शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

तृष्णा न होती जीर्ण


भोगा न भुक्ता  वयमेव  भुक्ता, तपो न तप्तं  वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव यता, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥

                                                                                               -भृतहरि

__________________________________________________________

अर्थार्त:

हमने भोग नहिं भोगे बल्कि भोगों ने ही हमें भोग लिया। हम तपस्या से नहिं तपे किन्तु दु:ख-ताप से हम स्वयं संतप्त हो गये। समय नहिं बीता पर हम स्वयं ही बीत गये। हमारी तृष्णा तो किंचित भी जीर्ण(न्यून) न हुई, हम जीर्ण (बुढ्ढे) हो गये।

__________________________________________________________ 

भोगवादीयों, प्रकृतिशोषकों, परिग्रहियों रूप मनमौजीयों (जो स्वार्थवश मन तरंग से भोग-उपभोग करते है) के लिये इससे श्रेष्ठ क्या उदाहरण होगा।
__________________________________________________________ 
पंकजसिंह राजपूत की टिप्पणी से…

यदि भोगों में सांसारिक वस्तुओं में सुख होता तो वे उन्हें कभी न छोड़ते, परन्तु भोगो में संसार की वस्तुओं में सुख नहीं है, यह क्षणिक सुख है, जो अंत में दुःख रूप ही है, केवल आरम्भ में ही सुखमूलक लगता है !!!
__________________________________________________________  

9 टिप्‍पणियां:

  1. विद्वान पाठक बंधुओं से निवेदन है,इसी आशय को स्पष्ठ करती लघुकथा या दृष्टांत यदि उपब्ध हो तो अवश्य दें
    ताकि उसे मूल पोस्ट से जोडा जा सके।, आभार!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. महाज्ञानी भृतथरी के इस दो वाक्य के ज्ञान को ही यदि हम भारतवासी आत्मसात कर ले तो भारत स्वर्ग बन जाएगा !!

    परन्तु स्वार्थी मूर्ख तो यहीं कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि ये सब किताबी बातें हैं !! और इतिहास पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं !!

    लघुकथा या दृष्टांत के लिए इस शूद्र बुद्धि को थोडा सा समय दें (रविवार तक का) ......

    उत्तर देंहटाएं
  3. आभार, पंकज
    आपने सुक्ति का स्रोत सुझा दिया, मैने लगा दिया है।
    आपकी प्रतिक्षा करूंगा, पुनः आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. राजा भरथरी के बारे में एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है. वह 6 वीं शताब्दी भारत में उज्जयिनी (उज्जैन आधुनिक) का राजा थे ! उनके राज्य में एक ब्राह्मण वर्षों के तपस्या और पूजा के बाद, परमेश्वर की ओर से 'अमरत्व का फल' से सम्मानित किया गया ! हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वर्ग में एक पेड़ कल्पतरु है, जिसके सामने यदि कोई इच्छा की जाए तो वह पूरी हो जाती है, कहा जाता है. 'अमरत्व का फल' कल्पतरु पर बढ़ता है ! ब्राह्मण सोचा मेरे फल खाने का फायदा नहीं है, मैं हमेशा के लिए जीना नहीं चाहता ! फल किसी योग्य व्यक्ति को खाना चाहिए, योग्य व्यक्ति जिसे फल खाना चाहिए, संत की दृष्टी में वह थे राजा भरथरी ! '. उसने राजा से मुलाकात की और उसे फल की पेशकश की, राजा अपनी रानी के प्यार में पागल था, सोचा - 'मेरी रानी, जो मुझे अपनी जान से ज्यादा प्यारी है उसे ही फल खाना चाहिए ! राजा ने फल रानी को दिया, रानी का कोतवाल से इश्क था, सो रानी ने फल कोतवाल को दे दिया, कोतवाल (गधे का बच्चा) महिपाला नामक एक वेश्या के प्यार में पागल था ! गधे के बच्चे ने फल वेश्या को दे दिया!! वेश्या जिसका राजा के साथ प्यार गहरा था उसने फल राजा के सामने प्रस्तुत किया !!!

    भरथरी को अब इस जगत की भूल भूलैया को ज्ञान तुरंत हो गया, वे समझ गए की इस जगत में सब उलट-पुलट हो रहा है, सब स्वार्थ के वशीभूत हैं, किसी का किसी से सच्चा प्यार नहीं है !! सब यहाँ एक - दूसरे को पोपट बना रहें हैं !!
    सच्चे प्यार का स्रोत तो कोई और ही है !! गुरु गोरख की कृपा से उन्होंने नीतिशतकम और वैराग्यशतकम आदि, अनुपम शास्त्रों का सृजन किया - उपरोक्त सूक्ति भी वही से है !!

