बुधवार, 9 मई 2012

स्वामित्व

राजा जनक के विशिष्ट अतिथि गृह में ठहरे हुए रावण को आज तीसरा दिन था। उसे अपने राज्य की चिंता सता रही थी और जनक थे कि लंकेश को समय नहीं दे पा रहे थे। लंकेश को लगा कि जनक उसकी जानबूझ कर उपेक्षा कर रहे हैं, क्योंकि यह पहली बार नहीं था कि लंकेश को इतनी प्रतीक्षा करनी पड़ी हो, पहले भी कई बार ऐसा हो चुका था। रावण के लिए यह अपमानजनक बात थी किन्तु वह हर बार मन मसोस कर रह जाता था। नियोग के वैकल्पिक उपायों और जेनेटिक इंजीनियरिंग पर वह विगत कई वर्षों से शोध कार्य कर रहा था। अपने प्रोजेक्ट पर चर्चा किये बिना वापस लंका जा भी तो नहीं सकता था। मिथिला राज्य में कई ऐसे ऋषि-महर्षि थे जो जेनेटिक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कार्य कर रहे थे, उनसे मिलना रावण के लिये बहुत आवश्यक था।
अंततः रावण की भेंट राजा जनक से हो ही गयी...और अकेले जनक ने ही नहीं अपितु जेनेटिक इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ कई महर्षियों के साथ उन्होंने लंकाधिपति से ससम्मान भेंट की। बड़े ही उत्साह, जिज्ञासा और गरिमामय वातावरण में वैज्ञानिक सम्भाषा प्रारम्भ हुयी।  एक सप्ताह तक चले उस सेमीनार में चिकित्सा के विभिन्न विषयों एवं विधाओं पर ज्ञान और तकनीक का आदान-प्रदान हुआ। अंतिम दिन राजा जनक ने अपने विशेष शल्यकक्ष में मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा का अतिथि विशेषज्ञों के समक्ष स्वयं डिमॉंन्स्ट्रेशन भी किया जिसे देखकर रावण बहुत प्रभावित हुआ।
उस समय नियोग की इनविवो तकनीक ही सहज और राजा द्वारा अनुशंसित हुआ करती थी। रावण की इनविट्रो तकनीक सुनकर सभी महर्षि आश्चर्यचकित रह गए। उनमें से कईयों को तो विश्वास ही नहीं हुआ कि मानव शरीर से बाहर स्पर्म और ओवम का किसी पात्र में फ़र्टीलाइजेशन संभव हो सकता है। गहन वैज्ञानिक चर्चा में रावण ने उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास किया किन्तु बात स्पर्म डोनेशन पर आकर ठहर गयी। रावण चाहता था कि आर्यावर्त के श्रेष्ठ महर्षि स्वेच्छा से ही इस पुनीत कार्य के लिए अपने स्पर्म का डोनेशन करें किंतु इसके लिए महर्षि तैयार नहीं हो रहे थे। उन्हें भय था कि कहीं रावण जेनेटिकली मोडीफाइड राक्षसों की पूरी सेना ही न तैयार कर दे।
रावण ने अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए मिथिला के वैज्ञानिक संसाधनों के सहयोग का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे जनक ने महर्षियों के दबाव में आकर स्वीकार करने में असमर्थता प्रकट की। रावण ने यह विश्वास दिलाने का पूरा-पूरा प्रयास किया कि वह जेनेटिक इन्जीनियरिंग का लेश भी दुरुपयोग नहीं करेगा.....वह केवल मानव हित में ही अपने शोध को आगे बढ़ाना चाहता है। महत्वाकांक्षी रावण की योजना थी कि वह महर्षियों के स्पर्म से विश्व की एक श्रेष्ठतम मानव जाति विकसित करेगा।
महर्षियों के आगे लंकाधिपति की एक न चली। मिथिला से रावण को निराश हो कर वापस आना पडा। किन्तु इतने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को इतनी सरलता से छोड़ने को वह तैयार न था। रावण को श्रेष्ठतम मानव जाति विकसित करने के लिए आर्यावर्त के श्रेष्ठतम महर्षियों के स्पर्म चाहिए थे ...किसी भी मूल्य पर। उसने मन ही मन एक योजना बनाई और लंका की ओर प्रस्थान किया।
