शुक्रवार, 18 मई 2012

श्रद्धा का मूल्यांकन

आज मैं इस लेख का पूरा श्रेय अभियांत्रिकी विज्ञान से जुड़ीं शिल्पा जी को दे रहा हूँ क्योंकि इस लेख की प्रेरणास्रोत वे ही हैं। उनका एक प्रश्न है ...

प्रश्न बड़ा ही सुन्दर है - क्या प्रेम, भक्ति और श्रद्धा का मूल्यांकन किया जाना चाहिये ?

इसके प्रतिप्रश्न में एक प्रश्न यह भी उठता हैकि इनका मूल्यांकन क्यों नहीं किया जाना चाहिये?

चलिये, हम प्रेम से ही प्रारम्भ करते हैं। प्रेम करने वाले के हृदय में यदि अपने प्रेमी से प्रतिदान पाने की चाह है तो यह प्रेम "प्रेम" रहा ही कहाँ ...व्यापार की श्रेणी में आ गया वह तो। हीर-राँझा, लैला-मजनू वाला प्रेम नहीं हुआ वह। 
व्यापार का मुख्य घटक है लाभ-हानि जोकि आदान-प्रदान के एक निर्धारित संतुलन पर निर्भर करता है। इस आदान-प्रदान वाले प्रेम में जब प्रतिदान नहीं मिलता तो हम अपने प्रेमी को गम्भीर क्षति पहुँचाने का भरपूर प्रयास करते हैं। ऐसी घटनायें अनोखी नहीं रह गयीं अब।  

प्रेम तो एक ऐसी दीवानगी भरी स्थिति है जिसमें क्रोध नहीं होता ...तिरस्कार नहीं होता। किंतु हमारे आसपास यह हो रहा है, इसलिये प्रेम के इस स्वरूप की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसका मूल्यांकन करना पड़ेगा।

प्रेम करने वाला यदि देता ही जाय...देता ही जाय ...तो ही प्रेम की सार्थकता है। प्रेम की यही दीवानगी प्रेम करने वाले को वैचारिक शीर्ष तक पहुँचा पाती है ......अन्यथा प्रेम कुछ समय बाद बिखरने लगता है। इसलिये प्रेम का मूल्यांकन उसकी पवित्रता और उत्कृष्टता के आधार पर किया ही जाना चाहिये।

हम देशप्रेम की बातें करते तो हैं पर उसके लिये अपने निजी हितों का लेश भी त्याग करने के लिये तैयार नहीं हैं। यह कैसा देशप्रेम हुआ?

हम प्रेम तो करते हैं पर जीव मात्र से नहीं कर पाते ...एकांगी प्रेम को लेकर चलते हैं।

हमारा प्रेम आपेक्षिक हो गया है ...एकांगी हो गया है इसलिये हम अपनी पत्नी, बच्चों और सम्पत्ति से ही प्रेम कर पाते हैं ...प्रेम इससे आगे बढ़ ही नहीं पाता।

प्रेम आगे नहीं बढ़ पाता इसलिये हमें दूसरों को धोखा देने में पीड़ा नहीं होती। कपट में पीड़ा नहीं होती।

मैं पूछता हूँ, यह कैसा प्रेम है जो हमें कुन्दन नहीं बना पाता? ऐसा कुन्दन जो हर किसी के लिये सदैव कुन्दन ही हो। जो हर... जगह हर स्थिति में अपनी आभा बिखेरता रहे।  

शुद्ध अंतःकरण की पवित्रभावना की समर्पण प्रक्रिया का नाम है भक्ति। इस प्रक्रिया का एक अपरिहार्य तत्व है श्रद्धा।

मैने  पवित्रभावना की बात कही, इस पर विचार करना होगा। क्या है यह पवित्रभावना?

यह है मानव मन की वह सकारात्मक ऊर्जा जो अभाव में से प्रकट होती है...और निःशर्त होती है।

अभाव ही जब विराट होता है तब भाव हो जाता है। व्यक्तिगत स्तर पर यह परम तत्व की स्वीकार्यता है बिना किसी तर्क के।
भावना में पवित्रता आवश्यक है। भावना पावित्र है तो भक्ति है ....भक्ति है तो भाव का प्रकटीकरण है।

यह प्रकटीकरण चमत्कार है ..किंतु लौकिक स्तर पर नहीं ...आध्यात्मिक स्तर पर ...।

कई बार हम प्रवचन से प्रभावित होकर या किसी लौकिक पीड़ा से मुक्ति पाने के लिये भक्ति करना तो चाहते हैं पर हो नहीं पाती ...यह इतना सरल नहीं है। दिखता है ...पर है नहीं। इसलिये नहीं है क्योंकि भक्ति शुद्धज्ञान की अगली प्रक्रिया है। शुद्धज्ञान के लिये तप करना पड़ता है.... चाहे इस जन्म में चाहे पिछले जन्म में। यदि पूर्व जन्म में हम शुद्धज्ञान के लिये तप कर चुके हैं तो इस जन्म में भक्ति सरल हो जाती है।   

श्रद्धा हमें अभेद तक ले जाती है, ऐसी जगह ले जाती है जहाँ कोई द्वैत नहीं है। सम्पूर्ण चराचर जगत एक ही शक्ति का रूपांतरण लगने लगता है।

'श्रद्धा' भक्त को अभेद तक ले जाती है ...किंतु लोक व्यवहार में क्या स्वरूप है इसका ? अभेद तक नहीं पहुँच रहे हैं हम। भेद में पड़े हुये हैं.....

ईश्वर के प्रति श्रद्धा तो बहुत है .....उसे स्मरण भी करते हैं पर ऑफ़िस पहुँचते ही भूल जाते हैं सब। तब हम हर गलत काम करने लगते हैं । तब भूल जाते हैंकि जिससे रिश्वत ले रहे हैं हम ...वह भी अभेद है। यह कैसी श्रद्धा है?

