र दौडायें. कार और इस्पात से लेकर रेज़र, ब्लेड, आफ्टर शेव तथा अंडरवियर तक के विज्ञापन में अगर कुछ विज्ञापित होता है, तो वह है नारी देह. विज्ञापित वस्तुयें ज़ेहन में कम आती हैं. प्रतीक के रूप में आती हैं. औरत, जिसका एकमात्र कर्म-धर्म पुरुष को लुभाना रह गया है. मर्द में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की औरत को कितनी बड़ी कीमत अदा करनी पड़ रही है. कामकाजी महिलायें अपने वेतन का एक तिहाई हिस्सा अपनी सुन्दरता पर खर्च करती है. हेल्थ सेंटर, ब्यूटी पार्लर ब्यूटी क्लीनिक और इन सबके ऊपर होने वाली सौन्दर्य प्रतियोगिताएँ, सब मिलाकर ऐसा जाल बुन रहे हैं, जो स्त्री को जितना फँसा रहा है, उसका स्त्रीत्व उतना ही नष्ट हो रहा है. कसा कि स्कूल, कॉलेज, बस, बाज़ार, दफ्तर, घर, हर जगह नाजायज़ मांगों के आगे औरत को झुकाना मुश्किल होता है, तो बात बनती दिखायी देती. पर यहाँ तो कई तरह के दबावों के बीच जीती औरत को इस साज सज्जा ने जैसे और दबा दिया है. दफ्तर, कारखाने, बस, बाज़ार, कॉलेज कैम्पस - हर जगह उसका रूप जैसे आमंत्रण देता सा लगता है और पहले से ही दुराग्रही समाज का दुराचरण थोड़ा और बढ़ जाता है.
एक तरफ समाज में बढ़ती बलात्कार और छेडछाड की घटनाएं, अबोध बच्चियों के साथ किये जाने वाले पाशविक कुकृत्य, दफ्तरों-कारखानों में औरतों के नाजायज़ संग की चाहत, शालीन सुसंस्कृत (आधुनिक परिभाषा में शालीन सुसंस्कृत = अमीर) लोगों के लिये चलाये जाने वाले पब्लिक स्कूलों में, आठवीं-नवीं कक्षाओं से लड़के-लड़कियों का झुरमुट के पीछे झुण्ड में बैठकर सिगरेट पीना और दूसरी तरफ एक पूरी पीढी के बचपन का पेट की आग बुझाने के लिये कचरे के ढेर से लेकर कल-कारखाने, ढाबे और घरों में मशीन की तरह अधिक से अधिक पा लेने की भूख और फकतदम आदमी और दूसरी तरफ बेशुमार सुविधाओं का सतत प्रदर्शन, आखिर इनके भीच कोई संबंध बनता है या नहीं.
महानगरों के आसपास बसने वाले कस्बों के सरकारी स्कूलों के बच्चों को स्कूल बैग के अन्दर कच्ची शराब की थैलियाँ सप्लाई की जाती हैं और प्रति थैली पचहत्तर पैसे से एक रुपया कमा लेने की छूट होती है. कितनी भयावह स्थिति में हम जी रहे हैं. सौंदर्य के आत्मविश्वास से भरपूर किसी ब्यूटी क्वीन ने, किसी ब्यूटी पार्लर ने, किसी कॉस्मेटिक कम्पनी ने उपर्युक्त परिस्थितियों में से किसी के खिलाफ आज़ तक कोई दबाव नहीं बनाया है. दरअसल, यह सब उपभोक्तावादी समाज के सहज परिणाम हैं. परिस्थितियाँ इनका निर्माण करती हैं, पर चपेट में इन्सान आता है.
वैसे इन सारी परिस्थितियों के लिये भारतीय राजनीति भी कम दोषी नहीं. स्व के स्वार्थ के इर्द-गिर्द लिपटे दिशाहीन राजनीतिज्ञ इस हद तक अश्लील हो उठे हैं कि नागरिक सरोकारों से उनका कोई वास्ता ही नहीं रह गया है. अपनी करनी से ये लोगों को धनपशु होने के लिये उकसा रहे हैं. सामाजिक जीवन की बहुत सारी विसंगतियाँ अश्लीलता अंकुशरहित आजादी के इस दबाव का ही परिणाम है.
अंततः फिर लौटें अपने विषय की और, गहराई से परखें, तो पता चलता है कि सुन्दरता और चाहत मूलभूत प्राकृतिक भावनाएँ हैं. जितना सच यह है, उतना ही सच यह भी है कि सुन्दरता देखने वालों की आँखों में बसी होती है. सबसे ज़्यादा सुन्दर तो हमें हमारी करनी बनाती है. तभी शिशु को अपनी माँ से ज़्यादा सुन्दर और कोई नहीं लगता और मजनू लैला पर कुबान होते आये हैं. मदर टेरसा और कस्तूरबा को देखते हुए सुन्दर-असुंदर की सीमा-रेखाएँ समाप्त हो जाती है. आधुनिक भारतीय समाज में देखें, तो रूखे बालों वाली मेधा पाटकर और दो चोटियों वाली लता मंगेशकर में कोई नुक्स नज़र आता है क्या?

