मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

वसुधैव कुटुम्बकम्


अय निजः परोवेति, गणना लघुचेत साम्।
उदार चरितानाम् तु, वसुधैव कुटुम्बकम्॥



अर्थात्:

यह मेरा और यह पराया है, ऐसा विचार भी तुच्छ बुद्धि वालों का होता है। श्रेष्ट जन तो सारे संसार को अपना कुटुम्ब मानते है।
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2 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी सातवीं क्लास की संस्कृत पाठ्य पुस्तक में यह सुभाषित पढ़ा था... आज तक याद है!! और इसपर अमल भी कर रहा हूँ!!!

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  2. सत्य वचन!
    माता पृथ्वी पुत्रोहम पृथिव्या!

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