किसी आर्थिक अपराध में बन्दी होते ही परिवार के लोग ईश्वर की भक्ति में डूबने लगते हैं....मन्नतें मानी जाने लगती हैं। एक शर्त रख दी जाती है ईश्वर के सामने कि यदि वे जेल से छूट गये तो मन्दिर में 'ये' या 'वो' चढ़ावा चढ़ा देंगे। यह श्रद्धा है या निराकर को रिश्वत देने का दुस्साहस?

कितने लोग हैं भारत में जो नास्तिक हैं? ...कदाचित हर कोई स्वयं को आस्तिक ही कहलाना चाहेगा।  और कितने लोग हैं ऐसे जो लोककल्याण के लिये जी पाते हैं? हम मन्दिर भी जाते हैं ...श्रद्धा से नमन करते हैं अपने आराध्य के चरणों में और ढेरों गलत काम भी करते हैं। इतने गलत काम करते हैं कि दुनिया में कुख्यात हो गये। यह कैसी श्रद्धा है?

हम श्रद्धापूर्वक शपथ लेकर सदन में बैठते हैं और किसी घोटाले में कुछ ही दिन बाद बन्दी बना लिये जाते हैं। ऐसी श्रद्धा का क्या अर्थ है ...यह पूरा देश जानना चाहता है।

यह देश यह भी जानना चाहता हैकि मन्दिर में अलग-अलग धनराशि देने वालों के लिये गर्भगृह तक जाने के अलग-अलग रास्ते क्यों हैं ?

यह देश ईश्वरभक्तों और श्रद्धालुओं का देश है और हम जानना चाहते हैं कि वे कौन लोग हैं जो भ्रूण हत्यायें करते हैं ?

कन्या को देवी का स्वरूप मानने वाले लोगों के देश में स्त्री के साथ बलात्कार करने वाले कौन लोग हैं ? सामने अपराध होता हुआ देखकर भी गवाही देने से कतराने वाले लोग कौन हैं ? क्या ये सब नास्तिक हैं? क्या इनके मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं है? यदि इनमें श्रद्धा नहीं है तो श्रद्धालु कहाँ हैं ...किस कन्दरा में छिपे हुये हैं ?

मेरा सीधा सा प्रश्न है कि घोटाले करते समय, रिश्वत लेते समय, दूध में पानी मिलाते समय, बलात्कार करते समय, भ्रूण हत्या करते समय हमारी श्रद्धा कहाँ होती है? क्या इस श्रद्धा का कोई मूल्यांकन नहीं होना चाहिये ?

हमने मूल्यांकन करना छोड़ दिया, श्रद्धा को लोकाचार से अलग कर दिया...जीवन से शुचिता को अलग कर दिया...अपने पाप धोते रहे...धोते रहे ..इतने धोये कि गंगा को अपवित्र कर दिया। पाप हम अभी भी धो ही रहे हैं ....क्योंकि पाप करना बन्द नहीं किया हमने।

यह श्रद्धा है कैसी जो हमारे आचरण में दृष्टिगोचर नहीं होती कहीं ?

जो निराकार, निर्गुण, अनादि, अनंत और अखण्ड है उसे साकार, सगुण, जन्म-मृत्यु वाला और खण्डित देखने लगे हैं हम ....अपनी स्थूल आँखों से देखने लगे हैं। उसे चलते-फिरते, हँसते-रोते, युद्ध करते देखते हैं हम। और उससे कुछ चमत्कार की आशा करने लगे हैं ...बिना कोई कर्म किये "कृपा" चाहने लगे हैं हम। यह कैसी श्रद्धा है जिसने हमें भिखारी बना दिया है?  

हमारी आँखों के सामने से रोज़ न जाने कितने दुखी-पीड़ित आते-जाते रहते हैं हमारी दृष्टि उन्हें क्यों नहीं देख पाती? क्यों हमारी इतनी श्रद्धा के बाद भी धर्म की हानि होती रहती है और धर्म संस्थापनार्थाय ईश्वर को अवतार लेने के लिये विवश होना पड़ता है?

हम नटराज को नृत्य करते देखते हैं ...डॉक्टर फ़्र्ट्ज़ ऑफ़ काप्रा नटराज की उन्हीं मुद्राओं में ब्राउनियन मूवमेंट देखते हैं। यह दृष्टि हमारे पास क्यों नहीं है ? हम जीवन को केवल चमत्कारों से क्यों भर देना चाहते हैं ?

यह सब इसलिये है क्योंकि हमने अपनी श्रद्धा का मूल्यांकन नहीं किया...करना चाहते भी नहीं। ऐसी मूल्यांकन रहित श्रद्धा ने ही हमें अकर्मण्य और भ्रष्ट बना दिया है।

एक सत्य घटना बता रहा हूँ - कुछ वर्ष पूर्व यहाँ (बस्तर में) एक बाबा आया था ...एक सिद्ध पुरुष के रूप में शीघ्र ही उसने ख्याति अर्जित कर ली। वह हर प्रकार के रोगों की चिकित्सा लात मारकर करता था...और इसके बदले में किसी से कुछ लेता नहीं था। केवल एक नारियल और अगरबत्ती चढ़ानी पड़ती थी। लोगों में उसके प्रति श्रद्धा उमड़ पड़ी। कई रोगी वहाँ गये और तुरंत लाभांवित होकर आ गये। एक इंजीनियर साहब कटिशूल से पीड़ित थे और मेरी चिकित्सा में थे...पूछा मुझसे कि वे भी लाभांवित होना चाहते हैं ..चले जायें क्या? मैने कहा कि यह निर्णय उन्हें ही करना है, मैं तो केवल इतना ही बता सकता हूँ कि लात मारकर चिकित्सा करने की कोई बात मेरी समझ से परे है। वे गये ...लौटकर आकर बताया कि वे ठीक हो गये हैं और अब उन्हें कोई औषधि लेने की आवश्यकता नहीं है। सप्ताह भर बाद वे फिर आये, बोले कि पीड़ा फिर शुरू हो गयी है ...एक बार फिर जाना पड़ेगा बाबा के पास ...शायद ढ़ंग से लात लग नहीं पायी होगी। वे पुनः गये ....किंतु शायद लात मारने में फिर कुछ गड़बड़ हो गयी होगी। बाद में उन्होंने फिर से औषधि लेना शुरू किया।

