सोमवार, 14 मई 2012

शिवभक्त दशानन की रस साधना

  ह बात अज्ञात है कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी रावण के हाथ में कितनी ब्रेन लाइंस थीं..... कम से कम दो तो रही ही होंगी या फिर हो सकता है कि दो से भी अधिक रही हों। किंतु इतना तो तय है कि उसे दशानन की उपाधि यूँ ही नहीं दे दी गयी थी। ज्ञान और कला के समस्त विषयों में उसकी प्रवीणता जहाँ उसे दशानन की अद्भुत...अपूर्व उपाधि से विभूषित किये जाने का कारण बनी तो वहीं अपनी प्रतिभा के अन्धप्रयोग और जुनून ने उसे युद्ध में अकाल मृत्यु का श्राप भी दे दिया था।
  रावण की शिवभक्ति जगत प्रसिद्ध थी। सच्ची भक्ति उसी में होती है जिसमें हमारा दृढ़विश्वास होता है। रावण को शिव और पार्वती में अगाध श्रद्धा थी। शिव और पार्वती के प्रति श्रद्धा तो राम को भी बहुत थी किंतु उनकी यह श्रद्धा अपने आराध्य के अलौकिक स्वरूप में थी जबकि रावण की श्रद्धा अपने आराध्य के लौकिक स्वरूप में थी। अपने लौकिक स्वरूप में शिव न केवल टॉक्जिकोलॉजी अपितु केमिस्ट्री के भी प्रतीक थे। यही कारण है कि गुरुकुल में अन्य 'राजार्ह ' विषयों के अध्ययन के साथ-साथ चिकित्साशास्त्र के अध्ययन में, और उसमें भी जेनेटिक्स, फ़ॉर्मेको-जेनेटिक्स और फ़ॉर्मेको-डायनामिक्स में रावण की विशेष रुचि थी। यह जनश्रुति थी कि लंकेश ने शिव के वीर्य और पार्वती के रज को बड़ी कठिन साधना से सिद्ध कर लिया है। यह साधना रस-साधना की प्रारम्भिक किंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धि मानी जाती है। उस समय के बड़े-बड़े रसशास्त्रज्ञ भी शिववीर्य के तेज के आगे अपनी पराजय स्वीकार कर चुके थे।
   काल की माँग होने से आगे की कथा कहने से पूर्व एक तकनीकी पट को अनावृत कर देना आवश्यक है। त्रेता युग में प्रचलित वैज्ञानिक शब्दावली आज रूढ़ हो चुकी है इसलिये उसे लेकर कलियुग में अर्थ का अनर्थ होने की पूरी-पूरी सम्भावना है। तो लीजिये, पट का अनावरण कर रहा हूँ, परिचित होइये त्रेतायुगीन तकनीकी शब्दावली से। उस काल की टर्मिनोलॉजी के अनुसार तब मर्करी को शिव का वीर्य कहा जाता था और पार्वती के रज को गन्धक।
   पारद के चंचल स्वभाव और तेज से उस समय के सभी फ़ॉर्मेकोलॉजिस्ट परिचित थे। पारद से स्वर्ण और जीवन रक्षक औषधियाँ बनाने के लिये सभी तत्कालीन वैज्ञानिक दिन-रात एक किये दे रहे थे। स्वर्ण तो रावण भी नहीं बना सका किंतु पारद सिद्धि से उसे जो “रस“ प्राप्त हुआ उसने लंका के लिये द्वीप-द्वीपांतरों से फ़ॉरेन करेंसी के रूप में स्वर्ण की बरसात कर दी थी। रावण द्वारा प्राप्त “रस” के विज्ञान को ही बाद में “रस कल्पना” या “रसशास्त्र” के नाम से जगत में प्रसिद्धि प्राप्त हुयी।
   उत्कृष्ट वनौषधियों की उपलब्धता के कारण आर्यावर्त के दक्षिण भाग में स्थित अपने कुछ उपनिवेशों में रावण ने अपनी प्रसिद्ध रसशालायें स्थापित कर रखी थीं। अनवरत साधना के पश्चात पारद के चांचल्य पर रावण को अंततः विजय प्राप्त हुयी। रावण ने अपने प्रयोगों के अध्ययन से पाया कि वनौषधियों के स्वरस से शोधित पारद में एक निश्चित मात्रा में गन्धक मिला कर मर्दन करते रहने से पारद का बन्धन सम्भव है। जिस प्रकार वीर्य में रहने वाले शुक्राणु की चंचलता डिम्ब से संयोग होते ही समाप्त हो जाती है उसी तरह पारद की चंचलता गन्धक के संयोग से समाप्त हो जाती है। तुल्य गुणधर्मी होने के कारण गन्धक को पार्वती के रज की संज्ञा इसीलिये प्राप्त हुयी.....अन्यथा देवों, मनुष्यों और राक्षसों के आराध्य शिव और पार्वती तो निर्गुण, निराकार, अनादि और अनंत हैं। वहाँ इहलोक के अर्थ वाले कहाँ वीर्य और कहाँ रज? किंतु प्राच्य भारतीय वैज्ञानिक शब्दावली तो आध्यात्मिकता से प्रभावित थी ......ऐसा नामकरण तो होना ही था।
   पारद और गन्धक के रासायनिक संयोग से प्राप्त केमिकल कम्पाउण्ड को “रस” की संज्ञा दी गयी। इस रस और वनस्पतियों के संयोग से निर्मित आयुर्वेदिक औषधियों को इस कलियुग में भी रस ही कहा जाता है। रावण का ऐसा विश्वास था कि इस रस से निर्मित औषधियों के युक्तियुक्त प्रयोग से मनुष्य के “बीजभाग अवयव”, जिसे कलियुग की म्लेच्छ भाषा में “जींस” की संज्ञा दी गयी है, की प्रकृति में परिवर्तन सम्भव है। जींस की प्रकृति में इच्छानुरूप परिवर्तन जेनेटिक इंजीनियरिंग का मूल उद्देश्य है। कलियुग के वैज्ञानिकों की तरह ही रावण भी प्रकृति से छेड़छाड़ का प्रेमी था। प्रकृति की शक्तियों पर विजय प्राप्त करना रावण की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा थी। वह अपनी इच्छा और आवश्यकता के अनुरूप मनुष्य संतति में विशेष गुणाधान कर मनुष्य की विशेष प्रजाति उत्पन्न करना चाहता था जिसमें बलिष्ठता, निरोगता, चिरयौवन, आधानित गुण सम्पन्नता अर्थात जेनेटिकली मोडीफ़ाइड ट्रेट्स और इच्छामृत्यु के गुण होते।
  रावण का अपने भौतिक प्रयोगों की एकांगी सोच के कारण आर्यावर्त के ऋषियों की आध्यात्म साधना से गम्भीर विरोध था। उसके अनुसार अध्यात्मिक साधना व्यष्टिगत लाभ के लिये तो ठीक है किंतु बहुसंख्य आमजनता के लिये उसकी कोई समष्टिगत उपादेयता नहीं है। वह व्यक्तिगत प्रतिभाओं की सार्वजनिक उपादेयता का प्रबल पक्षधर था और वैज्ञानिक उपलब्धियों एवं प्रकृति में उपलब्ध भौतिक संसाधनों के उपयोग से अपने राज्य की उन्नति के साथ-साथ प्राकृतिक या कृत्रिम आपदाओं से जनता की रक्षा करने के लिये कटिबद्ध था। अपने वैज्ञानिक व्यवहारवाद को रावण ने “रक्ष” संस्कृति का नाम दिया जिसके कारण वह राक्षस कहलाया। 
  लंकाधिपति रावण प्रकृति की शक्तियों को जीतने के लिये आजीवन संघर्ष करता रहा किंतु वह लंका के उष्ण  और ह्यूमिड वातावरण को जीत न सका। उसके सारे उपाय निष्फल होते जा रहे थे। उसे जेनेटिक़ इंजीनियरिंग और फ़ॉर्मेको-जेनेटिक्स के अनुसन्धान के लिये आर्यावर्त के अपेक्षाकृत शीतल वातावरण में अपनी प्रयोगशालायें स्थापित करने की महती आवश्यकता थी। अपने उत्कृष्ट प्राकृतिक संसाधनों की सर्व सुलभता के कारण आर्यावर्त वैज्ञानिक प्रयोगों के लिये एक आदर्श स्थान के रूप में मान्य था।
   उधर हिमालय की ओर, आर्यावर्त के उत्तरी भाग के ऋषियों ने स्वस्थ्य रहने के लिये आत्मसंयम, प्रकृति अनुकूल जीवनवृत्ति, आचरण की शुद्धता आदि स्वस्थ्यवृत्त के नियमों पर अधिक बल दिया। तथापि, वहाँ रुग्ण होने पर वानस्पतिक औषधियों के प्रयोग का प्रचलन भी वर्ज्य नहीं था।
  त्रेता युग में बौद्धिक सम्पदा के पेटेंट का विचार तक किसी के मन में नहीं था। आर्यावर्त के उत्तरी भाग में रावण ने न केवल “रस” निर्मित रसौषधियों का प्रचार किया अपितु मुक्त हृदय से अपनी वैज्ञानिक तकनीकों एवम उपलब्धियों को भी सर्वसुलभ करवाया। अपने इस योगदान के प्रतिफल में वह आर्यावर्त के शीतल भागों में अपनी इनविवो फ़र्टीलाइजेशन और जेनेटिक इंजीनियरिंग की प्रयोगशालायें स्थापित करना चाहता था जहाँ वह अपने सर्वाधिक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर कार्य कर पाता।
   यद्यपि मिथिलाधिपति विदेहराज जनक ने उसे अपने राज्य में उपलब्ध संसाधनों के प्रयोग की अनुमति प्रदान कर दी किंतु प्रकृति की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि जब उसके रहस्यों की गोपनीयता एक सीमा से अधिक भंग होने लगती है और उसके नियंत्रण को अन्य शक्तियाँ अपने हाथ में लेने का प्रयास करने लगती हैं तो अन्य शक्तियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है और प्रकृति के अति गोपन रहस्य सुरक्षित बने रहते हैं।
   रावण के साथ भी ऐसा ही हुआ। मन्दोदरी के लाख अनुनय विनय करने पर भी वह जेनेटिकली मोडीफ़ाय़ड मनुष्य उत्पन्न करने के प्रोजेक्ट की पूर्ति के लिये दशरथ की कुलवधू,  अपनी प्रथम टेस्ट ट्यूब बेबी सीता का छलपूर्वक अपहरण कर लाया और उसके लिये युद्ध तक के लिये तैयार हो गया।
   मनुष्य समाज में पत्नी का अपहरण अत्यंत दुःख और लज्जा का विषय माना जाता है। राम के लिये तो यह और भी दुःखदायी था क्योंकि जो सीता राम की दृष्टि में एक सर्वगुण सम्पन्न अर्धांगिनी थी वही सीता रावण की दृष्टि में थी मात्र एक गिनी पिग।
   राम ने अपने परम भक्त हनुमान को सीता का पता लगाने के लिये लंका भेजने का निश्चय किया। राम को यद्यपि यह तो पता चल गया था कि रावण ने सीता को लंका में ही कहीं रखा है किसी अन्य द्वीप में नहीं पर वे स्थान और स्थिति को सुनिश्चित कर लेना चाहते थे। हनुमान ने अशोक वाटिका स्थित राजकीय अतिथि गृह में नज़रबन्द रखी गयी सीता से चर्चा की। सीता के मुँह से यह सुनकर कि वे रावण के प्रोजेक्ट में प्रयोग की वस्तु बनने की अपेक्षा सुसाइड कर लेना पसन्द करेंगी, हनुमान अत्यंत प्रसन्न हुये। उन्हें विश्वास हो गया कि सीता ने अभी तक रावण को अपनी कंसेंट नहीं दी है। उन्होंने सीता को सहानुभूतिपूर्वक विश्वास दिलाया कि महाबली बालि पर विजय प्राप्त कर चुके राम के लिये रावण की क्या बिसात! महाकूटनीतिज्ञ राम ऐनकेन प्रकारेण सीता को मुक्त करा ही लेंगे अतः उन्हें सुसाइड के बारे में तो सोचना भी नहीं चाहिये।
   एक जासूस के रूप में हनुमान बहुत अच्छे प्रमाणित हुये। उन्होंने सीता का पता तो लगाया ही, जानबूझ कर कुछ गड़बड़ियाँ भी कर दीं जिसके कारण वे रावण के सैनिकों द्वारा न केवल पकड़े गये अपितु अपने अपराध के लिये दण्डित भी किये गये। दण्ड पाने के बाद अपनी पूर्व नियोजित योजना के अनुसार चतुर हनुमान ने पूरी लंका में घूम-घूम कर अंतर्राष्ट्रीय नियमों की दुहाई देते हुये स्वयं को दण्डित किये जाने का प्रचार किया और राम के प्रति लंकावासियों की सहानुभूति पाने की रणनीतिक सफलता अर्जित कर ली।
   शीघ्र ही पूरी लंका में यह सूचना आग की तरह फैल गयी कि रावण ने अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हुये आर्यावर्त के जासूस को दण्डित किया है। पूरी लंका में रावणराज के विरुद्ध आग फैल गयी। अब सोने की लंका को राख होने से कोई नहीं बचा सकता था। उसके संपूर्ण भौतिक संसाधन और धनसम्पदा युद्ध की भेंट चढ़ने की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी।
   सीता के बारे में सुनिश्चित हो जाने और राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की अनुशंसा मिल जाने पर राम ने अंगद को रावण के पास कम्प्रोमाइज़ के लिये भेजा। अंगद ने रावण के दरबार में जाकर तर्क दिया कि सीता को मानवीय आधार पर निःशर्त मुक्त कर दिया जाना चाहिये, सीता को गिनी पिग की तरह प्रयोगों के लिये प्रयुक्त करना मानवीय संवेदनाओं की हत्या करना है।
   रावण के सिर पर तो जेनेटिक्स का भूत सवार था, उसने तर्क दिया कि मानवीय संवेदनाओं की दुहाई के आधार पर तो वह कभी भी इस प्रयोग को कर ही नहीं पायेगा।
   अंगद ने प्रतिवाद किया था कि आवश्यकता ही क्या है? ऐसे ऊटपटाँग प्रयोगों से वह किसका भला करना चाहता है?
   रावण की निष्ठा मानवीय संवेदनाओं से अधिक अपने ड्रीम प्रोज़ेक्ट के प्रति थी। उसने कहा कि वह मानवीय संवेदनाओं का सम्मान करता है और सीता के साथ बिना उनकी लिखित कंसेंट के कोई प्रयोग नहीं करेगा। इतना ही नहीं अपितु रावण ने तो उल्टे अंगद को ही यह सलाह दे डाली कि अंगद स्वयं भी सीता को इस प्रोजेक्ट में सहयोग के लिये तैयार करने में रावण का सहयोग करे।
   रावण के लिये उसका वैज्ञानिक प्रोजेक्ट मूल्यवान था जब कि अंगद के लिये मूल्यवान था राम के साथ किया गया अपना राजनीतिक अनुबन्ध। कोई भी अपने मूल्यों को त्यागने के लिये तैयार न था। क्रोधित अंगद ने शक्ति परीक्षण हेतु रावण को वहीं उसके दरबार में चेलेंज कर दिया जो कि उस समय के अंतर्राष्ट्रीय दूत नियमों के विरुद्ध था।
  रावण अपने वैज्ञानिक प्रयोगों की व्यस्तता के कारण अपनी जनता से दूर होता चला गया था। अंगद ने उत्तर कोशल की  लोकलुभावन लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्वप्न दिखाकर रावण के कठोर अनुशासन से त्रस्त लंकावासियों को युद्ध के समय राम का साथ देने के लिये तैयार कर लिया। अंगद की सबसे बड़ी सफलता थी रावण के भाई विभीषण को राम के पक्ष में कर लेना।
 