    भरथरी कहते हैं - भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता, तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
    कालो न यातो वयमेव यता, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥

    यदि भोगों में सांसारिक वस्तुओं में सुख होता तो वे उन्हें कभी न छोड़ते, परन्तु भोगो में संसार की वस्तुओं में सुख नहीं है, यह क्षणिक सुख है, जो अंत में दुःख रूप ही है, केवल आरम्भ में ही सुखमूलक लगता है !!!

    मूर्ख मनुष्य सोचता है, की मैंने यथा वस्तु का भोग कर लिया, परन्तु वास्तव में उस वस्तु ने ही उसका भोग कर लिया, उदहारण के लिए अन्न की उत्त्पत्ति मिट्टी से हुई, उसे उपभोग में लिया जाए तो भी वह अन्न मिट्टी में मिल जाएगा और यदि उपभोग में नहीं लिया जाय तो भी काल के प्रभाव से वह मिट्टी ही बन जाएगा !!
    मूर्ख ने सोचा की उसने भोजन किया लेकिन उसके बाद क्या, अन्न का रूपांतरण, मिट्टी-मिट्टी से मिलने को तत्पर हो गयी, हुआ गया कुछ नहीं पर फंस गया बेचारा भोगी !!!

    अब आप कहेंगे की भोजन न करें क्या? करे लेकिन भोग दृष्टी से नहीं योग दृष्टी से - अर्थात
    स्वाद व सांसारिक रसपान न करें, परमात्मिक रसपान करें, बस यहीं समझे की मिट्टी ने मिट्टी को खाया और पुन: उसको मिट्टी में ही मिलाया !!

    यहीं नियम सभी भोगों पर लागू होता है !!! नहीं तो भोग हमें भोगते रहेंगे (इन्द्रियां रस लेगीं और पतन की और ले जायेंगी) हम समझेगें की हमने भोगों को भोग !!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुज्ञ जी आपकी आज्ञा से और परमपिता परमात्मा की कृपा से मेरा अधकचरा ज्ञान मैंने प्रस्तुत कर दिया है, स्वीकार करें -

    उत्तर देंहटाएं
  6. इसी विषय पर थोडा सा और लिखने की आज्ञा चाहूंगा, यदि आप सब पढ़ने को तैयार हो तो ...............

    उत्तर देंहटाएं
  7. अर्धरात्रि में कौन जगता है, योगी या भोगी !!!!!!!!!.............. इसीलिए सो जाना ही ठीक है,

    ॐ नमः शिवाय !!!
    ॐ शांति: शांति: शांति: !!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. आभार आपका पंकज जी,