कुछ समय तक चमत्कार दिखाने के बाद बाबा जी चले गये। बाद में पता चला कि बाबा के पास प्रतिदिन सुबह से रात तक सैकड़ों नारियल चढ़ावे में आ जाते थे। कुछ नारियल प्रसाद में बट जाने के बाद शेष अगले दिन उन्हीं दूकानदारों के पास फिर पहुँच जाते थे। बदले में बाबा को मिलती थी दूकानदारों से प्रतिदिन एक मोटी रकम। यह कैसी श्रद्धा है?  क्या इस श्रद्धा पर चर्चा नहीं होनी चाहिये?

आश्चर्य तो यह हैकि इन श्रद्धालुओं में उच्च शिक्षित वर्ग के लोग भी हैं। ....और हम फिर भी श्रद्धा का मूल्यांकन करने के लिये तैयार नहीं हैं क्योंकि हमने उसे भावनाओं और आस्था के आहत हो जाने से जोड़ दिया है। ईश्वर के प्रति हमारी आस्था इतनी नाज़ुक क्यों हैकि वह तर्क की बात आते ही आहत होने लगती है?

आस्था में यदि गहराई है ....ज्ञान का सुदृढ़ आधार है तो वह कभी आहत नहीं हो सकती। ..और जो आहत हो जाती है वह आस्था है ही नहीं पाखण्ड है।   

49 टिप्‍पणियां:

  1. आभार - आपने मुझे लक्षित कर के यह लेख लिखा | :)
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    @ ..और जो आहत हो जाती है वह आस्था है ही नहीं पाखण्ड है।
    १.- आपको दृढ़ विश्वास है इस बात का ? मुझे तो ऐसा नहीं लगता |
    २.असहमत हूँ - पर अधिक विरोध नहीं करूंगी :) आवश्यकता नहीं लगती | यह हमारे अपने निजी मत है - जो अलग हो सकते हैं |
    ३.अधिकतर जो उदाहरण यहाँ दिए गए - श्रद्धा नहीं - श्रद्धा का दिखावामात्र हैं |
    :)
    वैसे - लेख बढ़िया है |
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    1. vaise - paakhand ka arth kya hai - is par bhi ek lekh likhiyega n sir ? aabhaar hoga aapka :)

      shraddha par = geeta ke 17th adhyaay se -

      अर्जुनोवाच
      ये शास्त्र-विधिम् उत्सृत्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
      तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वम् आहो रजस् तमः ॥१॥
      अर्जुन ने कहा
      बहुत से श्रद्धालु शास्त्र मेँ बताए तरीक़े से हट कर यज्ञ और पूजा करते हैँ. कृष्ण, उन की यह निष्ठा, यह आस्था कैसी है? सत्त्व गुण वाली, राजसी या तामसिक?

      श्रीभगवान् उवाच
      त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
      सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥२॥
      श्री भगवान ने कहा
      देहधारियोँ की श्रद्धा का जन्म उन के स्वभाव से होता है. वह सात्त्विक, राजसिक और तामसिक – तीन प्रकार की होती है. सुन.

      सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
      श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥३॥
      भारत, सब की श्रद्धा अपने अपने व्यक्तित्व और अपने अपने स्वभाव के अनुरूप होती है. मनुष्य श्रद्धा का पुतला है. जिस की जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही वह मनुष्य होता है.

      यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्ष-रक्षांसि राजसाः ।
      प्रेतान् भूतगणांश् चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥४॥
      सात्त्विक वृत्ति वाले मनुष्य देवताओँ की पूजा करते हैँ. राजसिक लोग यक्षोँ और राक्षसोँ की पूजा करते हैँ. प्रेतोँ और भूतोँ की पूजा तामसिक जन करते हैँ.

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    2. स्पष्ट हो गया न कि श्रद्धा समान नहीं होती ....भेद हैं उसके, तभी वर्गीकरण किया गया ...मूल्याँकन के बाद ही तो वर्गीकरण हो सका ..सात्विक, राजसिक और तामसिक श्रद्धा का। यह विचारना पड़ता है कि भक्त का स्वभाव कैसा है ..तदनुरूप ही उसकी श्रद्धा होगी ...तदनुरूप ही वह समाज पर भी अपना प्रभाव डालेगा। इसीलिये यह श्रद्धा पॉजिटिव भी हो सकती है और निगेटिव भी ।

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    3. :)
      आदरणीय सर - शायद आप और मैं सच ही दो अलग अलग धरातलों पर हैं | या फिर यह भाषा का फेर है |

      मेरे लिए (ट्रांसलेट से चेक भी किया) मूल्यांकन का अर्थ है - मूल्य / कीमत आंकना , value assessment , assessing the cost of | cost या कीमत या मूल्य का अर्थ है बाज़ार में खरीदने बेचने की लायकियत |

      वर्गीकरण का अर्थ होता है - taxonomy या classification | इसमें किसी भी वर्ग को एक दुसरे से कम या ज्यादा नहीं माना जाता |

      कहीं ऐसा तो नहीं की हम दो अलग अलग बातों के बारे में बात कर रहे हों ? मेरे विचार में तो प्रेम / भक्ति / श्रद्धा की कोई कीमत नहीं लग सकती | खुद इश्वर भी नहीं लगा सकते | एक कहानी है - जिसमे सत्यभामा जी ने कान्हाजी को सोने से तौलने का प्रयास किया था - परन्तु पलड़ा कान्हा जी का ऊपर ही न गया | फिर रुक्मिणी के एक तुलसीदल भर से उठ गया | तो प्रेम का मूल्यांकन ?