 अंगद वापस राम के बेस कैम्प में पहुँचे, और अपनी कूटनीतिक सफलता का समाचार दिया। पूरी सेना हर्षोल्लास से जय-जयकार करने लगी।
   देखते ही देखते युद्ध की तैयारियाँ प्रारम्भ हो गयीं। हृदय की कोमल संवेदनाओं और मस्तिष्क की निष्ठुर प्रखरता के बीच का वैचारिक युद्ध रक्त युद्ध में बदलने जा रहा था।
  राम नें लंका पर चढ़ाई कर दी। रावण को पराजित कर पाना आसान नहीं था किंतु शीघ्र ही राम की कूटनीति के परिणाम सामने आने प्रारम्भ हो गये। रावण की रणनीति के सारे भेद राम को पहले ही ज्ञात हो जाते थे। रावण की यह सबसे बड़ी रणनीतिक दुर्बलता थी जिसका लाभ राम को मिला।         
  महाबली, महापराक्रमी, अद्भुत प्रतिभाओं का धनी रावण अपनी अतृप्त ऐषणाओं के साथ ही राम के साथ युद्ध करते हुये पंचत्व में लीन हुआ। और इसके साथ ही त्रेतायुग के एक महान वैज्ञानिक अध्याय का भी अंत हो गया।   
  मरते समय रावण ने राम को श्राप देते हुये कहा कि “हे राम! तुमने मेरे वैज्ञानिक प्रयोगों में बाधा पहुँचायी और छलपूर्वक मेरी हत्या की है इसलिये मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि कलियुग में तुम्हारे वंशजों को सामूहिक रूप से मल्टीनेशनल कम्पनीज के प्रयोगों के लिये गिनी पिग बनना पड़ेगा।“
   आज म्लेच्छ देशों के लिये भारत एक जीवित प्रयोगशाला है जिसमें जीवित मनुष्यों पर विभिन्न औषधियों के प्रयोग किये जाते हैं। तब त्रेता में केवल एक सीता को गिनी पिग बनाये जाने के कारण भयानक युद्ध हुआ था किंतु कलियुग में रावण के श्राप के कारण पूरे भारत की कोटि-कोटि निरीह जनता गिनी पिग बनने को विवश हो गयी।  
  प्रकृति का अनावरण एक सीमा तक तो क्षम्य है किंतु उसके बाद कदापि नहीं। राम वैज्ञानिक प्रयोगों के कट्टर विरोधी नहीं थे किंतु जिस तरह रावण अपने जेनेटिक प्रयोगों द्वारा प्रकृति की क्रियेटिव शक्ति को अपने नियंत्रण में लेना चाह रहा था वह भविष्य के लिये अशुभ था। ऐसी उपलब्धियों के सदुपयोग के स्थान पर दुरुपयोग की सम्भावनायें ही अधिक प्रबल हुआ करती हैं। राम अपनी इसी दूरदर्शिता के कारण आर्यावर्त में एक लम्बे समय तक आध्यात्मिक वातावरण बनाये रख सकने में सफल रहे थे। 
  अब पुनः, कलियुग के इस काल खण्ड में वैज्ञानिकों की अभिरुचि जेनेटिक इंजीनियरिंग की ओर बढ़ती जा रही है। भिण्डी, टमाटर, बैंगन आदि वनस्पतियों में मेढक, छिपकली आदि प्राणियों के बीजभाग अवयव के प्रत्यारोपण द्वारा वनस्पति और प्राणियों के बीच की प्राकृतिक सीमा रेखा का उल्लंघन कर चुके कलियुगी वैज्ञानिक रावण की महत्वाकांक्षी योजना को पुनर्जीवित करने में लगे हुये हैं। रावण की आत्मा इतने युगों बाद पुनः अपने अस्तित्व में आ रही है।      
सनातन धर्म की जय हो!!!

कथायें अपने साथ कुछ सन्देश लेकर आती हैं। कहा नहीं जा सकता कि कलियुग के वैज्ञानिक इस कथा से कितना और क्या सन्देश ग्रहण कर सकेंगे। 

58 टिप्‍पणियां:

  1. पुराणों की गाथाओं पर वैज्ञानिकता का रोचक समावेश..

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  2. मुझे लगता था कि इस प्रकार का चिन्तन करना मेरी बेवकूफी है.. लेकिन आज पहली बार मैंने दूसरे को भी अपने जैसा चिन्तन करता हुआ पाया...

