शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

विद्या

मातेव रक्षति पितेव हिते वियुकंते,
कान्तेव चाभिर्मयत्यपनिय खेदं ।
लक्ष्मीस्तनोति वितनोति च दिक्षु  कीर्ति,
कि किन्न साध्यति कल्पलतेव विद्या ॥

_________________________________________________________________________
माता की भांति रक्षा करती है, पिता की तरह हित में प्रवृत रहती है, पत्नी के समान खेद हरण कर आनंद देती है, लक्ष्मी का उपार्जन करवाती है, संसार में कीर्ति प्रदान करती है। सदविद्या वास्तव में कल्पलता के समान है।
_________________________________________________________________________

8 टिप्‍पणियां:

  1. माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
    न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥

    जो अपने बालक को पढाते नहि, ऐसी माता शत्रु समान और पित वैरी है; क्यों कि हंसो के बीच बगुले की भाँति, ऐसा मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहि देता !

    उत्तर देंहटाएं
  2. काफी ज्ञानवर्धक पोस्ट . धन्यवाद !!
    विजयादशमी पर्व की बधाई !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुग्यजी समय कम मिल पा रहा है. इसलिए निवेदन है की अगर संभव हो सके तो एक पोस्ट भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान सम्बंधित बन पड़े तो ब्लॉग को थोड़ी गति मिले और, एक श्रंखला रूप में लगातार अन्य साथी भी एक एक पोस्ट इस विषयक डाल दें तो, उत्तम होगा. दो टीन दिन में एक पोस्ट मैं भी डालने की कोशिश करूँगा.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आह!!, अमित जी

    आपने तो बाज़ी ही मार ली।

    खैर, पंडित वत्स जी, लिंक के लिये पुछ रहे थे,
    उन्हे दोबारा आमंत्रण लिंक भेज दिजिये ना।

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक विद्वान् का कथन है कि पुस्तकें ऎसी शिक्षक हैं जो हमें बिना मारे-पीटे शिक्षा देती हैं. वे कटु वाक्य नहीं कहतीं और न क्रोध करती हैं. वे हमसे मासिक वेतन भी नहीं माँगती हैं. तुम दिन-रात जब उनके पास जाओ, वे सोती नहीं. यदि तुम भूल जाओ तो वे कुड़बुडाती नहीं. यदि तुम अज्ञानी हो तो वे तुम पर हँसती नहीं.

    इसलिये ज्ञान के भण्डार पुस्तकालय सब धनों में बहुमूल्य धन है; और संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो उसकी तुलना कर सकता हो. इसलिये जो पुरुष सत्य, ज्ञान, विज्ञान, और आनंद का सच्चा जिज्ञासु बनना चाहता हो, उसके लिये यह परम आवश्यक है कि वह पुस्तकों का प्रेमी बने.

    उत्तर देंहटाएं
  6. विद्या की प्राप्ति के तीन प्रधान स्थान हैं —
    आचार्य कुल, पुस्तकें और विश्व.
    और अध्ययन, अध्यापन स्वाध्याय और पठन, प्रकृति पर्यालोचन, परीक्षा तथा अनुभव अनुभव उसके प्राप्त करने की क्रियायें हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रतुल जी!
    एक अन्गरेज़ी कहावत है कि बिना किताब का घर बिना खिड़की के कमरे की तरह है... वास्तव में पुस्तकें वह वातायन हैं जिनसे ज्ञान की बयार जीवन को सुवासित करती हैं!!
    प्रेरक प्रसंग!

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...