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    4. श्रद्धा का कोई मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है परन्तु वह श्रद्धा किस प्रकार की है उससे उसका मूल्यांकन स्वतः ही हो जाता है, आसुरी प्रकति के लोगो के लिए सात्विक श्रद्धा का कोई मोल नहीं है तो सात्विक हृदयी जनों के लिए तामसिक श्रद्धा कोई मोल नहीं रखती.
      मूल्यांकन और वर्गीकरण में परस्पर सम्बन्ध है तभी तो एक शब्द प्रचलित है "मूल्यवर्ग" समान मूल्य की वस्तुएं एक वर्ग में और दूसरे ऊँचे-नीचे वर्ग की वस्तुएं अन्य वर्गों में .

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  2. प्रेम और श्रद्धा का सटीक विश्लेशन.. आभार...

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. अपने स्वार्थ में उतरने के बाद श्रद्धा का लोप हो जाता है।

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  5. झकझोर देने वाला आलेख.... कचोटने वाले प्रश्न.....

    श्रद्धालुओं को आइना दिखाते तर्क....

    आपका यह प्रयास उच्च कोटि का है...

    लगता है जैसे ऋषि दयानंद ने 'पाखंड खंडनी पताका' फहरायी हो.

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  6. बाबा द्वारा लात से चिकित्सा पर कमेन्ट :
    बहुत से श्रद्धालु इसीलिए किञ्चित लाभ के लिये जीवनपर्यंत लात खाने के शौक़ीन रहते हैं.
    — कहते भी हैं कि लातों के भूत 'बातों से नहीं मानते'.

    कोई बात से ही समझ जाता है/मतलब ठीक हो जाता है... और किसी पर कोई भी दवा असर नहीं करती. इसलिये ऐसे लोग लात-चिकित्सा को पसंद करते हैं.

    — दूसरे, जो लोग घरेलु उपचारों पर अधिक भरोसा करते हैं... वे भी लात-चिकित्सा लेते हैं. मैंने बहुत बार बड़े-बड़ों को अपने हाथ-पाँव और पीठ-कमर दबवाते देखा है... जिन घरों में हलके-फुल्के बच्चे होते हैं... वे अपने बुजुर्गों की सेवा अपनी कोमल-कोमल लातों से करते हैं. हमने भी तो काफी की है. :)

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  7. [जबरदस्ती की कल्पना कर रहा हूँ, बताने का मतलब ये नहीं कि कोई इसे सच मान ले ]

    आप सभी ने स्पर्श चिकित्सा के बारे में तो सुना ही होगा. और स्वर-चिकित्सा के बारे में भी. और गंध-चिकित्सा के बारे में भी.

    – 'होम्योपैथी' एक परकार की गंध-आधारित चिकित्सा है.

    – उपदेश, सत्संग आदि स्वर-चिकित्सा हैं. धार्मिक पुस्तकों का पठन-पाठन व श्रवन भी इसी के अंतर्गत आयेगा.

    वैद्य और उपदेशक रोगी का उपचार दवा के साथ-साथ अपने आश्वासन से भी करते हैं.

    – महात्मा, साधु-सन्त, माता-पिता, गुरुजनों का आशीर्वाद .... स्पर्श-चिकित्सा की श्रेणी में आता है.

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  8. .... होती तो 'दर्शन-चिकित्सा' भी है परन्तु वह सर्वमान्य नहीं.
    सन्त तुलसीदास जी ने अपने प्रभु राम-लक्ष्मण-सीता के दर्शन करने के लिये 'चित्रकूट के घाट पर ली थी.
    ..... होती तो 'काव्य-चिकित्सा' भी है लेकिन उसका बोध केवल साहित्य पंडितों को होता है.
    तुलसी ने 'हनुमान बाहुक' लिखकर अपनी भुजा पीड़ा को दूर किया. मयूर कवि ने 'सूर्य स्तुति' करके अपने कुष्ठ रोग का निवारण किया. इस तरह के तमाम उदाहरण हैं.

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  9. थोड़ा मनोविनोद का मन है. इसलिये ये सब कह रहा हूँ... वैसे यह सब विषयांतर नहीं है, श्रृद्धा से जुड़ी चिकित्साएँ हैं. क्योंकि 'श्रृद्धा' मन की स्थिति है... मस्तिष्क मन से ही काफी नियंत्रित रहता है. और शरीर में जितने भी रासायनिक बदलाव होते रहते हैं.. उनका जुडाव मन से ही है. विस्तार में नहीं जाऊँगा...

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  10. पदाघात चिकित्सा कैसे अपना असर दिखाती है ? आइये जानें :
    [१] एक को दाँत में दर्द था ... हमेशा दर्द से बेचैन रहता... राहत को ..गमपेंट लगाता, जबड़े में लौंग दबाये रखता, पेरासिटामोल निगलता लेकिन रिजल्ट वही, ढाक के तीन पात.
    उसने पदाघात चिकित्सा ली .... सब ठीक हो गया... न दाँत रहा न ही दर्द.

    [२] खुद को अगर बिना बात बहुत गुस्सा आता हो... तब भी पदाघात चिकित्सा बहुत फायदा करती है... आजमाकर देखें... [Note: यह एक घरेलु उपचार है]

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  11. मैं आचार्य जी से जानना चाहता हूँ कि लात-चिकित्सा के पीछे क्या वैसी ही संभावना तो नहीं जो कभी नालंदा के 'बख्तियार खिलजी' की एक आयुर्वेद के विद्वान् (वैद्य) ने की थी ?