    मुझे हमेशा से यह बात चुभती थी कि भारत में इतना सोना कहाँ से आया.. ? प्रकृति में तो सोने के पहाड़ तो होते नहीं थे.. और सोने का उत्पादन से पहले उस धातु की जानकारी..!! आखिर कैसे? बगैर किसी तकनीक के ऐसा कैसे सम्भव हो सकता है?
    हमारे भोजन में जो मसाले हैं.. उनकी उपयोगिता.. आखिर भोजन में जो सुगंध होती थी उसकी कल्पना कैसे की गयी जो कि मात्र सूँघने से ही मुँह में पर्याप्त लार उत्पन्न कर दे जो कि पाचन के लिए बेहद जरूरी है.. आज कल तो सुगंध होती नहीं.. न स्वाद.. आप ही देखिए.. ज्यादातर रोगी पेट से हैं.. आखिर कितनी गहन शोध की बात है.. क्योंकि प्रकृति सिर्फ तरह तरह के उत्पाद मनुष्य को देती है.. और उनके संयोग से हम अपने हित में कैसे प्रयोग में ला सकते हैं यह तो पूरी तरह से वैज्ञानिक है...
    आजकल भारत के लोगों में ऐसा मौलिक चिन्तन, खासकर अपने अतीत को लेकर, बहुत कम देखने को मिलता है. यह प्रयास सराहनीय है.. मुझे भरोसा है.. ऐसा चिन्तन भगवान राम के कुल को पुनः जीवित कर देगा..

    जिन्हें मूल की समझ नहीं होती उन्हें भोजन करने का सही तरीका भी नहीं आता.. जो कि इस शरीर की बुनियाद और विचारों की श्रेष्ठता तय करता है..

    ऐसा चिन्तन करते रहें और प्रसारित भी करते रहें.. ताकि दूसरों को यह न लगे कि उनके मन में जो प्रश्न उठ रहे हैं वह सिर्फ एक कल्पना है..

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    1. आपका समर्थन पाकर उत्साह मिलता है मनीषजी.

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  3. भारत के पुराण और उनकी गाथायें, कहानी के रूप में आमजन में क्यों फैलाई गयी थी? शायद कहानी से समझ की बुनियाद बना करती है.. वे कहानियाँ आम जन के लिए थी जिसमें कुछ ऐसी प्रवृत्ति के लोग भी थे जो जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते वे खोज करते रहते.. और जानबूझ कर उन कहानियों में ऐसी चीजें शामिल की गयी होती जो कि बेवकूफी भरी हो और जिसपर गहन चर्चा की जा सके.. ताकि समझ की पूरी समझ विकसित हो सके और वास्तविक अनुसंधान के काबिल वह इन्सान बन सके..
    लेकिन आज हम उन कहानियों को एक बेवकूफी भरी गाथा मान बैठे हैं.. क्योंकि हममें अब समझ आ गयी है.. प्रजातन्त्र आ गया है.. सबको साथ लाया गया और वही हुआ जो प्राचीन भारतीय राजाओं को डर था. वैज्ञानिक समझ आते ही जनता ने अपने फायदे को लेकर दूध से लेकर हमारे भोजन तक को दूषित कर दिया है.. जहर फैला दिया है.
    यह सत्य है.. कलयुग के बाद इस सृष्टि का विनाश तय है.. अगर हमने अभी तक चीजों को नहीं समझा तो.. यह ब्लॉग ऐसी कुछ समझ प्रसारित करता है..
    http://bharatbhartivaibhavam.blogspot.in/

    फेसबुक पर एक अपील!! https://www.facebook.com/manish2god

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  4. मुझे अग्नि परीक्षा वाली बात बिल्कुल बेवकूफी भरी लगती है.. आखिर इन्सान की पवित्रता जाँचने के लिए आग में झोंकना?? आजकल की कितनी बेवकूफी भरी सोच है.. कुछ तो सच में जला देते हैं अपनी पत्नियों को..

    कुछ तो रहस्य है ही इन कहानियों के पीछे.. और हम पूरी कोशिश करेंगे उसे समझने की.. भारत भूमि अभी बंजर नहीं हुई है

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    1. मित्र मनीष जी,
      अग्नि परीक्षा अर्थात.... DNA टेस्ट जैसे अन्य कई परीक्षण जो स्त्रियों के हुआ करते हैं.

      यह तब की शब्दावली है. इसका अर्थ कतई आग में झोंकना नहीं है.

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    2. जैसे यूरिन टेस्ट, ब्लड टेस्ट के तमाम तरह के टेस्ट और प्रेगनेंसी टेस्ट आदि


      सीता की 'अग्नि परीक्षा' वहाँ किस अर्थ में की गई इसकी कल्पना की जा सकती है.

      जब भी कोई बंधक छूटकर आता है उसकी पूरी मेडिकल जाँच की जाती है. स्त्री हो तो और भी ज्यादा.

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    3. हाँ.. बिल्कुल ऐसा हो सकता है.. कुछ हालीवुड फिल्में भी इसी तरह बनाई गयी हैं.. जिसमें DNA के साथ अक्सर छेड़छाड़ की जाती है..

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    4. सबसे कठिन परीक्षा के लिये आज भी हम "अग्नि परीक्षा" पद का प्रयोग करते हैं। इसे धधकती आग में प्रवेश करने के अर्थ से कैसे जोड़ दिया गया?निश्चित ही यह भक्त के सरल हृदय का भाव है ऐसी बातों को ही मैने अतिशयोक्तिपूर्ण कहा है।

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  5. पुराणी घटनाओ को नए कोणो से देखना बहुत ही रोमांचक और आश्चर्यजनक होता जा रहा है!अब से पहले मै ऐसा सोच भी नहीं सकता था!
    ऐसी व्याख्या का आधार क्या वाल्मीकि रामायण ही है या अन्य ग्रन्थ इसकी पुष्टि करते है...... ये जानने की उत्सुकता भी अब बढ़ रही है....

    कुँवर जी,

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    1. तुलसीदास जी यदि विज्ञान पृष्ठभूमि से होते तो रामचरितमानस का स्वरूप कदाचित कुछ इसी तरह का होता। आयुर्वेदिक ग्रंथों में प्रयुक्त तकनीकी शब्दावली और रावण का आयुर्वेदज्ञ होना ये दो ही इस कथा के प्रमुख आधार हैं। शेष बुनावट उपयुक्त तार्किक योजना का परिणाम है।
      तुलसीदास की कृति भक्ति पूर्ण रचना है जो निश्चित ही अतिशयोक्तिपूर्ण है। भक्त का स्वभाव ही ऐसा होता है। किंतु थोड़ी भी तार्किकता के आधार पर उनकी रचना को समझने का प्रयास किया जाय तो कुछ भी गले के नीचे नहीं उतरता। किंतु रामकथा में वर्णित घटनाओं को यदि वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया जाय तो सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। हमें अपने प्राचीन गौरव को समझने के लिये चमत्कार के जाल से निकलकर बाहर आना ही होगा। अगली बात यह हैकि रामचरित मानस लिखे जाने का उद्देश्य वैज्ञानिक पक्ष को सामने लाना था ही नहीं। भारतीय समाज उन दिनों बुरी तरह बिखर रहा था, उसकी अपनी पहचान खोती जा रही थी, मुस्लिम आक्रांताओं की लूटमार के घाव स्थायी पीड़ादायी थे, समाज नेतृत्व विहीन हो गया था। भाषा से लेकर वेशभूषा, संस्कार से लेकर धर्म तक सभी एक गम्भीर संक्रमण काल से गुजर रहे थे। विदेशियों की गुलामी में आत्म स्वाभिमान खो चुके और धर्मांतरण की पीड़ा से मन से टूट चुके भारतीयों को उस समय किसी चमत्कार में बाँधकर रखना ही उद्देश्य था ..और वही तुलसीदास ने किया। तुलसी के सभी पात्र अपने पाठकों के मन में एक ऐसे स्वप्न संसार की रचना करते हैं जो तर्क की सभी सीमाओं से परे है। इससे एक सम्मोहन की स्थिति उत्पन्न हुयी जिसने पददलित और विवश हिन्दू समाज को बाँधकर रखने में बड़ी भूमिका निभायी। आज स्थितियाँ दूसरी हैं ...अब आवश्यकता इस बात की हैकि हम पुरानी घटनाओं को वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में देखें। ध्यान रखा जाय कि कोई भी घटना ऑब्जर्वर की मनःस्थिति, उसकी योग्यता, क्षमता और उसके मंतव्य के अनुसार भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण करती है। कोई भी घटना सदा एक ही अर्थ नहीं देती।

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    2. @ ... भक्ति पूर्ण रचना है जो निश्चित ही अतिशयोक्तिपूर्ण है। भक्त का स्वभाव ही ऐसा होता है। किंतु थोड़ी भी तार्किकता के आधार पर उनकी रचना को समझने का प्रयास किया जाय तो कुछ भी गले के नीचे नहीं उतरता।

      - भक्त अतिश्योक्ति करते हैं? यह नई परिभाषा जानने को मिली आज।

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    3. अनुराग जी! व्यंग्य के स्थान पर यदि तर्किक ढंग से अपना विरोध प्रकट करते तो सार्थकता होती। आपके व्यंग्य विरोध का उत्तर है मेरे पास किंतु विनम्र अनुरोध हैकि पहले आप अपनी बात स्पष्ट कर दें।

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    4. आदरणीय बड़े भाई, आपने एक बड़े वर्ग की श्रद्धा के पात्र संत तुलसीदास के बहाने भक्तिभाव को ही अतिश्योक्ति बता दिया और और मेरे सरल से प्रश्न "भक्त अतिश्योक्ति करते हैं?" में आपको व्यंग्य नज़र आ रहा है? जी नहीं, यह व्यंग्य नहीं गम्भीर प्रश्न है फिर भी आपने कहा है तो और स्पष्ट करता हूँ
      । आपने जो कहा उसका स्पष्ट अर्थ यह निकल रहा है कि भक्त का स्वभाव अतिश्योक्तिपूर्ण होता है। बात आपकी है, स्पष्ट भी मुझे नहीं आपको ही करना है।

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    5. क्या भक्त का स्वभाव अतिशयोक्तिपूर्ण होता है?

      @ यह सच है कि भक्त का स्वभाव अतिशयोक्तिपूर्ण होता है.

      मैं इस बात से सहमत हूँ कि तुलसीदास ने हिन्दू समाज के सांस्कृतिक विघटन और मुस्लिम धर्मांतरण की तीव्रता को कम करने और समाप्त करने की भावना से भी 'रामचरितमानस' रचा. धर्म में विकृतियों का जमावड़ा हो चुका था. मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिये समाज में आदर्शों को स्थापित किया जाना आवश्यक था. तुलसी ने उपयुक्त सामयिक चिंतन करते हुए 'रामचरित' की कथा कही.