लेखिका : वन्दना भारतीय, प्रसिद्द कहानीकार और सामाजिक कार्यकर्ता 

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही गहन विश्लेषण है..आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही गहन विश्लेष्ण,और ये मात्र विश्लेषण ही नहीं उतनी ही गहरी पीड़ा भी है जो आदि शक्ति को उपभोग की वस्तु बनते देख कर उभर रही है,आधुनिकता का अर्थ अश्लीलता कभी नहीं हो सकता! हमारे जो आदर्श होते थे जो हमें उच्च चारित्रिक प्रेरणाए प्रदान कर सकते है,उनसे हमको,नयी पीढ़ी को एकदम दूर कर दिया गया है,

    कुँवर जी,

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रतुल जी इस प्रस्तुति के लिए आभार!!
    सुश्री वन्दना भारतीय का इस लेख के लिए आभार!!

    वस्तुतः पूरी दुनिया ही ग्लेमरस मनोरंजन उद्योग बनने को आतुर है। चका चौध भरे विज्ञापित प्रसार का हाल यह है कि संतोषी जीवन हाशिए पर चला गया है और ग्लेमर नें मुख्य भाग पर कब्जा कर लिया है। मनोरंजन रसिया मनमौजी और मनचले हुंकार भरते है कि रोक सकते हो तो रोक लो, दुनिया ऐसे ही चलेगी। चलो पुनः आदिम प्रवृति की ओर जब न कपडा था न कोई रिश्ता था न सज्जन सुधीजन बने रहने का दबाव। आजके युग में नैतिकता की अपनी अपनी परिभाषा चलेगी। चरित्र की बलिहारी फैलाने वाले तुम होते ही कौन हो? तुम तो देह से डरने वाले निर्बल हो चरित्र यदि इतना ही प्यारा है तो खुद आत्मसंयम में रहो, इस उछ्रंखलता को स्वतंत्रता शब्द से भी नहीं पुकार सकते तुम। पतन के सौदागर अब शक्तिशाली है, उन्हें रोमांच के मोहांधों का उन्हें विशाल समर्थन है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपनी इस सुन्दर रचना की चर्चा मंगलवार ८/५/१२/ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर देखिये आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. हूँ ...ज्वलंत समस्या... प्रसन्नता की बात यह कि दर्द के ढेर से ही रुदन सुन रहा हूँ वरना आलम तो यह है कि लोग दर्द और ख़ुशी का भेद भूल गये हैं। पूँजीवाद के ज़िन्न ने वह भी बिकाऊ बना दिया जो कभी "माल" की परिभाषा में भी नहीं था। देह तो बिकी ही..भावनायें भी बिकाऊ हो गयी हैं..."माल" के दायरे से छूटा क्या? ...कुछ भी तो नहीं। दोष केवल ज़िन्न का ही नहीं है...ज़िन्न यूँ ही नहीं आ जाता...सिद्ध करना पड़ता है उसे। किसने सिद्ध किया है उसे? भावनाओं ...संवेदनाओं ....पीड़ा...और आनन्द के बाज़ार सजाये किसने?..और ख़रीदार कौन है इनका?