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    1. प्रतुल जी! "लात चिकित्सा" की महिमा पर आपके विचार जान कर हर्ष हुआ। शल्य चिकित्सा को मैं विनोद में बढ़ईगीरी कहता हूँ। ऑर्थोपेडिक्स के एकाध मामले में कभी-कभी लातचिकित्सा इसका विकल्प बन सकती है बशर्ते लातचिकित्सक को एनाटॉमी का भी थोड़ा सा अनुभव हो। यूँ, उत्तरप्रदेश में कमर की नस चढ़ जाने( जिसे लोग चिक चली जाना भी कहते हैं)की स्थिति में इस चिकित्सा का भूरिशः प्रयोग होता है..किंतु शर्त वहाँ भी एक है....कि लात मारने वाला उल्टा पैदा हुआ हो। गाँव के लोग ऐसे "उल्टॆ पैदा हुये" लोगों का बाकायदा रेकॉर्ड रखते हैं। अपने गाँव में न होने पर कभी-कभी पीड़ित को पड़ोसीगाँव में भी जाना पड़ता है। लात चिकित्सा का सर्व व्याधियों में प्रयोग नहीं किया जा सकता। ये जो लातबाबा आये थे वे सभी व्याधियों का लात मारकर इलाज करते थे। मसलन- वेस्ट पेन, अर्थ्राइटिस, ऑस्टियोअर्थ्राइटिस,फीवर, इंसोनिया, इंफर्टिलिटी, एपीस्टैक्सिस, एपीलेप्सी.....सम्पूर्ण व्याधियाँ। शल्य चिकित्सा में कई बार "जुगाड़" का प्रयोग भी बड़ा लाभकारी होता है। आज सुबह हमारे ही हॉस्पिटल के नेत्र चिकित्सक से चर्चा हो रही थी. उन्होंने बताया कि किसी रोगी की आँख का लेंस कैल्सीफ़ाइड होकर कॉर्निया से चिपक गया था, उसे निकालने से आइरिस भी खिच रहा था। लेंस को रिमूव करना सम्भव नहीं लग रहा था तो उन्होंने "जुगाड़" लगायी और लेंस को बड़े परिश्रम से खरोच-खरोच कर एक छिद्र बनाया। फिर उसी छिद्र में कृत्रिम लेंस फ़िट कर दिया।
      ऐसी जुगाड़ों का प्रयोग ऑर्थोपेडिक सर्जन को अधिक करना पड़ता है। असली बढ़ईगीरी तो वही है।

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    2. आपकी बातों से मैं सत्य के निकट आ रहा हूँ.
      मुझे अब लगने लगा है कि जरूर लतेडू बाबा 'उलटे पैदा हुए होंगे'
      और अपनी बेरोजगारी से दुखी होकर उन्होंने अपनी लोकल लतखोरी को बिजनिस बना लिया होगा.

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  12. साथी पाठकों से प्रश्न :

    बतायें रामकथा में किसने कब किसे पदाघात दिया और उसके बाद उसने ठीक राह चुनी?

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  13. आजकल ज़ी टीवी पर एक सीरियल छोटी बहू इसी सम्स्या का उत्तर दे रहा है।

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    1. मनोज जी,
      महिलाओं की रुचियों के हिसाब से ही हम भी टीवी देखते हैं... आजकल 'छोटी बहू' को 'छोटे बच्चों के डांस शो' जैसे कार्यक्रमों ने धुंधला करा हुआ है. आपने ध्यान दिलाया है तो जरूर इस तरफ ध्यान दूँगा.

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  14. प्रतुल भाई गज़ब हो गया! हम लोग लातों के चक्कर में पड़ॆ हैं और उधर भारत भारती वैभवम पर पहला शतक लग गया ..किसी को होश ही नहीं है। जब कोई फुनियाता है तभी हम जान पाते हैं। विलम्ब से ही सही, हम इस प्रथम शतक के लिये भारत भारती वैभवम के व्यवस्थापक मण्डल को साधुवाद ज्ञापित करते हैं।

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    1. आचार्य जी,
      मुझे आपके पोस्ट लिखते समय ही ज्ञात था कि शतक लगा है, लेकिन मैंने अब अंकों में शून्य लगने पर मुग्ध होना छोड़ दिया है.

      बच्चों को इस मुग्धता पर अकसर एक कहानी सुनाया करता हूँ, आप भी सुनिए :

      एक आदमी था... जब भी एक साथ एक जैसे अंक लिखे देखता तो बहुत खुश होता. वो पूरे दिन व्यस्त रहता. जब भी घड़ी में 1:11 बजते वो खुश होता. और जब 2:22 बजते तो भी खुश होता. 3:33 बजते तो भी खुश होना नहीं भूलता, 4:44 बजे और 5:55 बजे भी वह बहुत खुश होता, लेकिन उसके बाद वह दुखी रहने लगा, समय ही नहीं कटता था... फिर उसने आगे भी खुश होने का तोड़ निकाला .... वह 7:06 बजे भी खुश होने लगा. बताओं बच्चों वो आदमी 7 बजकर 6 मिनट पर क्यों खुश होता? बहुत हार-थककर बच्चे पूछते तो मैं उनसे कहता "वो आदमी 7 बजकर 6 मिनट को 6:66 समझता और खुश हो जाता. इसलिये बच्चों, दुखी और परेशान रहने की वजह तो तमाम हैं लेकिन खुश होने के लिये वजहों को खुद निश्चित करना होता है.

      जो हर समय प्रसन्न रहते हैं वे कोई-न-कोई कारण प्रसन्नता का बनाए रखते हैं.

      ... अब बताइये कैसी लगी कहानी?

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    2. श्रीमान मेरी गिनती में अभी दो मोती कम आ रहे है .......... मुझे ९८ ही दिखाई दिए, पर आशा है की शतक वीर आप ही बनेंगे और भारत के प्राचीन सत्य वैभव को अपनी लेखनी से इसी तरह उद्घाटित करते रहेंगे . भारत-भारती मंडल आपका आभारी है .

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    3. भारत भारती के पुजारियों के हाथ में थी तो सौ ही मानकों की माला लेकिन उनमें दो मनके अप्रकाशित 'ड्राफ्ट' में यूँ ही पड़े थे... वे पंडित वत्स जी के थे... जो मैंने अपने मैल में सुरक्षित कर लिये हैं... यदि वे ढूँढते हुए आयें तो उन्हें खबर कर दीजिएगा. पोस्ट संख्या की शुद्धता बनाए रखने के लिये ही यह छंटनी की है. १०८ मनकों की माला पर भी हम इस तरह की प्रसन्नता दर्शाएँगे.