      इस बात को तर्क की कसौटी पर कसने के लिये वर्तमान के भक्तों की बात की जाये या फिर भक्तिकाल के भक्त-कवियों की?

      सोचता हूँ एक-एककर सभी की बात की जाये और अपने अनुभव भी निष्पक्ष भाव से व्यक्त किये जाएँ, तब ही सत्य प्राप्त होगा.

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    6. @@ आज घर-घर में भक्त विद्यमान हैं... कोई किसी स्वामी को मानता है कोई किसी बाबा को. किसी की आस्था इतनी ऊँची है कि वह अपने आस-पास की प्राथमिक जरूरतों की अनदेखी किये है.

      — समाज की एक विधवा महिला ... ब्रह्माकुमारी के सत्संग में जा-जाकर ऎसी भक्तन बनी कि अपने तीन बच्चों वाले परिवार की प्राथमिक जरूरतों से मुख फेर लिया. उसके लिये उस समय 'मोह-माया से मुक्ति' वाले विचार क्या भक्ति के नाम पर विकसे भौंडी अतिशयता का रूप नहीं?

      — महिला भेष में रहने वाले एक पुलिस अधिकारी 'पंडा' जी 'कृष्ण' भक्ति में ऐसे बावरे हुए कि अपने परिवार की विवाहिता पत्नी को अनदेखा कर अपना 'लिंग बोध' भुला बैठे. क्या सचमुच उन्होंने अपना लिंगबोध भुला दिया था या फिर वह भक्ति की अतिशयता थी? ...

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    7. — सूरदास जी ने अपने आराध्य के लिये भजन और पद रचना की. पहले पहल उन्होंने साधारण भाव से पद रचे... जब उन्हें वल्लभाचार्य जी अपना शिष्य बनाया. और अन्य भक्त कवियों में शामिल किया तो अवचेतन मन का 'प्रतिस्पर्धा भाव' उन्हें और बेहतर पद रचने को बाध्य करने लगा होगा. सीनियरटी तभी तक सुरक्षित रहती है जब तक कि रचना-कर्म में प्रतिभा दिखती रही. यदि वात्सल्य भाव की रचना कोई कवि करता है वह उसका उत्कर्ष पाने को लालायित रहता ही है... वह ऐसा चाहे-अनचाहे करता है... [जैसे यदि कोई प्रेमी किसी के भौतिक प्रेम में पड़ जाता है तो वह सारी हदें पार कर लेना चाहता है. वैसे ही 'आध्यात्म-प्रेमी' जीव ... परमात्मा सौन्दर्य का अतिशय पान करना चाहता है.]

      अष्टछाप के सभी कवियों ने अपने आराध्य को लेकर भाँति-भाँति की कल्पनाएँ की हैं... बाल-सुलभ क्रीडाओं का वर्णन बहुत ही स्वभाविक है किन्तु भक्त चाहे दास्य भाव से भक्ति करे अथवा सख्य भाव से वह परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उसकी शक्तियों का अतिशय वर्णन करता ही है. कभी किसी भक्त कवि ने मुंशी प्रेमचंद की तरह अपने नायक पात्र में हीनतर भाव नहीं दर्शायें हैं. हाँ 'चोरी' को बाल-सुलभ क्रीड़ा रूप में महिमा मंडित जरूर किया है लेकिन उसे बुरा नहीं ठहराया.

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    8. — तुलसीदास हिन्दू समाज के डूबते बेड़े को बचाने वाले नायक हैं. इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि उनका कई दृष्टि से महत्व सिद्ध किया जा सकता है. साहित्य में रस-छंद-अलंकार की दृष्टि से, भाखा में लिखने की दृष्टि से, राम-आख्यान परम्परा को आगे बढ़ाने की दृष्टि से, समाज में मूल्यों की पुनर्स्थापना की दृष्टि से, धर्मांतरण रोकने की दृष्टि से.... आदि-आदि... फिर भी दिल्ली प्रेस से एक पुस्तक प्रकाशित होती है जिसमें तमाम लेखकों ने उस नायक के खिलाफ जबर्दस्त विष-वमन किया. पुस्तक का नाम है "हिन्दू समाज के पथ-भ्रष्टक तुलसीदास' सम्पादक हैं 'विश्वनाथ'.उनमें जितने भी लेखकों ने अपने विचार दिये वह उनकी 'विरोध-भक्ति' का नमूना है.... इस कारण मैं कह सकता हूँ कि भक्त अतिशयवादी होता है.... आलोचना का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि उसमें आपको कोई गुण दिखायी ही न दें. वहाँ 'विरोध-भक्ति' में डूबे विचारकों ने विरोध की पराकाष्ठा को छू लिया है. किसी की भी हद तक पहुँचना भक्ति का अतिशय रूप है. तभी तो आप बाज़ार में बिकेंगे जब आप पुरजोर समर्थन या पुरजोर विरोध करते दिखायी देंगे.

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    9. @ अनुराग जी उवाच- "भक्त का स्वभाव अतिश्योक्तिपूर्ण होता है। बात आपकी है, स्पष्ट भी मुझे नहीं आपको ही करना है।"
      भक्त अपनी श्रद्धा के कारण अपने आराध्य पर विश्वास करता है। श्रद्धा के पीछे तर्क नहीं हुआ करते। जो होता है वह है ऐतिह्य प्रमाण या फिर शब्द प्रमाण। शब्द प्रमाण भी केवल आप्त पुरुषों का ही स्वीकार्य है। जहाँ तर्क नहीं होता वहाँ भाव होते हैं ...भाव कभी अपूर्ण या ख़ण्डित नहीं होते। यह भावना व्यक्ति को चरम की ओर ...पूर्णता की ले जाने का कार्य करती है। इसलिये "अतिशयोक्ति" भक्त की वृत्ति बन जाती है। भक्त की गति केवल एक ही दिशा में होती है। इसके विपरीत विज्ञान तो सदा ही तर्क की कसौटी पर कसे जाने के बाद ही स्वीकार्य हो पाता है। इसीलिये वहाँ खण्डन और मण्डन की प्रक्रियायें होती रहती हैं। हम किसी भी चीज़ को या तो भाव से ग्रहण करते हैं या फिर विज्ञान सम्मत होने पर।
      तुलसीदास जी ने अपने समय के समाज की आवश्यकता को देखते हुये राम कथा के माध्यम से ईश्वर के अलौकिक तत्वों की ओर उसका ध्यान आकृष्ट कराया। आत्मगौरव खो चुकी जनता के लिये तब तर्क का कोई औचित्य नहीं था। तुलसीदास जी अपने उद्देश्य में सफल रहे,इसलिये वे हमारी भी श्रद्धा के पात्र हैं।
      एक बात और भी है, भक्त केवल अलौकिक भावों को ही ग्रहण करता है वह भी लौकिक परिवेश में। यह बात बड़ी विचित्र सी लगती है किंतु सत्य यही है। तभी तो निर्गुण-निराकार-अनादि-अनंत-अखण्ड ईश्वर को वह कभी माखन चुराते हुये देखता है तो कभी सीता के विरह में विह्वल। यह सब तर्क की सीमा को स्पर्श नहीं करता। यह भावपूर्ण अतिशयोक्ति है भक्त की अपने आराध्य के प्रति। भक्त निगेटिव नहीं केवल पॉजिटिव देखता है जबकि विज्ञान के तर्क निगटिव और पॉजिटिव दोनो पक्षों को दखते हैं।

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    10. बोलो साचे दरबार की .... जय!

      श्रेष्ठ चिंतन ... सुधापान हुआ.

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    11. @ अनुराग जी उवाच- "आपने एक बड़े वर्ग की श्रद्धा के पात्र संत तुलसीदास के बहाने..."
      बिल्कुल एक बड़े वर्ग की श्रद्धा है उनके प्रति। किंतु मैं भक्तों की श्रद्धा का मूल्य जानना चाहता हूँ। भारत के इस बड़े वर्ग का एक चौथाई प्रतिशत भी यदि अपने आराध्य के आदर्शों का अनुकरण कर पाता तो भारत भ्रष्टाचारियों का गढ़ न बना होता। उस श्रद्धा का मूल्य ही क्या जो मानव को मानव नहीं बना पाती? भारत में शायद ही कोई हो जो किसी न किसी धर्म का पालन न करता हो...पर क्या भारत में धर्म के अनुकूल आचरण भी करते हैं लोग? यही है "भक्त की अतिशयोक्ति"। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तर्क की कसौटी पर अपने पुरा आख्यानों को कसें और उनकी व्यावहारिक उपादेयता को स्वीकारें। अन्यथा हम मन्दिर में घण्टी भी बजाते रहेंगे और रिश्वत भी लेते रहेंगे।
      तुलसीदास कृत रामचरित मानस, वाल्मीकि रामायण, कंबन रामायण आदि सभीमें कुछ न कुछ भिन्नतायें हैं। त्रेता युग के बाद कलियुग में रची गयी इन रचनाओं का आधार श्रुति से प्राप्त ज्ञान ही था। स्पष्ट हैकि रचनाकारों ने अपनी बात कहने के लिये राम की कथा में कल्पना का सहारा लिया है। हमने उसी श्रुतज्ञान को विज्ञान के परिधान में देखने की चेष्टा की है। अंतर इतना ही हैकि हमारे फ़िक्शन में वैज्ञानिक तत्वों का समावेश है। अतः तुलसीदास तत्कालीन समय के अनुरूप रचना करने कारण आज भी श्रद्धा के पात्र हैं।

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    12. @ @ अनुराग जी उवाच-
      @ भक्तों की श्रद्धा का मूल्य जानना चाहता हूँ ...
      @ उस श्रद्धा का मूल्य ही क्या ...

      श्रद्धा का भी मूल्यांकन होता है ? प्रेम, भक्ति और श्रद्धा के मूल्य नापे जा सकते हैं ?

      अपने निजी विश्वासों और मतभेदों के चलते आप लोग भक्ति को ही कटघरे में खड़ा कर रहे हैं ?

