बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

वरण करो न अंध विचार

वरण  करो न  अंध विचार
हो जाता है हरण सभ्यता  का इससे  विस्तार।।
जीवन-तरणी डूब नहीं जाती है बिन पतवार।।
उसे बचाने वाला भी बनता है एक विचार – 
"किसी तरह से पार लगूँगा, मानूँगा न हार।।"
नेत्रहीन विश्वासों की आयी है अंध बयार।।
बचो, कहीं फिर उड़ ना जाए वेदों-सा शृंगार।।


वरण  करो न  अंध विचार
हो जाता है हरण सभ्यता  का इससे  विस्तार।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. नेत्रहीन विश्वासों की आयी है अंध बयार।।
    बचो, कहीं फिर उड़ ना जाए वेदों-सा शृंगार

    बहुत सार्थक सन्देश

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  2. अंध बयार में दूर रहे अंध विचार।
    करें शुद्ध श्रद्धा शृंगार॥

    मननीय सार्थक संदेश!!

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  3. सुग्यजी इस यज्ञ में आपकी आहुति नहीं पड़ी है अभी

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  4. वरण करो न अंध विचार।
    हो जाता है हरण सभ्यता का इससे विस्तार।।

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