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    4. अमित जी,
      मुझे १०० दृष्टिगोचर हुई थी, हां शायद २ ड्राफ्ट में रही हो जो अब नहीं है। :)

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    5. 'मैल' को मेल साझा जाये....
      बहरहाल वे दोनों अप्रकाशित पोस्ट पं. वत्स जी के हाथ का 'मैल' ही हैं.... वे तो जब भी मनन करेंगे कुछ नये रत्न ही निकलेंगे.

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    6. सुज्ञ जी,

      ड्राफ्ट से हटाने का अपराध मुझसे हुआ है...संख्या में सुधार करना था. इस बहाने दो अन्य श्रेष्ठ पोस्टों का लोभ भी हो रहा है. मुझे विश्वास है कि आचार्य कौशलेन्द्र जी इस शतक माला में दो मनके अवश्य पिरोयेंगे.

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  15. भारत भारती वैभवं के सभी प्रबुद्ध लेखको को बधाई!!
    इस श्रद्धा युक्त पोस्ट के साथ प्रविष्ठियों ने शतक पुरा किया।
    पाठकों का भी अनंत आभार!!

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    1. आपको भी बधाई सुज्ञ जी,
      प्रसन्नता के कारण प्रतिदिन बने रहें..... यही कामना है.

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    2. अच्छी विचारधारा को आजकल टिकने ही कौन देता है, निश्चित ही प्रसन्नता का कारण है यह विचारधारा शतजीवी हुई, प्रेरकबल बल मिलता है कि यह सहस्त्रजीवी ही नहीं लक्षजीवी होगी। :)

      हटाएं
  16. .

    प्रविष्ठियों के शतक की सबको बधाइयां !



    मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  17. भारत भारती वैभवम् का प्रथम शतक पूर्ण होने पर सभी पाठकों, समर्थकों, लेखकों, व्यवस्थापकों व संस्थापक को हार्दिक बधाई! यह ब्लॉग निरंतर उन्नति करे और सद्विचारों का विस्तार हो!

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  18. सबसे पहले तो भारत भारती वैभवं पर सभी पाठकों, समर्थकों, लेखकों, व्यवस्थापकों व संस्थापक जी को शतक पूरा करने पर ढेर सारी बधाईयाँ !!!!!!


    जारी .....

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  19. मेरे लिए तो ब्लॉग जगत में दो ही ग्रुप ब्लॉग हैं जहां आकर सही मायनों में सुकून मिलता है | एक "भारत भारती वैभवं" है और एक "निरामिष" ..... पिछले कुछ महीनो में चर्चाओं के दौरान (निरामष पर) शिल्पा जी का अद्भुद योगदान सराहनीय है ठीक इसी तरह जिस तरह के अदभुद लेख कौशलेन्द्र जी प्रस्तुत कर रहे हैं दोनों ब्लोग्स में एक नयी उर्जा का संचार हुआ है | मैं तो इन दोनों ही लेखकों का प्रशंसक बन चुका हूँ , इसीलिए दोनों को विशेष धन्यवाद देना चाहता हूँ |

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    1. गौरव भैया जी और जहाँ जहाँ आपको सुकून दिखाई दे अपने इस भईये को भी साथ ले चलियेगा, आजकल तो आप वैसे ही जयपुर को धन्य कर रहे है :)

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  20. आभार आपका :) कभी मेरे निजी ब्लॉग "रेत के महल" पर भी अवश्य पधारिये | अभी तो मैं "पंचतत्त्व" पर एक काव्य शृंखला लिख रही हूँ वहां | :)

    आदरणीय कौशलेन्द्र जी की भी बहुत आभारी हूँ - जो - अलग अलग मतों के चलते और अनजाने ही सही - इस भारत भारती वैभवं जैसे विशिष्ट ब्लॉग की सौवीं पोस्ट में मेरा नाम जुड़ गया | :) वह भी "श्रद्धा" जैसे विषय पर लेख के साथ |

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  21. गुप्त बन्धु ! बेहद साधारण पाठक के रूप में आप विशिष्ट हैं मेरे लिये, कारण है -
    "सर्वदा सर्व भावानां सामान्यं वृद्धि कारणम् । ह्रास हेतुर्विशेषश्च पृथुकं पृथु दर्शिनः॥
    हमारा प्रयास है कि "लीक से हटकर" .... "लीक की बात" करके लोगों को अपने प्राचीन अतीत के गौरव के समीप लाया जा सके ...फिर वे स्वयं निर्णय करें कि अपना आचरण कैसा बनाना है उन्हें । कबीर ने भी लीक से हटकर लीक की बात की थी।

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  22. यहाँ भी, और बस्तर के झरने पर भी मेरी ३-४ टिप्पणियां स्पाम में हैं ( या delete की गयी हैं ? ) | यदि यह अनजाने में हो रहा हो, तो निकाल लीजियेगा | जानते हुए हुआ हो - तो - आपका ब्लॉग - आपका निर्णय |

    आभार

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    1. शिल्पा जी,

      इस ब्लॉग के प्रबंधक टिप्पणी नष्ट नहीं करते और न ही बिना विशेष कारण के संशोदित ही किया करते हैं. हाँ मुझे थोड़ा तकनीकी ज्ञान कम है, फिर भी आप ने और अमित जी ने मेरी समय-समय पर सहायता की ही है.

      ब्लॉग हम सभी का है.. हम एक परिकार के सदस्य हैं.. मत-विभिन्नता होने का अर्थ यह कतई नहीं कि हम पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो अनादर और उपेक्षा पर उतर आयें. किसी को चर्चा से दुःख हो और आस्था आहत हो ऎसी मंशा न तो ब्लॉग-लेखकों की है और न ही ब्लॉग-प्रबंधक की. इसलिये परस्पर संवादों में बड़ा विलम्ब आ जाता है.