      अनुराग जी क्या मानते हैं / आप (कौशलेन्द्र जी) क्या मानते हैं / प्रतुल जी क्या मानते हैं / मैं क्या मानती हूँ - ये हम निजी व्यक्तियों के अपने निजी विचार हैं | किसी को कोई अधिकार नहीं बनता in general भक्ति पर सवालिया निशान लगाने का | लोक कहानियाँ भरी पड़ी हैं इन बातों से, कि भक्त की भक्ति और श्रद्धा को साबित करने के लिए उनके आराध्य देवी / देवता खुद कई बार कई चमत्कार दिखाए रहे | इनमे से कई बातें अतिशयोक्ति भी हो सकती हैं - तो कई नहीं भी होंगी | अब रामसेतु पर ही - सुप्रीम कोर्ट तक में बहस चली - कि वह है क्या ? परन्तु उत्तर अब तक न आये |

      @ प्रतुल जी - आप ने कई उदाहरण दिए जिनमे भक्त कहलाने वालों ने अतिशयोक्तियाँ की | इसका अर्थ यह नहीं की आप सब अपने आप को judge and jury बना कर भक्ति की परिभाषाएं गढ़ने लगें, सभी भक्त अतिशयोक्ति करते हैं ऐसा axiom स्थापित कर दें | भक्तों को अपनी भक्ति / अतिशयोक्ति आदि आदि के लिए किसी से certificate नहीं चाहिए |

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    13. किसी को कोई अधिकार नहीं बनता in general भक्ति पर सवालिया निशान लगाने का |

      @ वैसे कौशलेन्द्र जी भली प्रकार कह सकते हैं.... फिर भी मैं इतना तो कह सकता हूँ कि 'भक्ति के ड्रामे' में तमाम कर्मकांड अपेक्षित हैं. भौतिक वस्तुओं की चाहना है. भीड़ चाहिए, मध्यस्थ चाहिए... घंटे-घड़ियाल चाहिए... किन्तु 'दिखावटी नास्तिक की भक्ति' में मात्र मन चाहिए. पाखंडों की पोल खोल यदि विमर्श से दूरी बनाएगी... तब निर्मल बाबाओं के दरबार बंद ऑडिटोरियम में सजते रहेंगे. हम तो मात्र विमर्श कर रहे हैं... हमारी सोच कई मंचों [निरामिष और नारी जैसे] पर समान हो सकती है फिर भी इस मंच पर असमान होते हुए भी सभा योग्य है. सभा में भाँति-भाँति के विचारक होते हैं.वे सब किसी एक विषय पर मत देने के लिये स्वतंत्र हैं, तर्क ही एकमात्र कसौटी होती है, जिससे वे पक्ष और विपक्ष में बँटते हैं. फिर भी सभा भंग नहीं होती.

      यहाँ लेखक पुरानी सामग्री को नये साँचों में ढाल रहा है.... और उसका इरादा बहुत ही नेक है... भक्ति पर सवालिया निशान कतई नहीं है.

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    14. शिल्पा जी! श्रद्धा के मूल्यांकन पर एक लम्बी टिप्पणी लिखी थी जब क्लिक किया तो नेटवर्क गोल..और टिप्पणी हज़म। प्रतुल जी की चिट्ठी मिली कि इस विमर्श से मुझे हाथ खीच लेना चाहिये ....हाथ तो नहीं खीचूँगा पर अपने ब्लॉग पर शीघ्र ही एक लेख लिखूँगा।
      इस चिट्ठे के प्रबन्धनकर्ताओं से विनम्र निवेदन हैकि यदि उन्हें ऐसा प्रतीत भी हो कि मेरे लेख उनकी मर्यादा और चिट्ठे के उद्देश्य से अलग हैं तो वे निःसंकोच मुझे सूचित करदें। मैं आपके चिट्ठे की मर्यादाओं का सम्मान करूँगा। तब तक इस कड़ी का अगला लेख "श्रद्धा का मूल्याँकन" मेरे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया जायेगा।

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    15. आदरणीय कौशलेन्द्र जी
      मैं आपका बहुत आदर करती हूँ | आपका आदर सम्मान अपनी जगह है - मुद्दा अपनी जगह है | विमर्श से हाथ खींच लेने से अब कुछ होगा नहीं - क्योंकि एक बार इस तरह के तीर का संधान हो जाए - तो उसे वापस लेना संभव नहीं है | श्री राम ने भी परशुराम जी के कहने पर तीर साधा - तो उसे वापस नहीं लिया था (धनुष भंग के बाद) | मैं तो अब तक इस ब्लॉग के व्यवस्थापक भी आप ही को समझती थी | बात आप चाहे यहाँ लिखें या बस्तर की अभिव्यक्ति पर - बात वही रहती है |

      पिछली बार भी आपकी बात पर भी मैंने मुद्दे पर विरोध किया - तो आपने यही कहा की आप लिखना बंद कर देंगे | तब बात **निजी तौर** पर मेरे लिए लिखे जा रहे अपशब्दों की थी - तो मैं पीछे हट गयी थी | मैंने आपसे सार्वजनिक मंच पर माफ़ी भी मांगी, और आपने लेखन जारी भी रखा | लेकिन यहाँ बात मेरी नहीं, मेरी सीता मैया की है |

      यदि ऐसे मुद्दों पर लेखन होगा - तो सहमती और असहमति तो अपेक्षित होगी ही | आप यदि सिर्फ रावण के योगदान तक ही बात कर रहे होते - तो बात और थी | रावण महत ज्ञानी था - इसमें किसीको कोई इनकार शायद ही हो | ( यदि किसी को इनकार है - तो इस विषय में आप मुझे अपने साथ ही खडा पायेंगे - उन लोगों का विरोध करने में | मैं व्यक्ति पर नहीं - मुद्दे पर साथ भी होती हूँ, विरुद्ध भी | )

      किन्तु उसकी महानता दिखाते दिखाते आपने सीता माँ को उसका गिनी पिग बना दिया, उसके प्रयोगों से उन्हें जन्मा दिखा दिया ? भक्त अतिशयोक्ति करते हैं - यह जनरलाइज़ कर दिया ? क्या आप स्वयं भी यहाँ अतिशयोक्ति नहीं कर रहे ? क्या विज्ञान सिर्फ "scientific" अंदाजों के बल पर यह कह देने का साथ देता है कि ऐसा हुआ ही था ? क्या विज्ञान जेनेटिक टेस्ट्स के बिना वह सब मान लेगा जो आप सीता के विषय में कह रहे हैं ? आपके पास सुबूत हैं उस बात को सिद्ध करने के लिए जो आपने सीता जन्म के विषय में लिखी है ? आप खुद ही डॉक्टर हैं, जानते ही हैं कि विज्ञान किसी भी चीज़ को सिर्फ लोजिकल लगने की वजह से नहीं, बल्कि ठोस प्रमाण पर ही लिखने की इजाज़त देता है | are you (or me, or anyone of us here ) authorized to declare these things as universal truths ?

      इश्वर के अवतार, और उनके संगी, जब भी आते हैं - उनके आने से चमत्कार जुड़े होते हैं | सीता जी के आने की कथा भी है - यहाँ उसकी चर्चा करना संभव ही नहीं है, रामायण पर मैं एक कविता शृंखला लिख रही हूँ (आप भी उसे पढ़ रहे थे पहले) - परन्तु उसमे भी मैंने इस विषय को छूने का साहस नहीं किया | इसके लिए एक अलग ही शृंखला चाहिए होगी शायद |

      गीता जी में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं (जन्म कर्म च में दिव्यम .... वाले श्लोक में ) - कि मेरा आना हमेशा मेरा अपना निर्णय है, मैं साधारण जीव की तरह कर्म फल में बंध कर / अज्ञान में जन्म नहीं लेता, - बल्कि मैं अपनी प्रकृति को अपने अधीन कर के प्रकट होता हूँ, और यहाँ विचरता हूँ | मुझे मनुष्य रूप में विचरते देख कर मूर्ख जन मुझे साधारण मनुष्य समझ कर बहुत कुछ कहते हैं मेरे बारे में | ..... ठीक यही बात सीता जी और राधा जी पर भी लागू है | आप वैज्ञानिक दृष्टि से इसे किसी भी रूप में समझने के प्रयास करें, उसे समझना विज्ञान के बस में ही नहीं है |

      जीज़स भी "virgin mary " के ईश्वर दत्त पुत्र हैं - यह भी चमत्कार ही है | आप खुद ही डॉक्टर हैं, जानते ही हैं कि विज्ञान तो यह बात मान ही नहीं सकता | किन्तु मेरा दृढ़ विश्वास है कि वे "virgin mary " के ईश्वर दत्त पुत्र ही हैं, और ऐसे दिव्य जन्मों के सम्बन्ध में ऐसा होना न सिर्फ संभव है, बल्कि अपेक्षित भी है | इसकी वैज्ञानिक विवेचना भी हो सकती है - बड़ी आसानी से | लेकिन क्या इसाई जन इस बात की वैज्ञानिक विवेचना करते दीखते हैं ? यदि करते भी हैं, तो वे यह नहीं कहते कि हम इसाई धर्म को विनष्ट होने से बचाने के लिए यह कर रहे हैं |

      @ आदरणीय प्रतुल जी
      इस विमर्श से हाथ खींचना अब संभव है क्या प्रतुल जी ? may be अच्छा होता यदि यह शुरू न होता - परन्तु आरम्भ के बाद इसे पीछे लेना संभव है ?

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  6. आचार्य जी,

    यदि आप युक्तियुक्त इनके प्रदेशों के बारे में भी जानकारी दे सकें तो सभी घटनाएं पूर्णतया तथ्यात्मक लगेंगी.



    वैसे स्थानों के बारे में आलोचनात्मक चिंतन करने वाले विद्वानों के मतों में भिन्नता है. फिर भी सबसे अधिक मान्य मेरे लिये कुछ स्थान हैं जिनके सच को कई तरह से कसने की कोशिश की है.

    जैसे हरिवर्ष -- वर्तमान में ब्रिटेन -- तीन देशों के मध्य में बैकुंठ स्थान विष्णु की शेष-शैया ...... जहाँ विष्णु की प्रयोगशालाएँ थीं. [विस्तार से फिर कभी...]

    श्रीलंका --- वर्तमान में साउथ अफ्रीका --- जहाँ रावण की सोने की लंका थी.

    राम के वनवास का रूट ----- अयोध्या से पंजाब होते हुए पाकिस्तान, अफगानिस्तान खिर्गिजतान रशिया, योरोप के इटली जैसे कई देश. समर्थन जुटाने के लिये और रावण के पक्षों को कमज़ोर करने के लिये उत्तरी अमेरिका फिर दक्षिण अमेरिका तक जाना .. जटायु के भाई सम्पाती का अर्जेंटीना क्षेत्र में मिलना और राम को रावण के विषय में सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराना.