रावण ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना के संसाधनों के लिये नए सिरे से विचार किया और बलपूर्वक महर्षियों के स्पर्म प्राप्त किये। तब राजा जनक को भी इस वैज्ञानिक कोलेबोरेशन के लिए लंकाधिपति के आगे झुकना ही पड़ा।
अंततः अति बुद्धिमान दशानन का प्रयोग सफल हुआ। विश्व के प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी को लेकर जो व्यक्ति सर्वाधिक उत्साहित था वे थे स्वयं राजा जनक। उन्होंने मन ही मन एक योजना बनानी शुरू कर दी। निर्धारित समय पर इनविट्रो भ्रूण ने जन्म लिया। विश्व के महान गायनेकोलोजिस्ट, पीडियाट्रिशियन और जेनेटिक इंजीनियर रावण ने उस नवजात शिशु को लंका ले जाना चाहा पर जनक ने इसकी अनुमति नहीं दी। महर्षियों ने तर्क दिया कि उस नवजात के जैविक माता-पिता मिथिला के हैं अतः केवल अपने तकनीकी योगदान के आधार पर ही रावण का उस नवजात कन्या पर कोई अधिकार नहीं बनता। रावण की अति महत्वाकांक्षी योजना पर पानी फिर गया। उसे भारी मन से दाँत पीसते हुए लंका वापस जाना पडा, उसे लगा कि मिथिलानरेश जनक ने उसके साथ विश्वासघात किया है, उसकी बौद्धिक सम्पदा का बलात अपहरण किया है। विश्व के महान ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट जनक के साथ महान गायनेकोलॉजिस्ट रावण की ठन गयी। दो नृप जो कि अपने समय के श्रेष्ठ वैज्ञानिक भी थे जैविक आधार, भावना और तकनीकी के स्वामित्व को लेकर एक दूसरे के शत्रु बन गये।  
मानापमान, लाभालाभ, जय-पराजय, राग-विराग आदि के बन्धनों से मुक्त विदेहराज जनक तो महर्षियों को पहले ही वचन दे चुके थे कि यह टेस्ट ट्यूब बेबी किसी भी कीमत पर रावण को नहीं दिया जाएगा।
राजा जनक ने महर्षियों की आज्ञा से उस टेस्ट ट्यूब बेबी का नाम रखा सीता और बड़े ही प्रेम से उसका पालन पोषण किया। त्रेतायुग की प्रथम टेस्टट्यूब बेबी सीता सम्पूर्ण मिथिला की बेटी बनी।
बाद में जब सीता का स्वयंवर हुआ तो अपनी वर्षों पूर्व की वैज्ञानिक उपलब्धि को देखने का मोह संवरण नहीं कर सका रावण और अनामंत्रित होते हुए भी मिथिला पहुँच ही गया। सारे अपमान के बाद भी वह अपनी उपलब्धि को पाना ही चाहता था, पर दुर्भाग्य कि रावण को इस बार भी असफलता ही हाथ लगी। एक बार फिर रावण को निराश और अपमानित होकर वापस जाना पडा।
स्वयंवर में जनक दुलारी सीता ने उत्तरकौशल के राजकुमार राम को वरण किया। पर भाग्य ने एक बार फिर करवट ली और राम को सीता के साथ निर्वासित जीवन जीने के लिये रावण के उपनिवेश वाले भाग में दण्डकारण्य जाना पड़ा। जब रावण को अपने दूतों से यह पता चला कि निर्वासित राम उसी के उपनिवेश में अपना समय काट रहे हैं तो एक बार फिर उसने सीता को प्राप्त करने का प्रयास किया। रावण ने इस बार छल का सहारा लिया। लंकाधिपति को अपनी ही वैज्ञानिक उपलब्धि का अपहरण करने पर विवश होना पड़ा। उसे किसी भी कीमत पर अपनी महत्वाकांक्षी योजना को आगे बढ़ाना ही था। पर ईश्वर को कदाचित उसकी योजना स्वीकार नहीं थी और उसे अपनी महत्वाकांक्षी योजना की विफलता के साथ अपनी मृत्यु को भी स्वीकार करना पड़ा।