      हटाएं
    2. अभी तो कोई टिपण्णी स्पाम में नहीं दिखाई दे रही है..................परन्तु फिर भी किसी भी टिपण्णी कर्ता की टिपण्णी प्रकाशित नहीं हो रही है तो अविलम्ब 28amitsharma@gmail.com पर मेल द्वारा अथवा +919928024414 पर SMS द्वारा इस बारे में सूचना दे सकतें है .

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    3. शिल्पा जी! आपकी कोई भी टिप्पणी बस्तर की अभिव्यक्ति पर स्पैम में मुझे नहीं मिली। एक दिन एक मिली थी उसे मैने प्रकाशित कर दिया था। यदि आपके पास सुरक्षित हों तो कृपया पुनः प्रेषित करने का कष्ट कीजियेगा हम प्रकाशित कर देंगे। इसे लेकर मन में क्षुब्ध मत होइये। हम आपके मत का ..विचारों का सम्मान करते हैं ....मैंने पहले भी कहा है कि हमारी परम्परा तो चार्वाक को भी सुनने और सम्मान देते रहने की है। आप प्रसन्न मन से अपने विचार देती रहें।
      जिस प्रकार लोकतंत्र को सशक्त करने के लिये विपक्ष का होना आवश्यक है उसी तरह वैचारिक विमर्ष के लिये भिन्न-भिन्न विचारों का सामने आना आवश्यक है। इस आलेख की प्रेरणास्रोत का श्रेय इसीलिये आपके खाते में गया है। तलवार के ऊपर जब शान चढ़ाई जाती है तो उसका कुछ अंश क्षरित होता है पर उसे धारयुक्त करने के लिये यह प्रक्रिया अनिवार्य है।
      तभी तो कहा गया है " निन्दक(आलोचक या विरोधी) नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय" ....
      हम आपके प्रश्नों के यथा संभव उत्तर देने का प्रयास करते रहेंगे।

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  23. इस पोस्ट का महत्व इसलिये भी है कि 'गौरव जी' का बहुत समय बाद आगमन हुआ और शिल्पा जी पोस्ट की प्रेरक बन सकीं. यह मेरे लिये प्रसन्नता की बात है.

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    1. बिलकुल सही कहा आपने !

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    2. प्रतुल भाई! आपने "एक बेहद साधारण पाठक" के गोपन रहस्य को प्रकट कर दिया। मैने तो उन्हें "गुप्त जी" मान लिया था। यूँ, अनुमान मेरा भी वही था। "एक बेहद साधारण पाठक" उर्फ़ "गुप्त जी" उर्फ़ "गौरव जी" एक सुधी पाठक हैं। उन्हें साधुवाद!

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  24. बहुत उत्तम चिंतन प्रकट हुआ है , आचार्य कौशलेन्द्र जी की लेखनी से . और हम पाठक धन्य है ऐसे विचारवान गुरुजनों को अपने बीच शोभायमान देखकर . शिल्पा जी की जिज्ञासु प्रवृत्ति मन में आह्लाद उत्पन्न करती है , इससे उनके स्वाध्याय का पता चलता है , और मन में उनके समान जिज्ञासु वृत्ति धारण कर नित नए धरातलो पर पहुँचने की उत्कंठा बलवती होती है .
    साधुवाद की पात्र हैं शिल्पाजी जिनके मनन से यह चिंतन परक विचार प्रकाशित हुए .


    श्रद्धा अनमोल है परन्तु उसका मूल्यांकन उसके शास्त्र सम्मत वर्गीकरण से सरलता से लगाया जा सकता है.
    "श्रधा " इस समस्त सृष्ठी की सञ्चालनकारी परम शक्ति है जो विश्वास के बल पर स्थित है . कहने का भाव की दोनों परस्पर एक ही है , द्वैत भासते हुए भी अद्वैत है , परस्पर भिन्नभिन्न का समबन्ध है वह भी थोपा हुआ नहीं होकर स्वाभाविक रूप में प्रकाशित भिन्नाभिन्न सम्बन्ध है . जिस प्रकार स्वर्ण के बने आभूषण स्वर्ण होते हुए भी अपने आकृति के अनुसार अलग अलग नाम से पुकारे जाते है , जैसे नाक का आभूषण नथ, कान का कुंडल, गले का हार , परन्तु है वह सोना ही , इसी प्रकार सब आभूषण सोना होते हुए भी सोना ना कहला कर अलग अलग नाम से जाने जायेंगे इसलिए भिन्न हुए , परन्तु एक ही पदार्थ के अंश होने से सोने से भिन्न भी नहीं है . स्वाभाविक रूप से सोना भी है और भिन्न नाम रूप धारी आभूषण भी हैं .
    यही रहस्य विश्वास और श्रद्धा के सम्बन्ध में भी है विश्वास को शंकर और श्रद्धा को भवानी कहकर तुलसी बाबा ने वन्दना की है , 'भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रुपिणौ। याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वांतस्थमशिवरम्।'
    यह एक चौपाई ही श्रद्धा और विश्वास के सम्बन्ध में सम्पूर्ण है, इसी का आश्रय लेकर जिज्ञासु मन इनकी अभेदता और भेदता का ज्ञान प्राप्त कर सकता है . विश्वास के बिना श्रद्धा का दर्शन असम्भाव्य है और श्रद्धा के अभाव में विश्वास का कोई महत्व नहीं है .
    शिव साक्षात परमब्रह्म है जो अजन्मा, अटल, अविचलित, अविकारी है, और भवानी उनकी शक्ति है, जो शक्तिमान शिव में निवास करती है, और अपने विभिन्न रूपों में प्रकट होती है जैसे सती के रूप में दक्ष के यहाँ और पार्वती के रूप में हिमालय के यहाँ उनका जन्म हुआ .