    ..... हनुमान (वैज्ञानिक) का बडामूला ट्राइंगल में फंसकर निकल आना और वहाँ से साउथ अफ्रीका स्थित अशोक वाटिका स्थित प्रयोगशाला तक जाना, शबरी प्रदेश (साइबेरिया) आदि-आदि सभी प्रश्नों का जवाब विस्तार फिर कभी.

    हमारी तो केवल कल्पनाएँ ही सत्य तक पहुँचने के प्रयास किया करती हैं. यदि आप उँगली पकड़कर पहुँचा सकें तो बहुत आनन्द आयेगा.


    आचार्य जी,

    भौगोलिक और ऐतिहासिक रुचि के छात्र तब इन कथाओं को और अधिक रुचि से पढेंगे जब इनको डिस्कवरी चैनल के अंदाज़ में प्रस्तुत किया जाये.

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    1. शीघ्रता में हूँ ... घर जाने की जल्दी है वाक्य-विन्यास सामग्री अधिक होने से संतुलन खो रहे हैं.... समय मिलते ही लौटूँगा

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    2. प्रतुल भाई! मैने तो रामचरित मानस की घटनाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया है। स्थान के बारे में पुरातत्व और भूगोल वालों को विचार करने की आवश्यकता है...और वहाँ हमारा ज्ञान शून्य है।
      कुछ लोगों को यह प्रयास पसन्द नहीं आया। उनके अनुसार व्यर्थ में ही कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा लेकर भानुमती का कुनबा जोड़ने का अनावश्यक कार्य किया गया है। उनके अनुसार कुछ (मेरे जैसे) अतिउत्साही लोग पौराणिक गाथाओं को खींचतान कर वैज्ञानिक कथा सिद्ध करने के लिये मनगढ़ंत बातों का तानाबाना बुना करते हैं जोकि भारतीयों की आत्ममुग्धता और मूर्खता का परिचायक है।

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    3. डाक्टर साहब, किसको पसंद नहीं आया आपका ये प्रयास? हम लोग हतोत्साहित बहुत जल्दी हो जाते हैं, नहीं क्या? अगर कोई प्रश्न उठ रहा है तो उसे विरोध न मानकर शंका निवारण का अवसर मानना चाहिए| विचार विमर्श से सिर्फ प्रश्नकर्ता और उत्तरप्रदाता ही नहीं, दर्शक\पाठक भी लाभान्वित होते हैं, मुझे तो ऐसा लगता है| तुलसीदास भक्त थे, इसके अलावा उस समय के जनमानस का इन विषयों पर माइंडसेट कैसा था, इस बात को भी ध्यान में रखे तो जिस भाषा में जनसाधारण समझ सके, उसी भाषा में, उन्हीं प्रतीकों में उन्होंने लिखा होगा, लगता तो मुझे भी ऐसा ही है| व्यक्तिगत तौर पर कहूं तो 'रामचरित मानस' भी मुझे प्रिय है, आचार्य चतुरसेन की 'वयं रक्षामः' भी और नरेंद्र कोहली कृत 'रामायण' शृंखला भी और अब आपकी ये सीरिज़ भी|
      अनुरोध ही कर सकता हूँ, सकारात्मक रहते हुए प्रश्न पर अपना मत भी दें और इसे जारी भी रखें| हम प्रवाहमान बनना चाहते हैं, लकीर के फ़कीर नहीं| आयु में, ज्ञान में आपसे बहुत छोटा होते हुए भी इतना कुछ इसलिए कह रहा हूँ कि इन विषयों पर मैं कुछ लिख पाने में सक्षम रहता तो मैं खुद लिखता|

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    4. आचार्य जी,

      फिर भी आप मुझे यह छूट दें की बीच-बीच में आकर मैं भौगोलिक वाली खुरापात तार्किक रूप से प्रस्तुत करता रहूँ...

      एक बार 'हिन्दुस्तान दैनिक' अखबार में एक पाठक ने सम्पादकीय पृष्ठ पर 'पाठकों के पत्र' के अंतर्गत एक बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी थी. वह यह कि उसने एक सूची दी जिसमें ५० से अधिक नाम ऐसे थे जिसमें 'राम' का नाम आ रहा था.

      अयोध्या से लेकर इटली के 'रोम' तक एक पट्टी ऎसी बनती है जिस पर किसी की दृष्टि नहीं गई.... संभावना हो सकती है कि यह किसी समय में 'राम' के वनवास का मार्ग (रूट) रहा हो. यह सब जानकार जिज्ञासु पाठकों के भीतर भाँति-भाँति के प्रश्न उठेंगे लेकिन उन सबका समाधान तभी किया जायेगा.. जब सचमुच कोई जिज्ञासा भाव से पूछना चाहेगा.... मैं न्यायशास्त्र के 'धूमानल न्याय' के अनुसार सभी कल्पनाओं को वास्तविक संभावनाओं का आवरण देना चाहता हूँ.

      आचार्य जी, मुझे आप अपनी विज्ञान कथाओं में कृपया इतनी छूट दें. इस तरह मुझे चर्चा का लाभ और बतरस का सुख भी मिलेगा.

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    5. भाई प्रतुल जी! इस ब्लॉग को अपना ही घर समझिये आप साधिकार लिखें जो भी लिखना है। रामवनगमन मार्ग और प्राचीन विस्मृत हुये देशों-नगरों- समाजों आदि के प्रति यदि आपके पास कोई जानकारी है या कोई अभिकल्पना है तो उसे अवश्य रखें।
      जाकी रही भावना जइसी प्रभु मूरत देखी तिन तइसी। ...मूरत प्रभु की ही दिखनी चाहिये ...कैसे भी दिखे।

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  7. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  8. संजय @ मो सम कौन ? ने आपकी पोस्ट " शिवभक्त दशानन की रस साधना " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    डाक्टर साहब, किसको पसंद नहीं आया आपका ये प्रयास? हम लोग हतोत्साहित बहुत जल्दी हो जाते हैं, नहीं क्या? अगर कोई प्रश्न उठ रहा है तो उसे विरोध न मानकर शंका निवारण का अवसर मानना चाहिए| विचार विमर्श से सिर्फ प्रश्नकर्ता और उत्तरप्रदाता ही नहीं, दर्शक\पाठक भी लाभान्वित होते हैं, मुझे तो ऐसा लगता है| तुलसीदास भक्त थे, इसके अलावा उस समय के जनमानस का इन विषयों पर माइंडसेट कैसा था, इस बात को भी ध्यान में रखे तो जिस भाषा में जनसाधारण समझ सके, उसी भाषा में, उन्हीं प्रतीकों में उन्होंने लिखा होगा, लगता तो मुझे भी ऐसा ही है| व्यक्तिगत तौर पर कहूं तो 'रामचरित मानस' भी मुझे प्रिय है, आचार्य चतुरसेन की 'वयं रक्षामः' भी और नरेंद्र कोहली कृत 'रामायण' शृंखला भी और अब आपकी ये सीरिज़ भी|
    अनुरोध ही कर सकता हूँ, सकारात्मक रहते हुए प्रश्न पर अपना मत भी दें और इसे जारी भी रखें| हम प्रवाहमान बनना चाहते हैं, लकीर के फ़कीर नहीं| आयु में, ज्ञान में आपसे बहुत छोटा होते हुए भी इतना कुछ इसलिए कह रहा हूँ कि इन विषयों पर मैं कुछ लिख पाने में सक्षम रहता तो मैं खुद लिखता|



    संजय @ मो सम कौन ? द्वारा ॥ भारत-भारती वैभवं ॥ के लिए 16 मई 2012 11:07 am को पोस्ट किया गया

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    1. संजय जी! जिन्हें पसन्द नहीं आया वे एक कृषि वैज्ञानिक हैं। कुछ और भी स्थानीय लोगों का यह स्पष्ट विचार हैकि पौराणिक दकियानूसी बातों को लोग विज्ञान का जामा पहनाकर भारत को पश्चिम के समकक्ष खड़ा करने का आडम्बरपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
      संजय जी उवाच- @ "तुलसीदास भक्त थे, इसके अलावा उस समय के जनमानस का इन विषयों पर माइंडसेट कैसा था, इस बात को भी ध्यान में रखे तो जिस भाषा में जनसाधारण समझ सके, उसी भाषा में, उन्हीं प्रतीकों में उन्होंने लिखा होगा, लगता तो मुझे भी ऐसा ही है|"

      बिल्कुल, यही बात है। और तुलसीदास जी अपने उद्देश्य में सफलभी रहे।

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  9. अच्छी प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  10. अवतार गाथाओं को, माता सीता जी को, पापी रावण को, प्रभु राम को, भक्त हनुमान को ....... - इस तरह से - दर्शाने के मैं सख्त खिलाफ हूँ | आप सब ज्ञानीजन हैं - एक दुसरे को बढ़ावा दे रहे हैं - किन्तु यही experimentation mentality ही हमारी धार्मिक कथाओं के रूप को बिगाड़ रही हैं |

    i object - आप इस ब्लॉग को भारत भारती वैभवं कहते हैं - कृपया इसे हिन्दू धार्मिक कथाओं को science fiction में convert करने की खेलस्थली न बनाएं |

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    1. अवतार गाथाओं को, माता सीता जी को, पापी रावण को, प्रभु राम को, भक्त हनुमान को ....... - इस तरह से - दर्शाने के मैं सख्त खिलाफ हूँ |

      @ आदरणीया शिल्पा जी,

      आपकी आपत्ति का सम्मान करते हुए आपसे अनुरोध करता हूँ.... कि आप ब्लॉग लेखकों के स्वतंत्र चिंतन को विमर्श करने दें.... मुझे विश्वास है कि इससे धर्म को किसी प्रकार की क्षति न होने पायेगी. न ही किसी प्रकार के सत-आचरणों, मूल्यों की खिलाफत होने पायेगी. जो हमारे वैदिक धर्म के नियामक तत्व हैं उनसे विपरीत हम सोच भी नहीं सकते.

      व्यवस्थापक होने के कारण मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ भविष्य में हम अपनी कथाओं को नये सिरे से खंगालेगे जरूर लेकिन बेतुके कयास नहीं लगायेंगे. हर युग में इस तरह की छूट तो लेखक लेता रहा है.

      — 'भारत भारती वैभवं' ऎसी कोई क्रीड़ास्थली नहीं बनेगी जिसमें 'वास्तविक धर्म' का निरादर किया जायेगा.