10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह रोचक |
    रोचक |
    सादर नमन |
    आभार ||

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  2. अत्यन्त रोचक, आधुनिक कथा सी..

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    1. पाण्डेय जी!आधुनिक शब्दावली के कारण यह कथा रोचक लग रही होगी आपको। पर राजा जनक और रावण के बारे में जो लिखा गया है वह कोरा फ़िक्शन नहीं है। "रावण कृत नाड़ी विज्ञानम" नाम की चिकित्सा शास्त्र की एक पुस्तक आज भी उप्लब्ध है। रावण वास्तव में पीडियाट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट एवम राजा जनक ओफ़्थैल्मिक सर्जन थे। मोतियाबिन्द की शल्य चिकित्सा विश्व को राजा जनक की ही देन है। पोस्टपार्टम फ़ीवर में प्रयुक्त होने वाली रावण द्वारा निर्मित एक श्रेष्ठ औषधि का तो नाम ही है "प्रतापलंकेश्वर रस" जो आज भी वैद्य समाज में लोक प्रिय है। जिस तरह भारत में आज चिकित्सक गण सचिव,विधायक,मंत्री एवम मुख्य मंत्री के पद पर आसीन हैं इसी तरह पहले भी राजा लोग विषय विशेष के विशेषज्ञ हुआ करते थे। दुर्भाग्य से आज ये तथ्य रहस्यमय से प्रतीत होते हैं क्योंकि किसी ने आमजनता के बीच इन बातों को लाने का प्रयास ही नहीं किया, जबकि राजा जनक के बारे में तो विदेशी लोग भी जानते हैं कि वे ऑफ़्थैल्मिक सर्जन थे।

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  3. बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने...अच्छा रहता है, चीज़ों को तर्क की कसौटी में कसना, या फिर एक दूसरी नज़र से देखना...मैंने बहुत पहले एक कविता लिखी थी शीर्षक था 'एकादशानन', जिसमें मेरे कई प्रश्न थे, सच पूछिए तो आज मेरे एक प्रश्न 'रक्त कलश से कन्या तक रहस्य समझ नहीं पाते हैं..इसी लिए तो मेरे विचार जनक के खेत तक जाते हैं...' का उत्तर मिला है...
    आपका धन्यवाद...

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    1. मंजूषा जी! धन्यवाद तो मुझे आपको कहना चाहिये ...आपकी उस कविता के उत्तर में ही तो यह कथा लिखी गयी है। यदि आप कविता न लिखतीं तो क्या इस कथा के रूप में ये रहस्य अनावृत हो पाते? अस्तु इस कथा का पूरा श्रेय आपके नाम। :))))))))))
      आपने मेरा फ़रमाइशी गीत अभी तक नहीं सुनाया... :(((((

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  4. प्रवर्तमान आधुनिक शब्दावली नें तथ्यों को सुगम बना दिया है। कथा को आप मिथक दुविधा से बाहर ले आए है। प्राच्य शब्दावली हालांकि अधिक अर्थ समर्थ है किन्तु दुर्बोधों और नवतर वैज्ञानिक शब्द मोहियों के बोध के लिए सटीक प्रयोग है। इस कोण से सुक्ष्म निरिक्षण के लिए बधाई!! आपकी रचनात्मकता अभिनव है।

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  5. यही तो कथा है जो ठीक से गले उतरती है...
    अंधविश्वासों के खोल से निकलती और चमत्कारों को वैज्ञानिक आधार देती...
    वाह आचार्य जी वाह, मैं भी राम कालीन कथाओं को नये सिरे से व्यक्त करना चाहता था.
    बस शुरुआत करने भर से हिचक रहा था.... क्योंकि ऐसे अध्यायों का आरम्भ करने वाले को हर दृष्टि से सक्षम होकर अपनी बात कहनी होती है.
    आपने 'रामायण' और 'रामचरित' पर आस्था रखने वालों को रामकथाओं को फिर से समझने के लिए प्रेरित किया है.
    मेरा भी मानना है कि 'रामायण' हो अथवा 'महाभारत' उसके समस्त प्रसंग अपनी उन्नति की गाथा गाते हैं.
    विश्वपटल पर घटने वाली घटनाओं को हमने अज्ञानतावश मात्र वर्तमान भारत की सीमाओं में कैद करके ही समझा है. हम ये भूल जाते हैं कि तब भी सभी महाद्वीप, महासागर, नदी, झरने पहाड़ आदि थे.

    अब तो यही चाहता हूँ ... नवीन दृष्टि से हुआ चिंतन ज़ारी रहे.

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  6. रामायण की कथा हम सब ने ही पढी है। परंतु उसका एक पक्ष ऐसा भी हो सकता है, इसका अन्दाज़ कम ही लोगों को रहा होगा। और पढने की इच्छा बढ रही है, यह उपक्रम जारी रहे! साधुवाद!

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  7. रोचक, और धरातल के नजदीक| जारी रहें ऐसे प्रयास, शुभकानाएं व्यक्त करता हूँ|

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