    आपने राजा भृतहरि का वैराग्य प्रमुख जीवन-दर्शन प्रस्तूत कर दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  9. कहते हैं कि महाभारत धर्म युद्ध के बाद राजसूर्य यज्ञ सम्पन्न करके पांचों पांडव भाई महानिर्वाण प्राप्त करने को अपनी जीवन यात्रा पूरी करते हुए मोक्ष के लिये हरिद्वार तीर्थ आये। गंगा जी के तट पर ‘हर की पैड़ी‘ के ब्रह्राकुण्ड मे स्नान के पश्चात् वे पर्वतराज हिमालय की सुरम्य कन्दराओं में चढ़ गये ताकि मानव जीवन की एकमात्र चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूरी हो और उन्हे किसी प्रकार मोक्ष मिल जाये।
    हरिद्वार तीर्थ के ब्रह्राकुण्ड पर मोक्ष-प्राप्ती का स्नान वीर पांडवों का अनन्त जीवन के कैवल्य मार्ग तक पहुंचा पाया अथवा नहीं इसके भेद तो परमेश्वर ही जानता है-तो भी श्रीमद् भागवत का यह कथन चेतावनी सहित कितना सत्य कहता है; ‘‘मानुषं लोकं मुक्तीद्वारम्‘‘ अर्थात यही मनुष्य योनी हमारे मोक्ष का द्वार है।
    मोक्षः कितना आवष्यक, कैसा दुर्लभ !
    मोक्ष की वास्तविक प्राप्ती, मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्या तथा एकमात्र आवश्यकता है। विवके चूड़ामणि में इस विषय पर प्रकाष डालते हुए कहा गया है कि,‘‘सर्वजीवों में मानव जन्म दुर्लभ है, उस पर भी पुरुष का जन्म। ब्राम्हाण योनी का जन्म तो दुश्प्राय है तथा इसमें दुर्लभ उसका जो वैदिक धर्म में संलग्न हो। इन सबसे भी दुर्लभ वह जन्म है जिसको ब्रम्हा परमंेश्वर तथा पाप तथा तमोगुण के भेद पहिचान कर मोक्ष-प्राप्ती का मार्ग मिल गया हो।’’ मोक्ष-प्राप्ती की दुर्लभता के विषय मे एक बड़ी रोचक कथा है। कोई एक जन मुक्ती का सहज मार्ग खोजते हुए आदि शंकराचार्य के पास गया। गुरु ने कहा ‘‘जिसे मोक्ष के लिये परमेश्वर मे एकत्व प्राप्त करना है; वह निश्चय ही एक ऐसे मनुष्य के समान धीरजवन्त हो जो महासमुद्र तट पर बैठकर भूमी में एक गड्ढ़ा खोदे। फिर कुशा के एक तिनके द्वारा समुद्र के जल की बंूदों को उठा कर अपने खोदे हुए गड्ढे मे टपकाता रहे। शनैः शनैः जब वह मनुष्य सागर की सम्पूर्ण जलराषी इस भांति उस गड्ढे में भर लेगा, तभी उसे मोक्ष मिल जायेगा।’’
    मोक्ष की खोज यात्रा और प्राप्ती
    आर्य ऋषियों-सन्तों-तपस्वियों की सारी पीढ़ियां मोक्ष की खोजी बनी रहीं। वेदों से आरम्भ करके वे उपनिषदों तथा अरण्यकों से होते हुऐ पुराणों और सगुण-निर्गुण भक्ती-मार्ग तक मोक्ष-प्राप्ती की निश्चल और सच्ची आत्मिक प्यास को लिये बढ़ते रहे। क्या कहीं वास्तविक मोक्ष की सुलभता दृष्टिगोचर होती है ? पाप-बन्ध मे जकड़ी मानवता से सनातन परमेश्वर का साक्षात्कार जैसे आंख-मिचौली कर रहा है;
    खोजयात्रा निरन्तर चल रही। लेकिन कब तक ? कब तक ?......... ?
    ऐसी तिमिरग्रस्त स्थिति में भी युगान्तर पूर्व विस्तीर्ण आकाष के पूर्वीय क्षितिज पर एक रजत रेखा का दर्शन होता है। जिसकी प्रतीक्षा प्रकृति एंव प्राणीमात्र को थी। वैदिक ग्रन्थों का उपास्य ‘वाग् वै ब्रम्हा’ अर्थात् वचन ही परमेश्वर है (बृहदोरण्यक उपनिषद् 1ः3,29, 4ः1,2 ), ‘शब्दाक्षरं परमब्रम्हा’ अर्थात् शब्द ही अविनाशी परमब्रम्हा है (ब्रम्हाबिन्दु उपनिषद 16), समस्त ब्रम्हांड की रचना करने तथा संचालित करने वाला परमप्रधान नायक (ऋगवेद 10ः125)पापग्रस्त मानव मात्र को त्राण देने निष्पाप देह मे धरा पर आ गया।प्रमुख हिन्दू पुराणों में से एक संस्कृत-लिखित भविष्यपुराण (सम्भावित रचनाकाल 7वीं शाताब्दी ईस्वी)के प्रतिसर्ग पर्व, भरत खंड में इस निश्कलंक देहधारी का स्पष्ट दर्शन वर्णित है, ईशमूर्तिह्न ‘दि प्राप्ता नित्यषुद्धा शिवकारी।31 पद
    अर्थात ‘जिस परमेश्वर का दर्शन सनातन,पवित्र, कल्याणकारी एवं मोक्षदायी है, जो ह्रदय मे निवास करता है,
    पुराण ने इस उद्धारकर्ता पूर्णावतार का वर्णन करते हुए उसे ‘पुरुश शुभम्’ (निश्पाप एवं परम पवित्र पुरुष )बलवान राजा गौरांग श्वेतवस्त्रम’(प्रभुता से युक्त राजा, निर्मल देहवाला, श्वेत परिधान धारण किये हुए )
    ईश पुत्र (परमेश्वर का पुत्र ), ‘कुमारी गर्भ सम्भवम्’ (कुमारी के गर्भ से जन्मा )और ‘सत्यव्रत परायणम्’ (सत्य-मार्ग का प्रतिपालक ) बताया है।
    स्नातन शब्द-ब्रम्हा तथा सृष्टीकर्ता, सर्वज्ञ, निष्पापदेही, सच्चिदानन्द , महान कर्मयोगी, सिद्ध ब्रम्हचारी, अलौकिक सन्यासी, जगत का पाप वाही, यज्ञ पुरुष, अद्वैत तथा अनुपम प्रीति करने वाला।
    अश्रद्धा परम पापं श्रद्धा पापमोचिनी महाभारत शांतिपर्व 264ः15-19 अर्थात ‘अविश्वासी होना महापाप है, लेकिन विश्वास पापों को मिटा देता है।’
    पंडित धर्म प्रकाश शर्मा
    गनाहेड़ा रोड, पो. पुष्कर तीर्थ
    राजस्थान-305 022

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...