मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

धूर्तों का सत्कार निषिद्ध

पाखण्डिनो विकर्मस्थान्, वैडालवृतिकान् शठः न्।
हैतुकान् बकवृत्तिश्च, वाङ्मात्रेणापि नाचंयेत्॥
                                                                              -मनुस्मृति, अ 4 श्लो 30
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-- पाखण्डियों का, निषिद्ध-कर्म करने वालो का, बिल्ली के समान दगाबाज़ों का, बगुले के समान दिखावटी आचार पालने वाले धूर्तों का, शठों का, शास्त्र की विरुद्धार्थ व्याख्या करनें वालों का वचन मात्र से भी सत्कार न करना चाहिए।
(जो अपने हित के लिये धर्म का निषेध करते है, उस विचारधारा का इन पाखण्डियों में समावेश हो जाता है।)
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बक वृत्ति:

एक बार सरोवर में एक बगुले को एकाग्रचित खड़ा देखकर राम ने लक्ष्मण से कहा "देखो, कैसा तपस्वी है जो पूरे मनोयोग से साधना कर रहा है." इसे एक मछली ने सुना और राम से कहा "आपको नहीं मालूम इसीने हमारे पूरे परिवार को समाप्त कर दिया है."

बिडाल वृत्ति:

प्रायः संबंधों की आड़ में अनैतिक कार्य करना, संबंधों की मर्यादा के विपरीत आचरण बिडाल-वृत्ति कहा जाएगा. मालिक सोचता है कि उसकी पालतू बिल्ली उसकी रसोई में रखा दूध नहीं पीयेगी. लेकिन बिल्ली हमेशा यही सोचती है कि मालिक ने दूध उसी के लिये रखा है. बदनीयत को अपने खोखले तर्कों से ढकने का कार्य इसी वृत्ति वालों का है.
                                                                                                                                -प्रतुल वशिष्ठ
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11 टिप्‍पणियां:

  1. इस वृहत जीवन में भाँति-भाँति के व्यक्ति जीवन में आते हैं. और हमारा उनसे कम-ज़्यादा वास्ता पड़ता है. कोई-कोई तो संबंध के रूप में जगह बना लेता है. यदि हम उस संबंध की आड़ में उस व्यक्ति से छल करते हैं तो यही वृत्ति धूर्तता कहलाती है. किसी के विश्वास को तोड़ना भी अमानवीयता है.

    संबंधों में आने वाली कड़वाहट को दूर करने की निरंतर कोशिश भी करते रहना चाहिए. दोष देकर दूरी बना लेना सहज है परन्तु पुनः संबंधों में मधुरता भर पाना उतना ही कठिन है.

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  2. त्रुटि संशोधन :
    __________
    कृपया पहली पंक्ति से 'व्यक्ति' के बाद वाला 'जीवन' हटा समझें. ........ यहाँ पुनरुक्ति दोष आ गया है.

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  3. प्रतुल जी,

    थोडा और विस्तार दिजिये ना, कुछ तारत्म्य बिठाने का प्रयास करें,हम भी।

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  4. पाखण्डिनो विकर्मस्थान्, वैडालवृतिकान् शठः न्।
    हैतुकान् बकवृत्तिश्च, वाङ्मात्रेणापि नाचंयेत्॥ -मनुस्मृति, अ 4 श्लो 30

    आज के नेता किस श्रेणी मैं आते हैं? बहुत सत्कार पाते हैं.

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  5. मासूम साहब,

    वैडालवृति
    शठ
    बकवृति

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  6. बिडाल वृत्ति हो या बक वृत्ति विश्वासघात ही मूल में है.
    एक छोटा सा प्रसंग है :
    एक बार सरोवर में एक बगुले को एकाग्रचित खड़ा देखकर राम ने लक्ष्मण से कहा "देखो, कैसा तपस्वी है जो पूरे मनोयोग से साधना कर रहा है." इसे एक मछली ने सुना और राम से कहा "आपको नहीं मालूम इसीने हमारे पूरे परिवार को समाप्त कर दिया है."
    किसी की साधना के बाह्य आडम्बरों से अनुमान नहीं लगाने चाहिए कि वह साधक है. जब तक कि उसके उद्देश्यों का पूरा पता न हो. बक वृत्ति समाज में कई क्षेत्रों में देखी जा सकती है. राजनीति हो अथवा धर्म, नेता और साधुओं ने अपने-अपने सफ़ेद और लाल चोले को गदला कर दिया है. जिन पर सहजता से विश्वास किया जाना चाहिए वही लाख प्रमाण देने पर भी विश्वसनीयता खो बैठे हैं.

    बिडाल वृत्ति भी समाज में देखने आती है :
    प्रायः संबंधों की आड़ में अनैतिक कार्य करना, संबंधों की मर्यादा के विपरीत आचरण बिडाल-वृत्ति कहा जाएगा. मालिक सोचता है कि उसकी पालतू बिल्ली उसकी रसोई में रखा दूध नहीं पीयेगी. लेकिन बिल्ली हमेशा यही सोचती है कि मालिक ने दूध उसी के लिये रखा है. बदनीयत को अपने खोखले तर्कों से ढकने का कार्य इसी वृत्ति वालों का है.

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  7. बिडाल वृत्ति भी समाज में देखने में आती है :
    प्रायः संबंधों की आड़ में अनैतिक कार्य करना ......... as it is

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  8. प्रतुल जी,

    आपने सुंदर विश्लेषण किया, अनुज्ञा दें,आपकी टिप्पणी के अंशो को मूल पोस्ट से जोद दूं।

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  9. .

    पाखण्डियों का, निषिद्ध-कर्म करने वालो का, बिल्ली के समान दगाबाज़ों का, बगुले के समान दिखावटी आचार पालने वाले धूर्तों का, शठों का, शास्त्र की विरुद्धार्थ व्याख्या करनें वालों का वचन मात्र से भी सत्कार न करना चाहिए।

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    क्या कहूँ ? सचमुच ऐसे लोगों के लिए धिक्कार है।

    कभी-कभी मैं भी वैज्ञानिक दृष्टि से धर्म में कही कुछ बातों पर विमर्श करती हूँ तो मित्र लोग मुझे भी पाखंडी , स्वार्थी और धूर्त समझते हैं।

    लेकिन सच ये नहीं है। किसी विषय पर विचार विमर्श करने से कोई धर्म-विरुद्ध नहीं हो जाता , न ही हर कोई पाखंडी होता है।

    आभार।

    .

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  10. @किसी विषय पर विचार विमर्श करने से कोई धर्म-विरुद्ध नहीं हो जाता

    दिव्या जी,

    विचार विमर्श, चर्चा आदि तो धर्म-शास्त्रार्थ के ही अंग है, संशय-समाधान दर्शन-मंथन में आवश्यक तत्व है।
    बिना जाने ही तथ्य खारिज करना मिथ्यात्व का लक्षण है। और यहां मिथ्यात्वी ही पाखण्डी कहा गया है।

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