    जिस तरह शास्त्रों में शिव को अजन्मा बताया गया है उसी प्रकार विश्वास भी स्वतः प्रकट होता है, विश्वास स्वयं पार्दुभूत है, जबकि श्रद्धा को प्रकट करना पड़ता है.
    जैसे एक छोटे बालक को अलग से सिखाना नहीं पड़ता उसके अवचेतन में सहज और स्वतः ही अपनी माता के प्रति विश्वास रहता है उसकी गोद में जाकर उसे तृप्ति मिलती है, उसे अपनी माता, अपने पिता व अपने परिवार के बारे में स्वतःस्फूर्त विश्वास रहता है की यह मेरे कौटोम्बिक जन है और मेरा रक्षण करते है. थोड़े से संकट का अनुभव करते ही अपने परिजनों की गोद में आश्रय लेता है.
    इस तरह विश्वास आत्मा का सहज धर्म है, परन्तु श्रद्धा को प्रकट करना पड़ता है, बालक को अपने माता-पिता के बारे में आजीवन यह विश्वास रहेगा की यह मेरे माता पिता है . परन्तु उनके प्रति श्रद्धा अनुभव से प्रकट होगी और यह आवश्यक नहीं की वह आजीवन एकरूप ही रहेगी, कम ज्यादा भी होती रहेगी . अर्थात श्रद्धा घटती बढती रहती है . यह श्रद्धा चूँकि परम शक्ति का रूप है इसलिए उसीके आधीन तीनो प्रकृतियों के आलंबन से घटती -बढती और तदनुरूप प्रकट होती है .

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    1. यह सारी सृष्ठी इस श्रद्धा का चमत्कार ही है. श्रद्धा को अत्यंत गरीमा प्रदान करते हुए समस्त शास्त्रों ने इसे मानव में उपस्थित पराशक्ति के रूप में अभिहित किया है और इसे सृष्ठी का केंद्र घोषित किया है. मानव का चरम लक्ष्य जिस आत्मोपलब्धि को बताया है उसकी प्राप्ति भी बिना श्रद्धा के असंभव है.
      ना केवल सात्विक आध्यात्मिक प्रगति ही अपितु दानवी प्रगति भी इसी श्रद्धा के कारण ही संभव है . जिस प्रकार सृष्ठी मात्र सात्विक या मात्र तामसिक और राजसिक ही नहीं है उसी प्रकार श्रद्धा भी सात्विक व तामसिक आदि रूपों में दिखाई देती है.

      इस वर्गीकरण से ही श्रद्धा का मूल्यांकन स्वतः हो जाता है, परमात्मा प्राप्ति मार्ग के पथिक के लिए तो सात्विक श्रद्धा का ही मोल है, बाकी प्रकार की श्रद्धा का तो कोई मूल्य भक्त की, ज्ञानी की दृष्ठी में है ही नहीं. इसलिए श्रद्धा का मूल्यांकन तो साधक को करना की होता है की मेरी श्रद्धा का कोई मोल भी या नहीं, कहीं जिसे मैं बहुमूल्य मणि समझे हूँ कहीं वह सिर्फ कांच का टुकडा ही तो नहीं है. इस प्रकार का मूल्यांकन करने के लिए ही शास्त्रकारों ने श्रद्धा का वर्गीकरण किया है.

      श्रद्धा के दो स्थूल भेदों को सकारात्मक और नकारात्मक श्रद्धा के रूप में हम एक साधारण उधारण से भी समझ सकते है की सामान्य जनमानस में की प्रकार की श्रद्धा का अधिकांशतया प्रचार है .
      शास्त्रों में कहा गया है की घर से निकलते समय भगवन्न नाम का उच्चारण करने से समस्त विघ्न समाप्त हो जाते है और लक्षित कार्य सिद्ध होता है, जबकि लोकमानस में घर से निकलते समय बिल्ली के रास्ता काटने, छींक होने को अपशकुन मानकर थोडा समय टालकर निकला जाता है. अब मान लीजिये की कोई सरल हृदयी भावुक भगवद भक्त यदि लोकाचार वश या समाज से प्राप्त संस्कारों के वश प्रथम सात्विक श्रद्धा के स्थान पर द्वितीय तामसिक श्रद्धा का पालन करता है तो उसकी भक्ति का उसकी श्रद्धा का मूल्यांकन तो करना ही पडेगा.

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    2. सरलीकरण के लिये साधुवाद! अमित जी! वास्तव में श्रृद्धा तो spontanious flow of believes and faith from within है

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  25. आज ‘एक बहन‘ के नाम से हमारे ब्लॉग ‘वेद कुरआन‘ पर किसी ने कमेंट करके इस पोस्ट का लिंक दिया है।
    http://vedquran.blogspot.in/2012/05/blog-post.html

    पोस्ट अच्छी लगी है।
    जब यह लिंक मिला, तब हम दहेज के बारे में ‘हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल‘ पर यह लिख रहे थे।
    इस विषय पर आप भी अपने विचार दें।

    दहेज एक बुरी रस्म है। जिसने इसकी शुरूआत की उसने एक बड़ी बेवक़ूफ़ी की और जिसने भी सबसे पहले दहेज मांगा, उसने लालच की वजह से ही ऐसा किया। आज भी यह रस्म जारी है। एक ऐसी रस्म, जिसने लड़कियों के जीवन का नर्क बना दिया और लड़कों को आत्म सम्मान से ख़ाली एक बिकाऊ माल।
    इनके कारण ही बहुत सी बहुएं जला दी जाती हैं और बहुत से कन्या भ्रूण मां के पेट में ही मार दिए जाते हैं।
    ये केवल दहेज मांगने की ही मुल्ज़िम नहीं हैं बल्कि बहुत हत्याओं में भी प्रत्यक्ष और परोक्ष इनका हाथ होता है।
    20 मई 2012 को आमिर ख़ान के टी. वी. प्रोग्राम ‘सत्यमेव जयते‘ का इश्यू दहेज ही था। उन्होंने दहेज के मुददे को अच्छे ढंग से उठाया। उन्होंने कई अच्छे संदेश दिए।
    अभिनय प्रतिभा का सार्थक इस्तेमाल यही है।
    http://hbfint.blogspot.com/2012/05/blog-post_6480.html

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