    अब मैं एक नॉन सेक्यूलर बात कहने जा रहा हूँ ...क्योंकि इन प्रश्नों के सही ज़वाब वहीं है। ...और वह यह कि इन सबके मूल में है अधर्म। धर्म को राजनीति से...धर्म को शिक्षा से ...धर्म को सम्पत्ति से ....धर्म को जीवन से मुक्त कर दिया गया, गोया धर्म अवाँछनीय तत्व हो गया हो...अस्पर्श्य हो गया हो। उसे पूजा पाठ के पाखण्ड में बन्दी बना दिया गया। पूँजी धर्म से नियंत्रित नहीं होना चाह्ती...वह मुक्ति चाहती है ...यही उसका स्वभाव है। किंतु भारतीय संस्कृति ने उस पर धर्म के अंकुश को अनिवार्य माना। जब तक राजसत्ताओं ने इस अंकुश को स्वीकार किया तब तक सत्ता और समाज पर धर्म का अंकुश रहा ...धर्म सर्वोपरि नियंत्रक तत्व रहा। आज वही धर्म ...वही नियंत्रक तत्व बन्दी गृह में पड़ा है। जब तक इस तत्व को बन्दी गृह से मुक्त नहीं कराया जायेगा तब तक बाज़ार में वह सब बिकता रहेगा जिसके बिकने से ईश्वर भी दुःखी है।
    वन्दना जी! यह जो पुरुष है न! इसने नारी को नारीमुक्ति के मिथ्या स्वप्न दिखा-दिखा कर बुरी तरह अपना गुलाम बना लिया है। नारी को मुक्ति और बन्धन..मुक्ति और मर्यादा.. मुक्ति और शोषण को गहराई से समझना होगा ...इनके जादुई फ़र्क को समझना होगा। नारी को सम्मानित होना है ...प्रतिष्ठित होना है .....शोषण से मुक्त होना है...सच्चे आनन्द का जीवन जीना है तो उसे नग्न होने की नहीं वस्त्र धारण करने की आवश्यकता है।...और ध्यान रखिये, इन भौतिक वस्त्रों के अतिरिक्त एक वस्त्र और भी है ...उसका नाम है "धर्म"। इस नॉन सेक्यूलर सत्य को स्वीकार करना ही होगा अन्यथा हम पशु की श्रेणी से भी बदतर होने जा रहे हैं।
    लेखिका को बहुत-बहुत साधुवाद! प्रतुल जी को भी साधुवाद ..इतने ज्वलंत विषय को इस मंच पर प्रस्तुत करने के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. भाई जी,
      गजब का निष्कर्ष, पर मोहांधो को कभी समझ न आएगा।
      "भावनाओं ...संवेदनाओं ....पीड़ा...और आनन्द के बाज़ार सजाये किसने?..और ख़रीदार कौन है इनका?"
      सटीक प्रश्न है यह आपका…………
      स्वतंत्रता के छद्म शब्द के पिछे रहकर स्वछंदता के हिमायती वैयतिक पतन के विज्ञापन होर्डिंग बन खडे है। दुराचरण का प्रसार हो तो कईं तरह के व्यापार खुलते है यही बाज़ारवाद का प्रलोभन है। स्वेच्छाचार समर्थक इसी बाजारू प्रवृति के आधुनिक दलाल है।
      "यह जो पुरुष है न! इसने नारी को नारीमुक्ति के मिथ्या स्वप्न दिखा-दिखा कर बुरी तरह अपना गुलाम बना लिया है। नारी को मुक्ति और बन्धन..मुक्ति और मर्यादा.. मुक्ति और शोषण को गहराई से समझना होगा ...इनके जादुई फ़र्क को समझना होगा।"
      यही सच्चाई है, क्रूर सच्चाई!! जब तक नारी स्वयं पुरूष प्रवर्तित 'नारीमुक्ति' की मंशा न समझेगी, मुक्ति के दलाल सफल होते रहेंगे।
      आपका नॉन सेक्यूलर दृष्टिकोण सर्वाधिक निंदित की गई सच्चाई है। मानव सुख संतोष का सबसे बडा दुर्भाग्य भी।

      हटाएं
    2. भाई जी! इस टिप्पणी के माध्यम से जो सन्देश आपने ग्रहण किया है काश! वही सन्देश नारियाँ भी ग्रहण कर सकें तो इस पुरुष प्रवर्तित "नारीमुक्ति" से मुक्ति ही मिल जाय उन्हें।

      हटाएं
  6. समसामयिक ,सार्थक विवेचन ..... यह दुखद पर यही सत्य है .... कटु सत्य

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...