      — भीड़ तो मदारी भी लगा लेता है लेकिन संख्या बल होने से ही कोई अनुचित बात सही साबित नहीं हो जाती. तर्क सबकी कसौटी है.

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    2. प्रतुल जी - आपका आभार |

      क्या ऐसा कोई "रचनात्मक" लेख, जीज़स या मुहम्मद के बारे में, कोई इसाई या मुसलमान लिख सकता है ? ---- कभी नहीं !!! यह सिर्फ हम हैं जो अपने आराध्यों को इस तरह से "स्वतंत्र चिंतन" के नाम पर "नाटिका के पात्रों" मात्र में बदलने का सोच भी पाते हैं | :(

      आप सब मुझ से बहुत वरिष्ठ और अनुभवी हैं ब्लॉग जगत में | मैं तो यहाँ बहुत नयी हूँ | आपका आदर भी अपनी जगह है, स्वतंत्र चिंतन की और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की अवधारणायें भी अपनी जगह हैं | न तो मैं आपको यह सब लिखने से रोक सकती हूँ, न रोक रही हूँ - मुझे इसका अधिकार है ही नहीं | परन्तु जो मुझे hurting लगेगा - कहूँगी ज़रूर |

      मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा की "हल्ला बोल" जैसे ब्लॉग के व्यवस्थापक ऐसा लेख लिख सकते हैं | :( | यह भी देखती हूँ की मेरे अतिरिक्त यहाँ सभी इस लेख की प्रशंसाओं के कसीदे पढ़ रहे हैं - तो शायद मैं "दकियानूसी" दिख रही होउंगी यह टिप्पणियां लिख कर - परन्तु क्या करूँ | मेरी धार्मिक भावनाएं तो आहत कर ही रहा है यह लेख | वैसे भी in this blog world, अभी तो मुझ पर बड़े शब्द बाण बरस रहे हैं कई ओर से - तो यहाँ से भी सही | जो मुझे मेरी आत्मा ने कहा - मैंने यहाँ कह दिया | आप इसे मेरा ईमानदार expression समझें, या इसे interference मानें - यह आपका अधिकार और नजरिया रहेगा |

      किन्तु आप खुद ही सोचिये - की यह लेख "भारत भारती वैभवं" नामक ब्लॉग पर है | हमारे ब्लॉग जगत में कितने ही महाज्ञानी (???) हैं जो पहले ही यह साबित करने के प्रयासों में लगे हैं की श्री राम और सीता ( सिर्फ अतिरिक्त प्रतिभावान ) मानवमात्र थे - जो लोग "राम, सीता, जनक, रावण" आदि नामों को गूगल सर्च में ढूंढते हुए हर वह "हिन्दू" लिखित लेख ढूंढते हैं - जिसमे किंचित भी इशारा किया गया हो उनके व्यक्तित्व पर | अब इस लेख को तो वे कुबेर के खजाने की तरह publicise करेंगे |

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    3. मैने किसी चरित्र का अपमान नहीं किया है। हाँ केवल रावण के नकारात्मक पक्ष को सामने लाने का प्रयास भर किया है। और यह प्रयास करने से तुलसीदास भी स्वयं को रोक नहीं पाये। उन्होंने दुनिया को बताया हैकि रावण के अंतिम समय में राम ने लक्ष्मण को नीति सीखने भेजा था। जो नीति सिखाने वाला है वह गुरु है। गुरु पापी कैसे हो सकता है शिल्पा जी? यह तो भारत की आर्षपराम्परा में नहीं है। न हमारा धर्म ही ऐसा हमें सिखाता है । इतना ही नहीं राम को ब्रह्महत्या के कारण प्रायश्चित भी करना पड़ा था। यह भी हम नहीं कह रहे, तुलसी जी कह रहे हैं। प्रभु तो निर्दोष होता है जबकि प्रायश्चित किसे करना पड़ता है यह सबको पता है।

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    4. त्रुटि सुधार- "नकारात्मक पक्ष" के स्थान पर 'सकारात्मक पक्ष' पढ़ा जाय।

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    5. @ राम को ब्रह्महत्या के कारण प्रायश्चित भी करना पड़ा था।
      बिलकुल सच है | मर्यादा पुरुषोत्तम थे राम - उन्होंने वह किया जो मानव मर्यादा करने को कहती है | सिर्फ उन्हें ही नहीं - इससे पहले इन्द्रदेव ने भी ब्रह्महत्या के पाप को अपने सर पर लिया था - जिसे उतारने के लिए वे नदियों आदि के ऋणी हुए | रावण ब्राह्मण पुत्र तो था ही - इसमें किसी तरह का कोई संदेह है ही नहीं |

      @ यह भी हम नहीं कह रहे, तुलसी जी कह रहे हैं।
      वही तुलसी जी ही राम को प्रभु भी कहते हैं - और रावण को पापी भी | लेकिन वहां शायद आप तुलसी से सहमत न होंगे | वह आपको भक्त की अतिशयोक्ति लगे शायद ? निश्चित ही रावण ज्ञानी था - इसमें तुलसी भी विरोध नहीं करते - न ही वाल्मीकि जी | किन्तु वह पापी था - यह भी वे ही ज्ञानीगुरु कह रहे हैं |


      @ राम ने लक्ष्मण को नीति सीखने भेजा था |
      - हाँ - भेजा था | तो ? उसका पाप पाप न रहा यदि वह नीति का ज्ञाता था ? राम की पत्नी (स्त्री) सीता का धोखे से अपहरण करना पापी नहीं बनाता उसे ?

      वैसे मैं आपके लिखे से सहमत तो नहीं हूँ - परन्तु यदि उसपर भी हम चलें - तो - आप कह रहे हैं की वह एक doctor था जो test tube babies पर experiment करने के लिए यह सब कर रहा था | आप स्वयं एक डॉक्टर भी हैं | क्या मेडिकल साइंस इजाज़त देती है एक स्त्री का अपहरण कर के ऐसे एक्सपेरिमेंट्स करने की ? ऐसे doctors के लाइसेंस कैंसल नहीं किये जाते ? क्या यह आपकी परिभाषा में "पाप" की श्रेणी में नहीं आता ?

      @ प्रभु तो निर्दोष होता है जबकि प्रायश्चित किसे करना पड़ता है यह सबको पता है।
      किसे करना पड़ता है ? पापी को ? तो क्या आप कह रहे हैं कि राम पापी और रावण निर्दोष (बल्कि आपके शब्दों में - "योग्य व्यक्ति" ) थे ?

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    6. आप सब मुझ से बहुत वरिष्ठ और अनुभवी हैं ब्लॉग जगत में | मैं तो यहाँ बहुत नयी हूँ | आपका आदर भी अपनी जगह है, स्वतंत्र चिंतन की और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की अवधारणायें भी अपनी जगह हैं | न तो मैं आपको यह सब लिखने से रोक सकती हूँ, न रोक रही हूँ - मुझे इसका अधिकार है ही नहीं | परन्तु जो मुझे hurting लगेगा - कहूँगी ज़रूर |

      @ शिल्पा जी, वैचारिक धरातल पर हम सब एक समान हैं... वरिष्ठ और कनिष्ठ होने का प्रश्न नहीं.... हमारी आयु अथवा अनुभव की वरिष्ठता मात्र इतनी छूट चाहती है कि वह यह बता सके कि हमारे प्रयास छोटे-बड़े के भेद को समाप्त करने वाले हैं. इसलिये आपको हर्ट नहीं होना चाहिए. आप जानते ही होंगे कि महात्मा कबीर के राम तुलसी के राम से भिन्न थे.. और तुलसी के राम वाल्मीकि के राम से भिन्न रहे.

      पिछले दिनों संसद की षष्टिपूर्ति के अवसर पर लालकृष्ण आडवानी ने संसद में के बात कही जो काफी सराही गई - "भारत में विपरीत मत वालों को भी सम्मान दिया जाता रहा है. सम्मान ही नहीं बहुत आदर दिया जाता है." उन्होंने फिर ऋषि चार्वाक का दृष्टांत दिया जो कि वैदिक ऋषियों से ठीक उलट बात करता था. फिर भी उन्हें ऋषि कहा गया. यहाँ पर फिर भी हम कथाओं की वैज्ञानिक विवेचना मात्र चाहते हैं. मैं इतना विश्वास दिलाता हूँ कि कुछ भी अनुचित नहीं होगा. फिर भी यदि इस वैचारिक शृंखला पर अपनी खिन्नता व्यक्त करती हैं तो उसका भी सम्मान है... मैं आचार्य कौशलेन्द्र जी कहूँगा कि वे अपना मंतव्य रखते हुए अपने इस महती कार्य से हाथ खींच लें.

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  11. आप सब ज्ञानीजन हैं - एक दुसरे को बढ़ावा दे रहे हैं - किन्तु यही experimentation mentality ही हमारी धार्मिक कथाओं के रूप को बिगाड़ रही हैं |

    @ ज्ञानीजन में जनानियाँ भी शामिल हैं... चर्चा सुख तभी मिलता है जब समर्थन के साथ आपत्ति भी दर्ज होती रहे.

    शिल्पा जी, यदि धार्मिक कथाएँ यदि बेतुकी लगती हों, जटिल आवरण में कैद होने के कारण से वे असहज और अस्वभाविक प्रतीत होती हों, तब हम सब का यह कर्तव्य होना चाहिए कि कुछ उनपर बात की जाये. समय-समय पर ऐसा होता भी रहा है. तभी तो रामकथा के एकाधिक रूप उपलब्ध हैं. फादर कामिल बुल्के ने 'रामकथा' पर जितना शोध किया उतना शायद ही किसी ने किया हो... भारत में वे ही एक ऐसे हैं जिनका शोधग्रंथ प्रथम बार हिंदी में और देवनागरी लिपि में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रतुत हुआ, बेशक उसके प्रकाशन में काफी समय लगा.... 'रामकथा' पर आज किसी एक का अधिकार नहीं रहा... सभी अपने प्रयासों से 'रामकथा' कहकर भारत के वैभव को ही बढ़ा रहे हैं.

    — कुत्सित प्रयास पथम दृष्टि में ही पहचान लिये जाते हैं... 'धर्म' और 'मूल्यों' को लेकर जितना आप सचेत हैं... उतना ही ब्लॉग का हर लेखक है.... ऐसा मुझे विश्वास है.

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  12. i object - आप इस ब्लॉग को भारत भारती वैभवं कहते हैं - कृपया इसे हिन्दू धार्मिक कथाओं को science fiction में convert करने की खेलस्थली न बनाएं |

    @ शिल्पा जी, यहाँ वास्तविक रामराज्य है... अर्थात खुले द्वार की नीति है... यहाँ सभी लेखनधर्मियों के विचार प्रदर्शित होने के लिये तालों के खुलने की प्रतीक्षा नहीं करते.

    जहाँ प्रतिबंध होगा.. वहाँ छोटी-से-छोटी अभिव्यक्ति भी आने से घबराएगी. प्रतिबंधों में ग़लत मंसूबे अपना घर बनायेंगे. मैं कहता हूँ कि लगभग हिन्दू कथाएँ वैज्ञानिक हैं... बस उनकी आलंकारिक भाषा को व्याख्या चाहिए.

    जब अलंकार टूटता है तभी कथा का वास्तविक सौन्दर्य प्रकट होता है. बौद्धिक विचार-विमर्श की ही भूमि ही तो है ये सामूहिक ब्लॉग. बस इस बात का ध्यान रखना सभी का दायित्व है कि चर्चा का स्वास्थ्य बरकरार रहे.

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    1. बात करने के प्रवाह में व्याकरणिक दोहरावट की त्रुटियाँ होती चल रही हैं... कृपया उस बात को नज़रअंदाज़ करियेगा.

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  13. प्रतुल भाई! थोड़ा सा विषयांतर करने के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ। हम सब जानते हैं कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय के कई अवसरवादी लोग भारत के नायक बन गये। आने वाले दो हज़ार साल बाद वे भी अवतार घोषित हो जायं तो आश्चर्य नहीं। यह भारत का दुर्भाग्य रहा है कि यहाँ सत्य को नेपथ्य में धकेलने के प्रयास होते रहे हैं। भारत सरकार की दृष्टि में चन्द्रशेखर,सुभाष, और भगत सिंह जैसे लोग सेनानी की श्रेणी में हैं ही नहीं। दो हज़ार साल बाद ये भी पापियों और राक्षसों की श्रेणी में होंगे। सिंहासनारूढ़ होते समय भी योग्य व्यक्तियों को पीछे धकेल दिया गया....और तथाकथित महान लोग देश के भाग्यविधाता बन बैठे।

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    1. अच्छा | तो इस तर्ज़ पर क्या रावण "योग्य व्यक्ति" है - जिसे अवसरवादी राम ने सिंहासनारूढ़ होने के power के कारण पीछे धकेल दिया ? तब तो मेरे लिए इसके आगे चर्चा ही संभव नहीं होगी, हम दो अलग अलग ज़मीनों पर खड़े हैं | आप लोग अपनी चर्चा जारी रखिये |

      आभार |

      हटाएं
    2. शिल्पा जी, अवसर तो दीजिये अपनी बात पूरी तरह स्पष्ट करने का... पूर्वाग्रह इस कदर भी नहीं होना चाहिए कि सामने वाले वक्ता की हर बात कुफ्र लगे..... वे वर्तमान सन्दर्भ की बात कर रहे हैं... आजादी मिलने के बाद क्या हुआ.... बलिदानी भाव रखने वालों को सत्ता हवाले नहीं हुई और न ही उन्हें कोई विशेष तमगे मिले... अपनी आस्था को अंधत्व की और नहीं धकेलिए.... जब आरम्भ में कबीर ने अपने 'राम' को 'दशरथ नंदन राम' से भिन्न कहा तो लोग उन्हें मारने दौड़े.... लेकिन आज जब कबीर पढ़े जाते हैं तब लगता है वास्तव में उनके 'राम' का कद 'तुलसी के 'राम' के कद से कतई कमतर नहीं.

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    3. @ तब तो मेरे लिए इसके आगे चर्चा ही संभव नहीं होगी, हम दो अलग अलग ज़मीनों पर खड़े हैं |
      शिल्पा जी! यदि आपको लगता हैकि हम अलग-अलग ज़मीनों पर हैं तब तो चर्चा ज़ारी रहनी चाहिये ..तब तक जब तक कि ज़मीनों के छोर एक न हो जायें।
      आपने एक और आपत्ति की है मैने राम को दोषी और रावण को निर्दोष ठहाराने का प्रयास किया है। कृपा करके अंतिम पैरा फिर से पढें,और देखें कि मैने क्या सन्देश देने का प्रयास किया है।
      आपकी ताज़ी प्रतिक्रिया देखी,लगता हैकि आपने ज़ल्दी में आलेख पढ़ा है। पुनाः ध्यान से और पूर्वाग्रह त्याग कर पढ़िये।
      हमने रावण के वैज्ञानिक पक्ष और उसके अतिवाद दोनो को सामने लाने का प्रयास किया है। हठ करना एक अवैज्ञानिक प्रक्रिया है। आप रावण के चिकित्सक स्वरूप को स्वीकारना ही नहीं चाहतीं। कोई बात नहीं आपके अस्वीकार से चौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी वाले "रावणकृत नाड़ी विज्ञानम" नामक पुस्तक छापना बन्द नहीं करेंगे और न आयुर्वेद के चिकित्सक रावण द्वारा बनायी प्रसवोत्तर ज्वर के लिये सुविख्यात औषधि"प्रताप लंकेश्वर रस" का प्रयोग करना छोड़ेंगे। यदि पूरा विश्व नेत्ररोगों के लिये राजा जनक का ऋणी है तो प्रसूति और कौमार्भृत्य के लिये रावण और महर्षि कष्यप का ऋणी रहेगा। विज्ञान के क्षेत्र में रावण के योगदान की सराहना न करना हमारे लिये अकृतज्ञता होगी। हम खिड़कियाँ खोलकर चिंतन करने में विश्वास रखते हैं। वैचारिक पूर्वाग्रह जड़ता है जोकि हमारे स्वभाव में नहीं है। यदि यह चिट्ठा आज्ञा देगा तो हम तुरंत कूच करने के लिये तैयार हैं। जड़ता के विरुद्ध हमारा वैचारिक संघर्ष हमारे अपने ब्लॉग पर चलता रहेगा।

      हटाएं
    4. @ चर्चा ज़ारी रहनी चाहिये ..तब तक जब तक कि ज़मीनों के छोर एक न हो जायें।
      आभार आपका |

      @ पूर्वाग्रह त्याग कर पढ़िये।
      :) बात मेरे पूर्वाग्रह की नहीं है | पूर्वाग्रह है - इससे मैं इनकार नहीं करती - यही आरोप जमाल जी ने भी मुझ पर लगाया था की मैं कृष्ण को ईश्वर मानने का पूर्वाग्रह रखती हूँ | लेकिन यहाँ वह बात नहीं | यहाँ बात सीता माँ की कर रही हूँ मैं, और आप रावण के ज्ञानी होने की बात समझ रहे हैं | उस बात से तो मैं इनकार कर ही नहीं रही हूँ |

      @ हमने रावण के वैज्ञानिक पक्ष और उसके अतिवाद दोनो को सामने लाने का प्रयास किया है। हठ करना एक अवैज्ञानिक प्रक्रिया है। आप रावण के चिकित्सक स्वरूप को स्वीकारना ही नहीं चाहतीं।
      मैं चिकित्सीकीय बातों पर कुछ भी कहने की अधिकारी नहीं हूँ - क्योंकि मेरी इस विषय में कोई जानकारी ही नहीं है | {हाँ - यदि ऐसा था - तो श्री राम - जिन्होंने युद्ध जीतने केबाद लक्ष्मण को उससे नीतिज्ञान लेने भेजा - वे उसके इस वैज्ञानिक पक्ष को दबा देते - जिससे लाखों लोगों का भला हो सकता था - कुछ बात हजम नहीं होती |} फिर भी - मैं नहीं जानती इस बारे में - और मेरी आपत्ति इस पर है भी नहीं |


      @ कोई बात नहीं आपके अस्वीकार से चौखम्भा प्रकाशन, वाराणसी वाले "रावणकृत नाड़ी विज्ञानम" नामक पुस्तक छापना बन्द नहीं करेंगे और न आयुर्वेद के चिकित्सक रावण द्वारा बनायी प्रसवोत्तर ज्वर के लिये सुविख्यात औषधि"प्रताप लंकेश्वर रस" का प्रयोग करना छोड़ेंगे।
      मैं उनसे कह भी नहीं रही हूँ - यह उनके specialization के अंतर्गत आता है - मैं इसमें अधिकारी नहीं | लेकिन आप यहाँ रावण के चिकित्सिकीय पक्ष की ही नहीं - सीता / हनुमान / राम / अंगद / भक्त / भक्ति आदि की भी बातें कर रहे हैं |

      @ यदि यह चिट्ठा आज्ञा देगा तो हम तुरंत कूच करने के लिये तैयार हैं।
      इस चिट्ठे और उस चिट्ठे की बात ही नहीं है | यह चिटठा आप ही का है - बाहरी तो यहाँ मैं लग रही हूँ | वैसे भी - मैं ही यहाँ अल्पमत में हूँ - बाकी सब की सोच तो आप ही को समर्थन देती हुई लग रही है | आपत्ति तो मैं अकेली ही कर रही हूँ | तो कूच यदि किसीको करना ही है - तो मेरे लिए अधिक उचित होगा शायद |

      @ जड़ता के विरुद्ध हमारा वैचारिक संघर्ष हमारे अपने ब्लॉग पर चलता रहेगा।
      आप इसे भले ही मेरी जड़ता माने - यह आपका दृष्टिकोण है | मुझे ऐसा नहीं लगता | परन्तु यह भी वही बात है - इस पर आप कह सकते हैं कि जड़ता करने वाला यह कभी नहीं मानेगा की वह ऐसा कर रहा है | तो - let us agree to disagree on this point ....

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  14. एक अपील :

    यदि अमित शर्मा जी इस चर्चा पर दृष्टि रखें हैं तो इतना अवश्य करें कि वे स्पाम में जाती हुई टिप्पणियों को जाने से रोकें... इसे रोकने का मुझे कोई तकनीकी उपाय नहीं आता.

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    1. ब्लॉगर डैश बोर्ड --> कमेंट्स --> स्पैम --> जो कमेन्ट छपने हो उन्हें क्लिक करें --> "not spam " क्लिक करें | टिप्पणियां प्रकाशित हो जायेंगी |

      by the way - my last comment has also gone to spam :)

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  15. i think today is my day to read old posts here.

    please support niramish at indiblogger awards. i do not know how to give the link - the link is at sugya ji's wall

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